
दान
भारत विभाजन से पहले की बात है। करांची शहर में एक चिकित्सालय बनाने के लिए जोर-शोर से धन संग्रह अभियान चल रहा था। एक दिन संग्रह समिति के सदस्य नगर के जाने-माने समाजसेवी जमशेद मेहता के पास पहुंचे। उन्होंने मेहताजी को बताया- जो व्यक्ति इस अस्पताल के लिए 10 हजार रुपये का दान करेगा, उसके नाम वाली संगमरमर की पट्टी अस्पताल में लगाई जाएगी।
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यह सुनकर मेहता जी मन ही मन मुस्कुराए और फिर कुछ सोचते हुए उन्होंने पचास-पचास के नोटों की दो गड्डियां समित सदस्यों के सामने रख दीं। समिति के कोषाध्यक्ष ने नोट गिने। उसने एक बार नहीं, कई बार नोट गिने, पर हर बार वे 9900 ही निकले।
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कोषाध्यक्ष ने कहा- मेहता जी, पूरे दस हजार नहीं हैं। एक सौ का नोट और दे दीजिए, ताकि आपके नाम की पटटी...।
मेहताजी बीच में बोल पड़े, भाई इसीलिए तो सौ रुपये कम दिए हैं। मैं यह नहीं चहता कि मेरे द्वारा दिए गए दान का प्रचार हो। यदि प्रचार किया गया तो क्या निर्धन व्यक्ति कुंठित नहीं होंगे? उनमें दान के प्रति प्रेरणा कैसे जागेगी? वे क्यों दान करेंगे? इसी तरह यदि दान के बदले धनी व्यक्तियों का प्रचार किया गया, तो ऐसे दान का कोई अर्थ नहीं रह जाएगा। यह सुनकर समिति के सदस्यों के सिर श्रद्धा से मेहताजी के सामने झुक गए।
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सीख
देने वाला और है, देता है दिन रैन,
लोग भरम मो पै करें, ताते नीचे नैन।
अहम भावन पीछे हट तू, विनम्रता का बढ़ता वास,
सहनशीलता होती गहरी, बढ़ जाता आत्मविश्वास।
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प्रस्तुतिः सतीश चन्द्र अग्रवाल
आनंद वृंदावन, संजय प्लेस, आगरा
Published on:
15 Jul 2018, 8:42 AM IST
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