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सीताराम का किस्सा दिलाता था अंग्रेजी सेना में नौकरी

'किस्सा सीताराम पांडे सूबेदार का' नाम की यह किताब इतनी चर्चित हुई कि अंग्रेजी सेना के प्रशिक्षण के दौरान इसे पाठ्यक्रम में शामिल किया गया।

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Sitaram

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अमेठी. 'किस्सा सीताराम पांडे सूबेदार का' नाम की यह किताब इतनी चर्चित हुई कि अंग्रेजी सेना के प्रशिक्षण के दौरान इसे पाठ्यक्रम में शामिल किया गया। मूलतः अवधी की इस किताब का अंग्रेजों ने अनुवाद भी कराया और इसे पाठयक्रम में लागू किया। बताते हैं कि यह किताब अब भी इंग्लैंड के संग्रहालय में रखी है।बात अजीब है लेकिन है सौ फीसद सच। तिलोई तहसील में जन्मे सीताराम पांडे अंग्रेजी सेना में सूबेदार के पद पर थे। रिटायरमेंट के बाद उन्होंने अंग्रेजी सेना के अनुशासन और व्यवस्था पर अवधी भाषा में किताब लिखी।तिलोई के पांडे का पुरवा गांव निवासी सीताराम पांडे 1812 में बंगाल नेटिव आर्मी की पैदल रेजीमेंट में भर्ती हुए। उन्होंने कई लड़ाइयों में हिस्सा लिया और सिपाही से सूबेदार तक बने। 1860 में वह सेना से सेवानिवृत हो गए यानी 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान वह अंग्रेजी सेना के अंग थे।

इतिहासवेत्ता के अनुसार विद्रोह के आरोप में सीताराम पांडे का पुत्र अनंतीराम पकड़ा गया और उसे उन्हीं के सामने ही गोली मारी गई। सेवानिवृत के बाद वह पेंशन के सिलसिले में अधिकारियों के यहां जाया करते थे और उसी दौरान उनके किस्सागोई स्वभाव को देखते हुए लेफ्टिनेंट कर्नल जेम्स नारगेट ने उन्हें किताब लिखने के लिए प्रेरित किया।बाद में पुस्तक से प्रभावित होकर 1910 में लेफ्टिनेंट कर्नल फिलट ने किताब अंग्रेजी सेना में भर्ती होने वालों के लिए अनिवार्य कर दी। फिलट ने इसका अनुवाद उर्दू में कराया और यह पुस्तक फौजी अखबार में धारावाहिक रूप में प्रकाशित हुई।इंग्लैंड में पुस्तक के लेखक और इसकी प्रमाणिकता को लेकर साहित्यकारों में काफी बहस भी हुई। अवधी के वरिष्ठ साहित्यकार जगदीश पीयूष कहते हैं कि किस्सा सीताराम पांडे सूबेदार अवधी की पहली आत्मकथा है। यह एक एतिहासिक ग्रंथ है और उसकी पांडुलिपि खोजने के लिए सरकार को प्रयास करना चाहिए।