दूसरों की जय से पहले खुद को जय करें: सलिल भट्ट

दूसरों की जय से पहले खुद को जय करें: सलिल भट्ट

Uday Kumar Patel | Publish: Jan, 13 2018 10:27:10 PM (IST) Ahmedabad, Gujarat, India

युवा संगीतज्ञ व सात्विक वीणा के आविष्कारक से पत्रिका की विशेष बातचीत

उदय पटेल

अहमदाबाद. युवा संगीतज्ञ, सात्विक वीणा के आविष्कारक और जाने-माने संगीतज्ञ पंडित विश्व मोहन भट्ट के सुपुत्र सलिल भट्ट के लिए इस बार सप्तक काफी अहम रहा। राजस्थान के जयपुर के बांशिदे भट्ट ने इस समारोह में अपने पिता व गुरु पंडित भट्ट के साथ पहली बार प्रस्तुति दी। पेश है पत्रिका से उनकी विशेष मुलाकात के कुछ अंश।

पिता के साथ मंच पर आसीन होना रोचक
देश के सबसे बड़े शास्त्रीय संगीत समारोह-सप्तक-में पहली बार पिता पंडित विश्व मोहन भट्ट के साथ रोचक है। पंडित जी उनके गुरु हैं। गुरु के साथ प्रस्तुति देना अग्निपथ से गुजरने जैसा है। यह एक दंगल की तरह है। 90 से ज्यादा देशों में प्रस्तुति दे चुके गुरु के समक्ष बैठना या उनका बिठाना उनकी एक कृपा है। यह किसी भी शिष्य के लिए हर्ष, उल्लास और गर्व का विषय है।
उनके आर्शीवाद से वे खुद 40 देशों में अपनी प्रस्तुति दे चुके हैं। यह अपने आप में काफी रोचक है। उनके गुरु की बहुत बड़ी देन और कृपा है कि अपने साथ मंच पर आसीन होने का उन्होंने मौका दिया।

सप्तक देश का लंबा चलने वाला संगीत समारोह
अपने पुत्र सात्विक के नाम पर सात्विक वीणा को जन्म देने वाले तथा तंत्री सम्राट सहित कई सम्मान व उपाधि से सम्मानित सलिल ने कहा कि वे सप्तक परिवार से जुड़े हुए हैं। पिछले करीब 40 वर्षों से सप्तक हमारे देश में चलने वाला सबसे लंबा संगीत समारोह है। पिछले करीब 38-40 वर्षों से यह समारोह चल रहा है। परिवार के सदस्य के नाते इसमें उनकी प्रस्तुति हो रही है। पिछले करीब 40 वर्षों से सप्तक हमारे देश में चलने वाला सबसे लंबा संगीत समारोह है। देश दुनिया में इसका नाम है। दर्जनों, सैंकड़ों कलाकार सप्तक में अपनी प्रस्तुति देते हैं। दुनिया के 25 देशों से भी ज्यादा जगहों से श्रोता यहां सुनने आते हैं। किसी भी कलाकार के लिए यहां प्रस्तुति देना गर्व का विषय है।

संगीत को लेकर नीति बनाए सरकार
कुछ ही दिनों में जीवन के 47वें वसंत में प्रवेश करने वाले सलिल ने कहा कि युवा आज शास्त्रीय से विमुख हो रहे हैं। वे मीडिया से आग्रह कर रहे हैं कि एक स्लॉट या एक समय का निर्धारण शास्त्रीय संगीत के लिए होना चाहिए। सिर्फ कॉमर्शियल, मनोरंजन ही अपनी पीढ़ी को दिखाया जाएगा तो अच्छा नहीं होगा। युवा संस्कृति से विमुख होंगे तो यह सही नहीं है। सरकार और बड़े-बड़े कॉरपोरेट को इस संबंध में सोचना जरूरी है। सरकार को संगीत को लेकर नीति बनानी चाहिए।
कई सरकारें आईं, सभी ने यह दावा किया कि संगीत को लेकर नीति बनाई जाएगा। हमारी संस्कृति बचाना, सभ्यता बचाना जरूरी है क्योंकि हमें सभ्यता-संस्कृति-संगीत से हमारा लगाव नहीं रहा है।
अपनी संस्कृति से हम विमुख हो रहे हैं। यह बात कही जा चुकी है कि बिना संस्कृति, बिना संगीत, बिना साहित्य, बिना संस्कार के इंसान की तुलना बिना पूछ व बिना सिंह के जानवर से की जाती है।


युवा ही बदल सकते हैं स्थिति
जर्मनी की संसद में अपनी प्रस्तुति दे चुके सलिल ने कहा कि आज युवाओं के हाथ में स्मार्ट फोन है और उनके पास सेकण्डों में लाखों जानकारियां मिलती है, लेकिन आज की युवा पीढ़ी क्या कर रही है। वे स्पीकमैके के माध्यम से स्कूल-कॉलेजों में कार्यक्रम जाते हैं और वहां पर यह पूछते हैं कि आप लोगों में से कितने लोगों ने यूृट्यूब या सोशल मीडिया पर भारतीय शास्त्रीय संगीत के किसी कार्यक्रम की कोई क्लीपिंग देखी है, तो एक हजार में से एक या दो हाथ दिखते हैं।
इसे युवा ही बदलेंगे। जूता खरीदना है तो विदेशी कंपनियां का चयन करते हैं और जब सभ्यता-संस्कृति का चयन करना है तो भी विदेशी चयन किया जाता है। समाज को क्या हो रहा है। हमारे युवा कहां जा रहे हैं। युवाओं को उनका संदेश है कि इतने सारे संसाधन आ गए हैं लेकिन शास्त्रीय संगीत को लेकर कुछ करते नहीं हैं। खुद का विवेक होना बहुत जरूरी है। समाज में संस्कार जरूरी है।

विदेशों में हो रही है शास्त्रीय संगीत की पूजा
कनाडा के जूनो अवार्ड के लिए नामांकन पा चुके सलिल ने बताया कि विदेशों में भारतीय संगीतज्ञों की ओर से पिछले कई वर्षों से प्रचार-प्रसार किया जा रहा है। जर्मनी, आईसलैण्ड, जापान जैसे करीब 40 देशों में वे खुद प्रस्तुति दे चुके हैं। वहां की जनता टिकट लेकर देखने आते हैं। जापान में शास्त्रीय संगीत की काफी डिमांड है। विदेशों में शास्त्रीय संगीत की खूब कदर है। वे इस संगीत की पूजा कर रहे हैं। देशवासी को सोचना समझना चाहिए कि वे अपनी चीज की कदर करें। दूसरों की जय से पहले, खुद को जय करें। अपनी संस्कृति को पहले जय करें।

राजस्थान सरकार की ओर से कोई प्रयास नहीं
सेना में अधिकारी के लिए चयनित हो चुके इस संगीतज्ञ ने बताया कि वे जिस राज्य राजस्थान से आते हैं वहां शास्त्रीय संगीत को बढ़ाने के कोई प्रयास नहीं किए गए। मध्य प्रदेश , गुजरात, पश्चिम बंगाल में संगीत के लिए बहुत कुछ हो रहा है। गुजरात में निजी तौर पर सप्तक का आयोजन किया जा रहा है। और सरकारों राजस्थान इस मामले में काफी पिछड़ा हुआ है। शास्त्रीय संगीत को लेकर सरकार के प्रयास नहीं के बराबर हो रहे हैं। कहीं कोई नीति नहीं हैं। सरकार की ओर से कोई बड़ा फेस्टिवल नहीं हो रहा है।

 

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