
संयुक्त राष्ट्र चार्टर की शुरुआत इस संकल्प से होती है कि भावी पीढिय़ों को युद्ध की विभीषिका से बचाया जाए। लेकिन यूक्रेन के खिलाफ रूस का युद्ध चौथे वर्ष में प्रवेश कर चुका है, जो यह बताता है कि संयुक्त राष्ट्र अपने मूल उद्देश्य से कितनी दूर जा चुका है। समस्या केवल युद्ध रोकने में विफलता की नहीं है, बल्कि यह है कि अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा बनाए रखने की जिम्मेदारी जिस निकाय पर है, उसी में युद्ध छेडऩे वाला देश वीटो का इस्तेमाल कर रहा है।1991 में सोवियत संघ के विघटन के बाद रूस ने उत्तराधिकारी के रूप में उसकी स्थायी सीट कब्जा ली। अब जब भी सुरक्षा परिषद रूस की आक्रामकता के खिलाफ कदम उठाने की कोशिश करती है, क्रेमलिन उसे रोक देता है। महत्वपूर्ण सवाल यह है कि रूस को संयुक्त राष्ट्र और सुरक्षा परिषद की सदस्यता मिली कैसे? उसने सोवियत संघ की वीटो वाली स्थायी सीट किस कानूनी आधार पर हासिल की?
चार्टर के अनुच्छेद 23 में आज भी सोवियत संघ का नाम दर्ज है। सोवियत संघ 1945 में इसका संस्थापक सदस्य था। तब यूक्रेन और बेलारूस भी संस्थापक सदस्यों में शामिल थे। लेकिन आज के रूसी संघ के बारे में ऐसा नहीं कहा जा सकता। 8 दिसंबर 1991 को बेलारूस, रूस और यूक्रेन ने घोषणा की कि सोवियत संघ अंतरराष्ट्रीय कानून के विषय के रूप में अस्तित्व में नहीं रहा। इसके बाद 21 दिसंबर को अल्मा-अता में राष्ट्रकुल के सदस्यों ने रूस द्वारा सोवियत संघ की सदस्यता और स्थायी सीट जारी रखने का समर्थन किया। लेकिन इसे कोई औपचारिक कानूनी जामा नहीं पहनाया गया। 24 दिसंबर को तत्कालीन रूसी राष्ट्रपति येल्तसिन ने यूएन महासचिव को पत्र लिखकर कहा कि सदस्यता रूसी संघ द्वारा जारी रखी जा रही है। इस पत्र की कानूनी हैसियत पर सवाल उठता है, क्योंकि रूस ने निर्धारित प्रक्रिया का पालन नहीं किया था। चार्टर के अनुसार, नए सदस्य को औपचारिक आवेदन देना होता है। सुरक्षा परिषद आवेदन पर विचार कर महासभा को सिफारिश करती है, जिसके बाद महासभा में मतदान होता है। ऐसा कोई प्रमाण नहीं है कि रूस ने यह प्रक्रिया पूरी की हो।
इतिहास में इसका महत्वपूर्ण उदाहरण यूगोस्लाविया है। 1992 में विघटन के बाद जब पूर्व यूगोस्लाविया ने स्वयं को पुराने राज्य का उत्तराधिकारी बताया, तो सुरक्षा परिषद ने प्रस्ताव 777 के जरिये उसका दावा खारिज कर दिया। इसके विपरीत, दिसंबर 2022 में जब यूक्रेन ने आपत्ति की कि रूस की सदस्यता कभी विधिवत स्थापित ही नहीं हुई, तो इस पर कोई ठोस जवाब नहीं आया। चीन का उदाहरण भी प्रासंगिक है। 1971 में दो सरकारों की दावेदारी के बीच महासभा ने मतदान के जरिये पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना को चीन का एकमात्र वैध प्रतिनिधि माना। हालांकि अनुच्छेद 23 में आज भी 'रिपब्लिक ऑफ चाइना' का उल्लेख है। यदि चीन के प्रतिनिधित्व का फैसला मतदान से हुआ, तो समाप्त हो चुके सोवियत संघ की सीट का उत्तराधिकारी केवल एक पत्र से कैसे तय हो गया?
1950 का 'यूनाइटिंग फॉर पीस' (प्रस्ताव 377) भी एक विकल्प है, जिसके तहत 27 फरवरी 2022 को आपात सत्र बुलाया गया। चूंकि यह प्रक्रियागत निर्णय था, इसलिए रूस इसे वीटो नहीं कर सका। हालांकि इससे वीटो को दरकिनार किया जा सकता है, पर स्थायी सीट की वैधता का सवाल नहीं सुलझता। महासभा निंदा कर सिफारिशें दे सकती है, पर निर्णय केवल सुरक्षा परिषद के ही बाध्यकारी होते हैं। इसलिए रूस की सदस्यता का सवाल व्यापक सुधार से अलग रखा जाना चाहिए। इसके लिए वीटो समाप्त करने या चार्टर संशोधन की जरूरत नहीं। कूटनीतिक संवाद के लिए परमाणु शक्ति संपन्न रूस को परिषद में बनाए रखने का तर्क दिया जाता है, लेकिन सदस्यता की समीक्षा का अर्थ कूटनीति का अंत नहीं है।महासभा को रूसी संघ के पूर्व सोवियत संघ का प्रतिनिधि होने की वैधता की औपचारिक समीक्षा करनी चाहिए। निष्कर्ष पहले से तय होना जरूरी नहीं है, लेकिन नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था का तकाजा है कि इस पर मतदान हो। केवल नाम पट्टिका होने से मेज पर बैठने का अधिकार नहीं मिल जाता, अधिकार नियमों से मिलता है।
डेनिस श्टिलियरमैन, यूक्रेन की प्रमुख निजी रक्षा विनिर्माण कंपनी फायर पॉइंट के सह-संस्थापक (प्रोजेक्ट सिंडिकेट)