समस्त पापों से मुक्ति पाने के लिए इस विधि से करें रमा एकादशी का व्रत, जानें शुभ मुहूर्त और व्रत कथा

समस्त पापों से मुक्ति पाने के लिए इस विधि से करें रमा एकादशी का व्रत, जानें शुभ मुहूर्त और व्रत कथा

Tanvi Sharma | Publish: Nov, 02 2018 11:59:03 AM (IST) | Updated: Nov, 02 2018 11:59:04 AM (IST) पूजा

समस्त पापों से मुक्ति पाने के लिए इस विधि से करें रमा एकादशी का व्रत, जानें शुभ मुहूर्त और व्रत कथा

कार्तिक मास के कृष्णपक्ष की एकादशी को रमा एकादशी कहते हैं, इसे रंभा एकादशी भी कहा जाता है। एकादशी का व्रत भगवान विष्णु को समर्पित होता है और इस दिन भगवान के अवतार श्री कृष्ण की पूजा की जाती है। माना जाता है की रमा एकादशी का व्रत करने वाले व्यक्ति को जीवन में कभी धन की कमी नहीं होती। इश दिन विष्णु जी की पूजा करने से मन प्रसन्न रहता है और सच्चे मन से की कई पूजा से यदि श्री हरि प्रसन्न हो जाते हैं इस साल यह एकादशी 3 नवंबर को है। मान्यता के अनुसार, इस व्रत के प्रभाव से सभी पाप नष्ट हो जाते हैं, यहां तक कि ब्रह्महत्या जैसे महापाप भी दूर होते हैं। सौभाग्यवती स्त्रियों के लिए यह व्रत सुख और सौभाग्यप्रद माना गया है। शास्त्रों के अनुसार रमा एकादशी का व्रत करने से मृत्यु के बाद मोक्ष की प्राप्ति होती है। साथ ही सौभाग्य, समृद्धि की प्राप्ति होती है।

rama ekadashi

इस विधि से करें एकादशी व्रत

रमा एकादशी व्रत की शुरूआत दशमी तिथि से ही आरम्भ हो जाता है। इसलिए उस दिन भी सात्विक भोजन ग्रहण करें। एकादशी के दिन प्रात:काल उठकर नित्य क्रम कर स्नान कर। स्वच्छ वस्त्र धारण करें। भगवान विष्णु का पूजन करें। रमा एकादशी व्रत की कथा सुने अथवा सुनाये। फिर आरती करें। पूरा दिन निराहार रहें या फलाहार करें। साथ ही ब्रह्मचार्य का पालन करें। रात्रि को चंद्रोदय हो जाने पर दीपदान अवश्य करें। यहां दीपदान का अर्थ दीप जगाकर आरती करने से है। दिन में एक बार ही फल आदि ग्रहण करें। द्वादशी के दिन स्नान आदि कर स्वच्छ हो जाएं। स्नान के बाद ब्रहामण को दान दें। पारण समय में ही व्रत खोलें पूजा करने भोजन करें। हरिवासर में व्रत न खोलें वरना व्रत का फल नष्ट हो जाता है।

रमा एकादशी व्रत में इस शुभ मुहूर्त में करें पूजा

रमा एकादशी तिथि 3 नवंबर को को 05:10 बजे शुरु होगी और 4 नवंबर को 03:13 बजे समाप्त होगी। रमा एकादशी पारण का समय 4 नवंबर को सुबह 08:47 से 08:49 बजे तक रहेगा।

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रमा एकादशी व्रत की कथा

प्राचीन समय में मुचुकुंद नाम के एक राजा थे। जिनकी मित्रता देवराज इंद्र, यम, वरुण, कुबेर एवं विभीषण से थी। वह बड़े धार्मिक प्रवृति वाले व सत्यप्रतिज्ञ थे। उनके राज्य में सभी सुखी थे। उनकी चंद्रभागा नाम की एक पुत्री थी, जिसका विवाह राजा चंद्रसेन के पुत्र शोभन के साथ हुआ था। एक दिन शोभन अपने श्वसुर के घर आया तो संयोगवश उस दिन एकादशी थी। शोभन ने एकादशी का व्रत करने का निश्चय किया। चंद्रभागा को यह चिंता हुई कि उसका पति भूख कैसे सहन करेगा? इस विषय में उसके पिता के आदेश बहुत सख्त थे। राज्य में सभी एकादशी का व्रत रखते थे और कोई अन्न का सेवन नहीं करता था। शोभन ने अपनी पत्नी से कोई ऐसा उपाय जानना चाहा, जिससे उसका व्रत भी पूर्ण हो जाए और उसे कोई कष्ट भी न हो, लेकिन चंद्रभागा उसे ऐसा कोई उपाय न सूझा सकी। निरूपाय होकर शोभन ने स्वयं को भाग्य के भरोसे छोड़कर व्रत रख लिया। लेकिन वह भूख, प्यास सहन न कर सका और उसकी मृत्यु हो गई। इससे चंद्रभागा बहुत दु:खी हुई। पिता के विरोध के कारण वह सती नहीं हुई। उधर शोभन ने रमा एकादशी व्रत के प्रभाव से मंदराचल पर्वत के शिखर पर एक उत्तम देवनगर प्राप्त किया। वहां ऐश्वर्य के समस्त साधन उपलब्ध थे। गंधर्वगण उसकी स्तुति करते थे और अप्सराएं उसकी सेवा में लगी रहती थीं। एक दिन जब राजा मुचुकुंद मंदराचल पर्वत पर आए तो उन्होंने अपने दामाद का वैभव देखा। वापस अपनी नगरी आकर उसने चंद्रभागा को पूरा हाल सुनाया तो वह अत्यंत प्रसन्न हुई। वह अपने पति के पास चली गई और अपनी भक्ति और रमा एकादशी के प्रभाव से शोभन के साथ सुखपूर्वक रहने लगी।

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