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180 वर्ष पुरानी सिलीसेढ़ झील को संरक्षण की दरकार, भूल रही सरकार….पढ़ें यह न्यूज

अरावली के पहाड़ी क्षेत्र मेंं बारिश के जल को संग्रहित करने के लिए 1844 ईस्वी में झील व महल का निर्माण अपनी रानी शीला के लिए राजा विनय सिंह ने कराया था निर्माण।

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मालाखेड़ा. रियासत काल में पहाड़ी क्षेत्र में बर्बाद हो रहे बारिश के जल को संग्रहण करने के लिए राजा विनय सिंह ने कृत्रिम सिलीसेढ झील का निर्माण करीब 180 वर्ष पहले कराया। अब इसके सरंक्षण की दरकार है। यह झील अलवर शहर तथा ग्रामीण के लिए वरदान साबित हुई।

अरावली पर्वत के गांव ढहलावास, बीणक, बख्तपुरा, सिरावास, रूध सिरावास, हदरीमैडा, किशनपुर, पैतपुर क्षेत्र से बारिश का पानी बर्बाद होता था। जनहित के लिए इस कृत्रिम झील का निर्माण कराया गया। झील में वोटिंग भी हो रही है तथा अब रानी का महल आरटीडीसी के अधीन है। झील से लेकर अलवर शहर तक पक्की नहर बनाई गई। इससे पंचायत समिति उमरैण के बाढ़ केसरपुर, उद्यान विभाग, वन विभाग, लालडिग्गी, नारायण विलास नर्सरी, राज ऋषि कॉलेज, फूलबाग पैलेस, होटल स्वरूप विलास, कंपनी बाग, नेहरू गार्डन, जिला प्रमुख आवास तक नहर के पानी से आबाद रहते थे। बदलते समय और प्रशासन की उदासीनता ने नहर पर ग्रहण लगा दिया।

क्षेत्र रहता था हरा-भरा

रियासत काल से लेकर अब तक खेती-बाड़ी सिंचाई, उद्यान को बारिश का जल पूरे क्षेत्र को हरा-भरा करता था। आज वह सभी क्षेत्र पानी और सिंचाई के अभाव में बर्बादी के कगार पर हैं। मालाखेड़ा तथा अलवर उपखंड क्षेत्र में रियासत काल के समय बनाए गए तालाब, बावड़ी़, बांध, झील का संरक्षण और देखरेख नहीं होने के कारण वह बर्बादी के कगार पर है। रियासत कालीन रिकॉर्ड के मुताबिक झील प्राकृतिक सुंदरता लिए हुए अलवर शहर से 16 किलोमीटर दूर पश्चिम में है। इसका निर्माण 1844 ईस्वी में झील व महल का निर्माण अपनी रानी शीला के लिए करवाया। खुदाई कार्य करने पर शांति बनी रहे इसके लिए माता शीतला की स्थापना कराई। झील का पानी शहर तक लाने को तत्कालीन कलक्टर डॉ. जितेंद्र सोनी ने जनप्रतिनिधियों के सहयोग से प्रयास शुरू किया, लेकिन खींचतान के कारण इस झील का पानी लालडिग्गी तक नहीं पहुंच पाया और इसी दौरान उनका स्थानांतरण भी हो गया।

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रूपारेल नदी में सिमट रही जल राशि

अकबरपुर. सरिस्का की वादियों से निकलने वाली रूपा रेल नदी जिले की मात्रा एक जीवित नदी है, लेकिन इन दिनों मानसून की बेरुखी के कारण अब पानी सीमित मात्रा में रह गया है। बड़ी मात्रा में पानी जयसमंद बांध तक जाता था। अलवर का जयसमंद बांध सूखा पड़ा है। रियासत काल में राजाओं की ओर से नदी का बंटवारा किया गया। उस समय नटनी का बारा में झूला पुल हुआ करता था, लेकिन बरसात में टूट जाने के बाद अब यह पुल बनाया है। रूपा रेल से पहले कई गांव के खेतों में सिंचाई होती थी। जयसमंद बांध काफी वर्षों से प्यासा है। स्थानीय निवासी रामहेत गुर्जर आदि का कहना है कि रूपा रेल नदी दो जिलों की प्यास बुझाती है सन 1996 में जयसमंद बांध की उपरा चली थी और अब करीब 29 साल से पानी नहीं होने के कारण सूखा पड़ा है। हनुमान प्रसाद शर्मा कहना है कि भरतपुर की ओर जाने वाले नदी के हिस्से में कुछ रोक लगाई जाए तभी जयसमंद बांध भरेगा और पानी की समस्या दूर होगी।