हर क्षेत्र में मिलेगी कामयाबी, करना होगा आज ही देवी के इस स्वरुप की आराधना

हर क्षेत्र में मिलेगी कामयाबी, करना होगा आज ही देवी के इस स्वरुप की आराधना

Tanvi Sharma | Publish: Oct, 11 2018 11:44:35 AM (IST) | Updated: Oct, 11 2018 11:47:17 AM (IST) पूजा

हर क्षेत्र में मिलेगी कामयाबी, करना होगा आज ही देवी के इस स्वरुप की आराधना

शारदीय नवरात्रि शुरु हो चुकी है और आज नवरात्रि का दूसरा दिन है। नवरात्रि के दूसरे दिन देवी दुर्गा के द्वितीय स्वरुप मां ब्रह्मचारिणी की पूजा की जाती है। इस दिन मां ब्रह्मचारिणी की पूजा करने से मनुष्य को ज्ञान, वैराग्य, संयम और सदाचार की प्राप्ति होती है। इस दिन ब्रह्मचारिणी की विधि-विधान से पूजा और कथा पढ़ने से मां प्रसन्न होकर उन्हें भक्ति और सिद्धि दोनों का आशीर्वाद देती हैं। ब्रह्म का अर्थ है तपस्‍या और चारिणी का अर्थ है आचरण करने वाली। इसका अर्थ है की मां ब्रह्मचारिणी तप का आचरण करने वाली देवी है। इसलिए मां को तप और सही आचरण से जल्द प्रसन्न किया जा सकता है। मां के दाएं हाथ में जप माला और बाएं हाथ में कमंडल शोभायमान है।

 

ma brahmachariini

इस तरह करें मां ब्रह्मचारिणी की पूजा

मां ब्रह्मचारिणी की पूजा सरल होती है और वे जल्द ही प्रसन्न होकर आशीर्वाद देती हैं। इस दिन देवी को प्रसन्न करने के लिए उन्हें दूध, दही, घी, इत्र, मधु व शर्करा से स्नान कराएं। उसके बाद फूल, अक्षत, रोली, चंदन, मिश्री, लौंग, इलाइची आदि अर्पित करें। मां ब्रह्मचारिणी को दूध और दूध से बने व्‍यंजन अति प्रिय होते हैं। इसलिए आप उन्‍हें दूध से बने व्‍यंजन या शक्कर मिश्री का भोग लगाएं। इस दिन पूजा के समय साधकों को अपना ध्यान स्वाधिष्ठान चक्र में स्थित करना चाहिए। इससे सुस्ती, तनाम, चिंता दूरी होती है। प्रसन्नता, निष्ठा, आत्मविश्वास और ऊर्जा का विकास होता है और कामयाबी मिलती है।

 

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मां ब्रह्मचारिणी की कथा

मां ब्रह्मचारिणी नें नारदजी के उपदेश से भगवान शंकर को पति रूप में प्राप्त करने के लिए घोर तपस्या की थी। इस कठिन तपस्या के कारण इन्हें तपश्चारिणी अर्थात्‌ ब्रह्मचारिणी नाम से जाना गया। एक हजार वर्ष तक इन्होंने केवल फल-फूल खाकर बिताए और सौ वर्षों तक केवल जमीन पर रहकर शाक पर निर्वाह किया। कुछ दिनों तक कठिन उपवास रखे और खुले आकाश के नीचे वर्षा और धूप के घोर कष्ट सहे.। तीन हजार वर्षों तक टूटे हुए बिल्व पत्र खाए और भगवान शंकर की आराधना करती रहीं। इसके बाद तो उन्होंने सूखे बिल्व पत्र खाना भी छोड़ दिए। कई हजार वर्षों तक निर्जल और निराहार रह कर तपस्या करती रहीं। पत्तों को खाना छोड़ देने के कारण ही इनका नाम अपर्णा नाम पड़ गया।

कठिन तपस्या के कारण देवी का शरीर एकदम क्षीण हो गया. देवता, ऋषि, सिद्धगण, मुनि सभी ने ब्रह्मचारिणी की तपस्या को अभूतपूर्व पुण्य कृत्य बताया, सराहना की और कहा- हे देवी आज तक किसी ने इस तरह की कठोर तपस्या नहीं की। यह आप से ही संभव थी। आपकी मनोकामना परिपूर्ण होगी और भगवान चंद्रमौलि शिवजी तुम्हें पति रूप में प्राप्त होंगे। अब तपस्या छोड़कर घर लौट जाओ, जल्द ही आपके पिता आपको लेने आ रहे हैं। मां की कथा का सार यह है कि जीवन के कठिन संघर्षों में भी मन विचलित नहीं होना चाहिए। मां ब्रह्मचारिणी देवी की कृपा से सर्व सिद्धि प्राप्त होती है।

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