Patrika Pride women: ....अरुणा ने महिलाओं को दिखाई राह, बनवाया आरटीआई कानून

धरने और लम्बे संघर्ष के बाद आमजन को सशक्त कानून मिला। सूचना के अधिकार कानून के तहत प्रतिवर्ष 80 लाख आवेदन मिलना इसकी कामयाबी है।

By: raktim tiwari

Published: 26 Sep 2021, 05:45 PM IST

रक्तिम तिवारी/अजमेर.

मजदूर और किसान की समस्याओं और पंचायत स्तर पर दस्तावेज और कामकाज की पारदर्शिता को सूचना का अधिकार कानून का जामा पहनाने वाली अरुणा राय किसी पहचान की मोहताज नहीं हैं। ब्यावर के चांग गेट पर चंद लोगों के धरने और लम्बे संघर्ष के बाद आमजन को सशक्त कानून मिला। सूचना के अधिकार कानून के तहत प्रतिवर्ष 80 लाख आवेदन मिलना इसकी कामयाबी है।

रॉय 1968 में 22 वर्ष में बतौर आईएएस अधिकारी चयनित हुई। कुछ साल नौकरी की। लेकिन किसान, मजदूर, महिलाओं-बालिकाओं की आर्थिक, सामाजिक, शैक्षिक और जीविकोपार्जन से जुड़ी समस्याओं को देखकर लगा कि ब्यूरोक्रेट रहते इन्हें सुलझाना आसान नहीं है। उन्होंने तत्काल नौकरी छोड़कर सामाजिक सेवा की राह पकड़ी।

दिया सूचना का अधिकार
अरुणा का मानना है कि मानव्हीसिल ब्लोअर के बगैर कोई देश-समाज संतुलित नहीं रह सकता है। केवल बनाना और थोपना लोकतंत्र नहीं हैं। सूचना के अधिकार में पीएम केयर्स फंड या राजनैतिक दलों को चंदे में मिली राशि की जानकारी लेने के लिए व्हीसिल ब्लोअर होना अनिवार्य है। राय ने किसान मजदूर शक्ति संगठन की अगुवाई में पंचायत स्तर पर भ्रष्टाचार का पकड़ा। लम्बे संघर्ष और सियासी अड़चनों के बाद देश को सूचना का अधिकार कानून-2005 मिला।

महिलाओं को दिया बढ़ावा
अरुणा का कहना है कि भारत में महिलाएं सदियों से घरेलू और सामाजिक हिंसा का शिकार हैं। हालांकि दहेज प्रथा रोकने के लिए कानून बना लेकिन शत-प्रतिशत कामयाबी दूर है। स्वाधीनता के 74 साल बाद भी ठेठ ग्रामीण और पिछड़े इलाकों में बालिकाएं पांचवीं-आठवीं अथवा बारहवीं के बाद पढ़ नहीं पातीं। उन्होंने पति बंकट रॉय के साथ मिलकर महिला स्वावलम्बन
के लिए बेयरफुट कॉलेज खोला। यहां फिलीपींस, दक्षिण अफ्रीका, तंजानिया, मिस्र, अफगानिस्तान, श्रीलंका, कम्बोडिया सहित कई देशों की महिलाएं सौर ऊर्जा लाइट और उपकरण बनाना सीख रही हैं।

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