परमाणु परीक्षणों वाले स्थानों पर बरसों बाद भी चेर्नोबिल और फुकुशिमा जितना विकिरण

-अब तक दो हजार से ज्यादा परमाणु परीक्षण किए गए, सबसे ज्यादा अमरीका ने किए (more than two thousand nuclear tests were conducted till now, most of America)
-परमाणु परीक्षण के दुष्प्रभाव से हजारों लोगों की जान जा चुकी है, पर्यावरण और वनों को भी नुकसान

By: pushpesh

Published: 09 Aug 2020, 11:11 PM IST

हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु हमले के 75 वर्ष बाद विश्व आणविक खतरे के और करीब आ गया है। उस विनाशकारी हमले के बाद हुए परमाणु परीक्षणों के दुष्प्रभावाओं से अब तक हजारों लोग जान गंवा चुके हैं। 1945 के बाद अमरीका और सोवियत संघ के अलावा छह अन्य देशों ने इस बीच 2 हजार से अधिक परमाणु परीक्षण विस्फोट किए, जिससे आसपास के वायुमंडल में वर्षों रेडियोएक्टिव विकिरणों ने पीछा नहीं छोड़ा और हजारों लोग मरते रहे। कितने ही लोगों को विस्थापित होना पड़ा।

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द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद सोवियत संघ ने अमरीका के परमाणु कार्यक्रमों की जासूसी शुरू की और शीतयुद्ध के बाद परमाणु हथियारों की होड़ लग गई। दोनों ही देशों ने बड़ी संख्या में नागरिकों का जीवन उच्च विकिरणों के हवाले कर दिया। आज भले ही रूस के पास सबसे अधिक परमाणु हथियार हैं, लेकिन सबसे ज्यादा परीक्षण अमरीका ने किए। हिरोशिमा पर हमले से पहले न्यू मैक्सिको में पहला परमाणु परीक्षण किया। इस परीक्षण का दशकों तक महाद्वीप पर असर रहा। अमरीका ने नेवादा में लगभग एक हजार और मार्शल द्वीप (हवाई और फिलीपींस के बीच ) पर 67 परमाणु परीक्षण किए। नतीजा यह हुआ कि इन इलाकों में कैंसर की दर बढ़ गई। 1960 के दशक तक अमरीका में परीक्षणों के दुष्प्रभाव से लगभग दस हजार लोगों की मौत हुई। जुलाई 1946 में मार्शल द्वीप समूह पर परीक्षण के वक्त अमरीकी अधिकारियों ने यहां के लोगों को दूसरी जगह भेज दिया। फिर भी बड़ी संख्या में द्वीप के लोगों पर विकिरण का गंभीर असर पड़ा।

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प्रवाल भित्ती और वनस्पति को भी नुकसान
मार्च 1954 में अमरीका ने दुनिया के पहले थर्मोन्यूक्लियर बम कैसल ब्रावो का मार्शल द्वीप पर परीक्षण किया। दावा यह किया कि इसका असर लोगों पर ज्यादा नहीं हुआ, लेकिन इससे निकले विकिरणों का समुद्र में प्रवाल भित्तियों, द्वीपीय वनस्पति और निवासियों पर काफी दुष्प्रभाव हुआ। पिछले वर्ष कोलंबिया विवि के अध्ययनकर्ताओं ने पता लगाया कि द्वीप के कई हिस्सों में आज भी विकिरण का स्तर चेर्नोबिल और फुकुशिमा परमाणु त्रासदी से ज्यादा है।

अमरीका ने छुपाया परीक्षण का सच
जनवरी 2020 तक मार्शल द्वीपों की राष्ट्रपति रही हिल्डा हेइन ने वाशिंगटन पोस्ट को बताया कि परीक्षण के वक्त अमरीकी अधिकारियों ने बहुत सारी महत्वपूर्ण जानकारियों को छुपाया। साथ ही द्वीप को हर्जाने के रूप में निर्धारित 2.3 बिलियन डॉलर देने से भी इनकार कर दिया। 1962 में नेवादा में परमाणु परीक्षण के दौरान वहां मौजूद सैनिक भी विकिरण की चपेट में आ गए थे। रोग नियंत्रण और रोकथाम केंद्र और नेशनल कैंसर इंस्टीट्यूट की एक रिपोर्ट के मुताबिक परीक्षण के दुष्प्रभाव से हजारों लोगों को जान गंवानी पड़ी। इसके अलावा 1951 से 1962 के बीच हुए परीक्षण से फैले विकिरण के कारण करीब 11 हजार अमरीकी कैंसर के कारण मरे। इतिहासकार कीथ एंड्रयूज के मुताबिक 1952 से 1988 तक अमरीका में रेडियोधर्मी पदार्थों के दुष्प्रभाव से एक लाख 45 हजार लोगों की मौत हुई है।

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सोवित संघ ने कजाखस्तान और इंग्लैंड ने ऑस्ट्रेलिया में किए परीक्षण
सोवियत संघ ने कजाखस्तान के सेमिपाल्टिंस्क में कई परमाणु परीक्षण किए। जिसके कारण अब तक 15 लाख से अधिक लोग विकिरण की चपेट में आ चुके हैं। दूसरे देशों में भी इस तरह की समस्याएं आ चुकी हैं। अल्जीरिया और फ्रंच पोलिनेशिया ने अपने नागरिकों के स्वास्थ्य दुष्परिणामों के लिए पेरिस द्वारा परीक्षण के बाद छोड़े गए रेडियोधर्मी कचरे को जिम्मेदार ठहराया। ब्रिटेन ने अपने शुरुआती परीक्षण ऑस्ट्रेलिया में किए, जिसके लिए रॉयल कमीशन ने नागरिकों की जान जोखिम में डालने का आरोप लगाया। इसके बाद ब्रिटेन ने प्रशांत महासागर के माल्डेन द्वीप और किरीटिमाटी द्वीप पर परीक्षण किए, जहां पारिस्थितिक तंत्र को नुकसान पहुंचा और स्थानीय लोगों पर स्वास्थ्य का खतरा भी बढ़ गया।

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प्रतिबंध के बाद भी किया परीक्षण
1963 में आंशिक परमाणु परीक्षण प्रतिबंध संधि पर सोवियत संघ, ब्रिटेन, अमरीका के साथ 100 देशों ने हस्ताक्षर किए। जिसमें भूमिगत विस्फोटो पर प्रतिबंध लगा दिया गया। लेकिन फ्रांस और चीन ने इसके बाद भी परीक्षण किए। चीन ने शिनजियांग में कई परीक्षण किए। 1996 में अमरीकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने व्यापक परमाणु परीक्षण प्रतिबंध संधि पर हस्ताक्षर किए। भले ही सीनेट ने इसे मानने से इनकार कर दिया, लेकिन इसके बाद अमरीका ने परीक्षण नहीं किए। चीन, भारत और पाकिस्तान ने भी 1990 के दशक के अंत में परमाणु परीक्षण रोक दिए, लेकिन उत्तर कोरिया ने 2006 से 2017 में छह परीक्षण किए।

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