Taliban: क्या शांति वार्ता से अफगानिस्तान में फिर लौटेगा ‘तालिबान शासन’

शांति प्रक्रिया बहाल (taliban peace talk) हो जाती है और अमरीकी सेना अफगानिस्तान छोड़ देती है तो तालिबान फिर से मजबूत हो जाएगा

By: pushpesh

Published: 17 Mar 2020, 06:57 PM IST

जयपुर.

पाकिस्तान पर वर्षों से अफगानिस्तान में दोहरा खेल खेलने का आरोप लगता रहा है। आत्मघाती हमलावरों को शरण देना, तालिबान विद्रोहियों को शरण देना और वार्ता के माध्यम से अफगान युद्ध को रोकने के प्रयासों के लिए अपने गरीब पड़ोसी को अस्थिर करना। लेकिन अमरीकी अधिकारियों और तालिबान प्रतिनिधियों ने 29 फरवरी को कतर में एक समझौते पर हस्ताक्षर किए तो अमरीकी सैनिकों और तालिबान-अफगान नेताओं के बीच साझा वार्ता का मार्ग खुल गया, जो पाकिस्तान की कूटनीतिक सफलता कही जा सकती है। उसने इसका श्रेय लेने के लिए जेल में बंद तालिबान नेता को मुक्त कर दिया, जो समूह का मुख्य वार्ताकार बन गया। लेकिन अफगान राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों के बीच कड़ा संघर्ष और हजारों विद्रोहियों की प्रस्तावित रिहाई के वादे पर तालिबान के राष्ट्रपति अशरफ गनी से विवाद के साथ ही समझौते में दरार नजर आने लगी।

आंशिक युद्ध विराम के बाद तालिबान ने फिर हमले शुरू कर दिए, जिसके बाद आगे की वार्ता को रोक दिया गया। पाकिस्तान को डर है कि मौजूदा संकट उसी तरह की हिंसा और शरणार्थी पलायन की समस्या फिर खड़ी कर सकता है, जैसा 1989 में सोवियत सैनिकों की वापसी के बाद हुआ था। पाकिस्तान के अखबार ‘डॉन’ ने लिखा - लगता है इतिहास अफगानिस्तान में खुद को दोहरा रहा है। सोवियत काल में सत्ता के खालीपन और गृहयुद्ध ने तालिबान का वर्चस्व बढ़ाया था। अफगानिस्तान के सियासतदानों ने इससे कोई सबक नहीं लिया।

पाकिस्तान रणनीतिक लाभ लेने का प्रयास करेगा
कई अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों का कहना है कि पाकिस्तान पहले तालिबान शासन का समर्थन करता था और अब भी अफगानिस्तान की गनी सरकार के विरोधी तालिबान का पक्षधर है। गनी पाकिस्तान के लिए संदिग्ध रहे हैं और उन्होंने पाकिस्तान के पारंपरिक प्रतिद्वंद्वी भारत के साथ बेहतर संबंध बनाए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इसके बावजूद अफगान वार्ता सफल होने के बाद भी पाकिस्तान खुद को विजेता की तरह पेश करेगा। वाशिंगटन में वुडरो विल्सन इंटरनेशनल सेंटर फॉर स्कॉलर्स के क्षेत्रीय विशेषज्ञ मिचेल कुगेलमैन का कहना है कि पाकिस्तान इस शांति वार्ता का रणनीतिक लाभ लेने का प्रयास करेगा। क्योंकि इससे उसका सहयोगी तालिबान मजबूत होगा, जिससे भारत का अफगानिस्तान से सहयोग कम हो सके।

शांति वार्ता की सफलता पर संशय
पाकिस्तानी अधिकारी इस बात से इनकार करते हुए कहते हैं कि वर्षों से घरेलू आतंकवाद से घिरे पाकिस्तान को पड़ोसी देश में इस तरह की अशांति देखने की इच्छा नहीं है। पाकिस्तानी विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी ने एक साक्षात्कार में कहा कि पाकिस्तान के प्रबुद्ध लोग शांति और स्थिरता चाहते हैं। हमारी हस्तक्षेप करने की मंशा नहीं है। कुगेलमैन का कहना है कि यदि शांति प्रक्रिया बहाल हो जाती है और अमरीकी सेना अफगानिस्तान छोड़ देती है तो तालिबान फिर से मजबूत हो जाएगा। इससे पिछली बार की तरह अफगानिस्तान में लोकतांत्रिक मूल्यों का हनन शुरू हो और महिला अधिकारों को कुचला जा सकता है। विशेषज्ञों का कहना कि शांति वार्ता से अच्छे की उम्मीद कम है, क्योंकि इससे नेताओं में विभाजनकारी सोच के चलते लोकतांत्रिक मूल्यों को खतरा होगा।

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