
एक दौर में विलासितापूर्ण समझे जाने वाला हवाई सफर आज आम आदमी की भी अहम जरूरतों में शामिल हो गया है। इसकी वजह यही रही है कि लोगों का आर्थिक स्तर तो बढ़ा ही है, समय के साथ-साथ हवाई यात्रा सेवाओं का भी खूब विस्तार हुआ। इसीलिए यह कहा जाने लगा है कि हवाई यात्रा अब सिर्फ अमीरों के लिए ही नहीं रह गई है। इस तथ्य के बावजूद प्रमुख त्योहारों व छुट्टियों के मौकों पर तो हवाई यात्रा की पहुंच सक्षम लोगों तक ही पहुंचती नजर आती है। संकट उनके सामने भी है, जिन्हें आपात स्थिति या मजबूरी के कारण न चाहते हुए भी हवाई यात्रा को आखिरी विकल्प के रूप में चुनना पड़ता है। किराया निर्धारण की नियामक व्यवस्था नहीं होने से देश के प्रमुख घरेलू हवाई मार्गों पर हर साल की तरह इस बार भी त्योहार के मौके पर हवाई टिकटों के दाम आम आदमी की पहुंच से बाहर हो गए हैं। विमानन कंपनियों की मुनाफाखोरी की बढ़ती प्रवृत्ति का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि त्योहार के मौकों पर पिछले साल के मुकाबले हवाई यात्रा का किराया तीस से चालीस फीसदी तक बढ़ गया है। इतना ही नहीं, कुछ मार्गों पर तो अब तक मिलने वाले टिकट के दाम भी बढ़कर तीन गुणा तक पहुंच गए हैं। किसी भी सेवा या वस्तु की मांग अधिक होने पर उसके मनमाने दाम बढ़ाना वस्तुत: उपभोक्ता अधिकारों के खिलाफ है।
लेकिन चिंता इस बात की है कि न तो सरकार को उपभोक्ताओं के इस अधिकार की चिंता है और न ही विमानन कंपनियों को। दरअसल, अपनी सुविधा के अनुसार लाभ-हानि का हिसाब लगाने वाले तंत्र से तो किसी संवेदनशीलता की उम्मीद करना ही व्यर्थ है। यही वजह है कि एक ही दिन और एक ही रूट पर अलग-अलग विमान कंपनियों के हवाई टिकट के दाम अलग-अलग नजर आते हैं। कंपनियों की मनमानी और सरकार की अनदेखी से यात्रियों की जमकर जेब ढीली हो रही है। त्योहारों, छुट्टियों के दौरान और उड़ान के ऐन पहले हवाई किराया बढऩे का तथ्य कोई नया नहीं है। सामान्य दिनों में भी किराये से जुड़ा विमानन कंपनियों का एल्गोरिदम +मांग और आपूर्ति के सिद्धांत पर काम करता है। ऑनलाइन सिस्टम में बार-बार सर्च करने से किसी भी रूट पर मांग बढ़ती नजर आती है और टिकट के दाम बढ़ जाते हैं। ईंधन के दाम बढऩे व सुविधाओं में विस्तार पर तर्कसंगत वृद्धि तो ठीक है लेकिन मनमानी वृद्धि को सुप्रीम कोर्ट भी सुनवाई के दौरान यात्रियों के शोषण की संज्ञा दे चुका है।कोर्ट के निर्देश पर सरकार इस दिशा में नियम-कायदे बनाने की बात जरूर कर रही है लेकिन नियम-कायदे बने उससे पहले प्रत्येक घरेलू विमान सेवा में किराये की अधिकतम सीमा (कैप) लागू करना ही इस दिशा में राहत का कदम हो सकता है। इंडिगो संकट के दौरान सरकार ऐसा कर चुकी है लेकिन यह व्यवस्था अल्पकालिक न होकर स्थायी करने की जरूरत है।