मुशर्रफ क्यों कह रहे हैं अफगानिस्तान से अमरीकी सेना के हटते ही भारत- पाक में बढ़ सकती है तनातनी

मुशर्रफ क्यों कह रहे हैं अफगानिस्तान से अमरीकी सेना के हटते ही भारत- पाक में बढ़ सकती है तनातनी

manish singh | Publish: Oct, 14 2018 10:01:02 AM (IST) विश्व

भारत को अफगानिस्तान से दूर रहना होगा क्योंकि पाकिस्तान अफगानिस्तान पर अपना प्रभुत्व मानता है। अमरीकी सेना अगर वापस लौटती है तो भारत और पाकिस्तान को अफगानिस्तान में अपना पैर जमाने के लिए काफी संघर्ष करना होगा

पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति और सैन्य शासक परवेज मुशर्रफ ने चेतावनी दी है कि अमरीका अगर अफगानिस्तान छोड़ता है तो परमाणु हथियारों से लैस भारत और पाकिस्तान के बीच तनातनी बढ़ेगी और हालात छद्म युद्ध जैसे हो सकते हैं। मुशर्रफ 1999 में तख्तापलट कर सत्ता में आए थे जो भारी विरोध और प्रदर्शन के बाद 2008 में सत्ता से बेदखल हुए थे।

मुशर्रफ कहते हैं कि पाकिस्तान भारत से लंबे वर्षों की खींचातानी और तनाव की स्थिति के बाद शांति चाहता है ताकि विवादित मसले निर्णायक स्थिति में पहुंच सकें। पूर्व पाकिस्तानी जनरल का भारत पर ये भी आरोप लगाते हैं कि भारत अफगानिस्तानी सरजमीं का इस्तेमाल अलगाववादियों को पाकिस्तान में हमले करने के लिए करता है। पद छोडऩे के बाद इन्होंने कहा था कि इस्लामाबाद ने अफगानिस्तान में छद्म सैनिकों की तैनाती की थी जिससे पड़ोसी मुल्क भारत को करारा जवाब मिल सके। ये स्थिति तालिबान और दक्षिणी गठबंधन को आक्रामक बनाने का काम करेगी जिससे भारत और पाकिस्तान में तनातनी बढ़ सकती है और ‘छद्म युद्ध’ (प्रॉक्सी वॉर) जैसे हालात बन सकते हैं जो नुकसानदेह होगा। एक सैन्य गठबंधन की ओर भी इशारा करते हैं जिसने 1990 और वर्ष 2000 में तालिबान के खिलाफ युद्ध लडऩे का अनुभव है।

दुबई के पेंटहाउस अपार्टमेंट में दिए एक साक्षात्कार में मुशर्रफ ने सौ फीसदी दावा करते हुए कहा था कि अमरीका जैसे ही अफगानिस्तान से अपनी सेना हटाएगा भारत और पाकिस्तान के बीच छद्म युद्ध होना तय है। युद्धग्रस्त अफगानिस्तान भारत और पाकिस्तान के बीच आपसी तनाव की बड़ी वजह है जिससे युद्ध जैसे हालात बन रहे हैं। मुशर्रफ का बयान कि भारत को डराने और पाकिस्तान के साथ उसकी सेना को प्रोत्साहित करने के लिए मददगार हो सकता है। मुशर्रफ ऐसे व्यक्ति हैं जिन्हें 71 साल पहले अस्तित्व में आए पाकिस्तान पर आधा समय शासन करने का अनुभव है।

वहीं इस पूरे मसले पर अमरीकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने उन सभी चिंताओं को पूरी तरह से खत्म कर दिया है जिससे नई दिल्ली को इस ओर सोचना पड़े कि अमरीका के अफगानिस्तान से निकलने के बाद उसे अपनी पकड़ मजबूत बनानी होगी। भारतीय विदेश मंत्रालय ने इस पर कुछ भी कहने से इंकार कर दिया है जो पाकिस्तान पर लगातार सीमा पार से आतंकी घटनाओं और हमलावरों की घुसपैठ के लिए दोषी ठहराता रहा है। भारत पाकिस्तान पर अफगानिस्तान में भी अशांति और आतंकी गतिविधियों के लिए दोषी ठहराता है।

भारत लगातार कहता रहा है कि उसका पूरा ध्यान अफगानिस्तान के विकास और मूलभूत संरचान को बेहतर करना है जिससे जनहित में शांति और विकास की स्थिति को दोबारा कायम किया जा सके। अमरीकी विदेश मंत्री माइक पोम्पियों ने पाकिस्तानी समकक्ष से मुलाकात के बाद कहा कि पाकिस्तान चाहे तो मध्यस्थता की भूमिका निभाते हुए अफगानिस्तान पर समझौता कर सकता है। इससे अफगान पीस प्रॉसेस आगे बढ़ेगा। अफगानिस्तानी चीफ एक्जक्यूटिव अबदुल्लाह अब्दुल्लाह ने न्यूयॉर्क में आयोजित एक कार्यक्रम में कहा था कि जब से इमरान खान पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बने हैं तब से तालिबान के प्रति नीतियों में कोई भी बदलाव नहीं हुआ है।


विभाजनकारी व्यक्तित्व का नाम है मुशर्रफ

मुशर्रफ राजनीति में आने को बेताब रहे पर काूननी पेंचीदगियों के कारण सफल नहीं हुए। हाल के आम आम चुनावों में उन्हें चुनाव लडऩे से प्रतिबंधित कर दिया गया था। 2013 में जब वे आखिरी बार पाकिस्तान लौटे तब उन्हें करीब एक साल तक नजरबंद रखा गया था। 2016 में इलाज के लिए विदेश जाने की अनुमति मिली और इसके बाद वो कभी वापस नहीं लौटे। पाकिस्तानी जनता की नजरों में मुशर्रफ एक विभाजनकारी व्यक्तित्व हैं। कुछ लोग उन्हें आर्थिक स्थिरता कायम रखने के लिए एक प्रभावशाली व्यक्ति मानते हैं तो कुछ ने 9/11 हमले के बाद इन्हें अमरीका का पिछलग्गू तक कहा। इनके खिलाफ सांप्रदायिक तनाव, मानवाधिकार हनन के मामले चल रहे हैं।

एक अनजान बीमारी से जूझ रहे 75 वर्षीय जनरल और पूर्व पाक राष्ट्रपति मुशर्रफ पर राजनीति से प्रेरित कई आपराधिक मामले लंबित हैं। इसमें संविधान को निलंबित करने के लिए राजद्रोह का मुकदमा शामिल है। पूर्व प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो की हत्या के मामले में मुशर्रफ को भगौड़ा घोषित कर दिया था। बेनजीर के बेटे बिलावल भुट्टो ने दिसंबर 2007 में हुई मां की हत्या के लिए मुशर्रफ को दोषी ठहराया था। वो पाकिस्तान तभी लौटेंगे जब उन्हें कड़ी सुरक्षा मिलेगी।

 

क्रिश के, ब्यूरो चीफ पाकिस्तान, अफगानिस्तान, ब्लूमबर्ग, वाशिंगटन पोस्ट से विशेष अनुबंध के तहत

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