
अजमेर जिले की लाइफ लाइन माने जाने वाली बीसलपुर योजना से अब पार नहीं पड़ रही है। अव्वल तो पानी का तय कोटा पूरा नहीं मिल रहा। तिस पर आबादी के लिहाज से योजना हांफने लगी है। गर्मी के अलावा भी सभी सीजन में पेयजल किल्लत बढ़ना इसका सूचक है। जिले की प्यास बुझाने के लिए 1997-98 में बीसलपुर बांध से जलापूर्ति शुरू हुई। तब बांध केवल अजमेर-ब्यावर क्षेत्र की जलापूर्ति के लिए बनाया गया था। 315.50 आरएल मीटर क्षमता वाला बीसलपुर बांध 25 साल में हांफने लगा है। 2005-06 में जयपुर, टोंक की जलापूर्ति को इससे जोड़ दिया गया। इसके बाद से परेशानी लगातार कायम है।
अजमेर, केकड़ी, ब्यावर में 57 बांध, तालाब और झीलें। इनमें क्षमता का 37 प्रतिशत ही पानी रहता है। सालभर में 40 साल से ज्यादा बांध, तालाब सूख जाते हैं। बरसात में 5000 में से 2500 एमसीएफटी पानी ही बांध, तालाब, झीलों तक पहुंचता है, बाकी बेकार बह जाता है।
ईआरसीपी 2016 में बनाई गई थी। आठ साल में भी 1316 करोड़ रुपए से नौनेरा बैराज निर्माणाधीन है। इसकी पानी स्टोरेज की क्षमता 227 मिलियन क्यूबिक मीटर है। ईसरदा में भी 400 करोड़ से डैम निर्माणाधीन है। इसके तहत बारां में किशनगंज के रामगढ़ में कूल नदी और मांगरोल में पार्वती नदी पर महलपुर बैराज बनाए जा रहे हैं। पूरी परियोजना की संभावित लागत 40 हजार करोड़ रुपए है।
अजमेर शहर की डिमांड 140 एमएलडी, ग्रामीण, पुष्कर व पेराफेरी डिमांड - 20 एमएलडी
कुल डिमांड 160 एमएलडी, मिल रहा-120 एमएलडी
ब्यावर की डिमांड 40 एमएलडी, मिल रहा-27 एमएलडी
किशनगढ़ की डिमांड 35 एमएलडी, मिल रहा-24 एमएलडी
बीसलपुर से नहीं मिल रही पर्याप्त जलापूर्ति
अजमेर, ब्यावर, किशनगढ़, नसीराबाद, पुष्कर में 72 से 96 घंटे में जलापूर्ति
35 प्रतिशत आबादी को टैंकरों से जलापूर्ति
55 प्रतिशत घरों में ही नलों से पहुंचता है पानी
10 प्रतिशत लोग कुओं, हैंडपम्प, ट्यूबवैल पर निर्भर
जलदाय विभाग का 48 घंटे में जलापूर्ति का दावा
अजमेर जिला सिर्फ बीसलपुर पर निर्भर है। भू-जल स्तर में गिरावट से जिला डार्क जोन में है। जिले की 20 लाख आबादी के लिहाज से बीसलपुर परियोजना अब पर्याप्त नहीं है।
प्रो. सुनीता पचौरी, सेवानिवृत्त भूगोल विभाग, एसपीसी-जीसीए
Published on:
23 May 2024 11:06 am
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