
यूआईटी के अभियंताओं पर लग सकती है धारा 420 और धारा 120- बी
धर्मेन्द्र अदलक्खा
अलवर.अलवर यूआईटी के कारनामों से सब वाफिक हैं। यूआईटी के 47 कर्मचारियों और अधिकारियों ने मिली-भगत कर शहर की पुरानी और मौके की कॉलोनियों में बेशकीमती प्लॉट अपने नाम आवंटन करा लिए। यह मामला राज्य स्तर पर चर्चित हुआ और विधानसभा में भी उठा लेकिन अभी तक प्रशासन ने इस आवंटन प्रक्रिया को निरस्त नहीं किया है। हाल यह है कि यूआईटी के दो अभियंताओं की मौके के प्लॉट पर नजर थी जिसे पिछले छह माह से नीलामी से बचाए रखा। यही नहीं दो प्लॉटों के साइज की कम बता दिए जो इनको नियमानुसार आवंटित ही नहीं हो सकते थे। अलवर यूआईटी में एक पखवाड़ा पहले 8 सितम्बर को प्लॉट आवंटन के लिए लाटरी तक निकाल ली। इस मामले को पूरी तरह गोपनीय रखा गया।
इस मामले के समाचार पत्रिका में राज्य स्तर पर चर्चित रहा और बाद में जिसे शहर विधायक संजय शर्मा ने विधानसभा में भी उठाया। इस प्रकरण की तथ्यात्मक रिपोर्ट मुख्यमंत्री कार्यालय ने भी मंगवाई और प्रदेश में नगरीय विकास के उच्चाधिकारियों की इस पर नजर है। इसके बावजूद यूआईटी ने इन प्लॉटों की पूरी प्रक्रिया को निरस्तकरने की कोई कार्रवाई शुरू ही नहीं की है।दो अभियंताओं ने तथ्य छिपाकर करा लिए बड़े साइज के प्लॉट आवंटित-यूआईटी अलवर के दो अभियंताओं ने नियमों के विपरीत दो प्लॉट अपने नाम आवंटित करा लिए। इनमें एक अभियंता नगर परिषद से भ्रष्टाचार के मामले में निलंबित भी रहे जो हमेशा ही चर्चित रहे हैं। इन्होंने बुध विहार में 500 वर्ग गज से अधिक का प्लॉट आवंटन करवाया जबकि एक अभियंता ने सूर्य नगर में 400 वर्ग गज से अधिक का प्लॉट कार्नर का आवंटित करवाया जिसको पिछले एक साल से नीलामी में नहीं लगने दिया। ये दोनों अभियंता इन प्लॉटों के साइज को लेकर टाइटल में ही नहीं आते थे।
प्रशासन करा सकता है मुकदमा दर्ज-
यूआईटी में करोड़ों के प्लॉट आवंटन में तथ्यों को छिपाकर राजस्व को हानि पहुंचाने व धोखाधड़ी करने के आरोप में मुकदमा दर्ज करवा सकता है लेकिन प्रशासन मकदमा दर्ज कराने के बजाए फाइल को लंबित करके बैठा है जिससे बाद में समय अनुकूल रहने पर प्लॉट दिए जा सके। इस मामले में आपराधिक मामले के अधिवक्ता सरदार तारा सिंह सहित विशेषज्ञों ने बताया कि यह तो सीधे-सीधे 420 में मुकदमा बनता है। इसके साथ ही यह 120 बी भी सामने आ रहा है। यदि आपने जुर्म नहीं किया लेकिन आप साज- बाज तो थे।
आपके लिए यह आपराधिक कृत्य हुआ है तो यह 120 बनता है। जब नियमानुसार प्लॉट इतने बड़े साइज का नहीं दिया जा सकता है तो यूआईटी ने क्यों दिया? दूसरा यह कि उसका साइज यदि छोटा दिखा कर लाटरी निकाली गई तो यह जानबूझ कर तथ्य छिपाना है। तीसरी बात यह है कि राजकीय कार्य में पारदर्शिता क्यों नहीं बरती गई? इसकी सार्वजनिक सूचना क्यों नहीं दी गई और इसमें मीडिया कर्मियों को क्यों नहीं बुलाया गया। जब बाघ के मरने पर मीडिया कर्मियों को बुलाना अनिवार्य किया हुआ है तो यह भी अलवर के लिए बड़ा मामला है जिससे आम आदमी की दूरी बनाई रखी गई।
इस मामले में यूआईटी सचिव को मुकदमा दर्ज कराना और आवंटन तत्काल निरस्त करना चाहिए। इसमें कोई भी संगठन आपराधिक मुकदमा दर्ज करवा सकता है।
मैं तो अभी नई आई हूं, समझ रहीं हूं-
यूआईटी की सचिव डॉ. मंजू चौधरी कहती हैं कि मैंने अभी यूआईटी का कार्य भार संभाला है। मैं इस प्लॉट आवंटन की फाइल को देख नहीं पाई हूं। हमारा पूरा ध्यान प्रशासन शहरों की ओर में लगने वाले शिविरों की तरफ है। अभी प्लॉट निरस्त होने की कोई सूचना मेरे पास नहीं है।
Published on:
22 Sept 2021 10:19 am
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