
Lord Krishna: मथुरा की कुंज गलियों में बांसुरी की तान छेड़ने वाले और द्वारकाधीश बनकर संसार को धर्म का पाठ पढ़ाने वाले भगवान श्रीकृष्ण का मध्य प्रदेश की धरा से अटूट और गूढ़ संबंध रहा है। यहां न केवल कान्हा की शिक्षा-दीक्षा की तपोभूमि है, बल्कि इस धरा को द्वारकाधीश के ससुराल होने का भी सौभाग्य प्राप्त है। भगवान श्रीकृष्ण की आठ पटरानियों रुक्मिणी, सत्यभामा, जाम्बवती, कालिंदी, मित्रविंदा, सत्या, भद्रा और लक्ष्मणा में से तीन महारानियों माता रुक्मिणी, माता जाम्बवती और माता मित्रविंदा का सीधा संबंध प्रदेश से है। धार का अमझेरा, उज्जैन का अवंतिका धाम और रायसेन का जामगढ़, ये तीनों क्षेत्र उनकी ससुराल के रूप में पूजे जाते हैं।
धार्मिक ग्रंथ प्रेम सागर और भागवत पुराण के पन्नों में एक बड़ी ही रोचक कथा दर्ज है। द्वारका में सत्राजित के पास रोजाना 20 तोला सोना देने वाली अलौकिक स्यमंतक मणि थी। सत्राजित का भाई प्रसेनजित जब उस मणि को पहनकर जंगल गया, तो एक सिंह ने उसका वध कर दिया। मणि खोने पर निर्दोष श्रीकृष्ण पर चोरी का झूठा लांछन लग गया। इस कलंक को मिटाने स्वयं भगवान विंध्याचल की घनी पहाड़ियों में छिपी रायसेन जिले की जामगढ़ गुफा पहुंचे। गुफा में स्यमंतक मणि त्रेतायुगीन योद्धा जामवंत के पास थी। मणि वापस पाने के लिए प्रभु और जामवंत के बीच 27 दिनों तक घनघोर मल्लयुद्ध चला। जब जामवंत ने अपने प्रभु के असली भगवद स्वरूप को पहचाना, तो उन्होंने भावविभोर होकर नमन किया। उन्होंने मणि के साथ अपनी पुत्री जाम्बवती का हाथ भी श्रीकृष्ण को सौंप दिया। रायसेन जिला मुख्यालय से 120 किमी दूर स्थित इस ऐतिहासिक स्थल को अब अंतरराष्ट्रीय पर्यटन मानचित्र पर स्थापित किया जा रहा है।
भगवान श्रीकृष्ण की मुख्य पटरानी देवी रुक्मिणी का संबंध धार जिले के अमझेरा से है। विदर्भ राजकुमारी रुक्मिणी मन ही मन श्रीकृष्ण को अपना पति मान चुकी थीं, लेकिन उनका भाई रुक्मी जबरन शिशुपाल से विवाह रचाना चाहता था। देवी रुक्मिणी के गुप्त संदेश पर कान्हा अमझेरा स्थित अमका-झमका मंदिर पहुंचे। पूजन के दौरान श्रीकृष्ण ने रुक्मिणी का हरण किया और उन्हें द्वारका ले जाकर अर्धांगिनी बनाया।
श्रीकृष्ण की तीसरी पटरानी मित्रविंदा अवंतिका (उज्जैन) के राजा जयसेन की पुत्री थीं। उनके भाई विन्द और अनुविन्द उनका विवाह दुर्योधन से कराना चाहते थे। स्वयंवर में जब अन्यायपूर्वक दुर्योधन के गले में वरमाला डलवाने का प्रयास हुआ, तब श्रीकृष्ण ने मित्रविंदा का हरण किया और उनके भाइयों को युद्ध में पराजित कर उन्हें द्वारका में पटरानी का स्थान दिया।
विंध्याचल पर्वत श्रृंखला की ऊंची चोटियों के बीच बसा जामगढ़ आज भी त्रेता युग के एक अलौकिक रहस्य को समेटे हुए है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, लंका विजय के बाद भगवान श्रीराम से विदा लेकर अमरता का वरदान प्राप्त जामवंत एकांत साधना और प्रभु के अगले अवतार की प्रतीक्षा के लिए विंध्य की इन शांत गुफाओं में आ पहुंचे थे। इसी दौरान एक दिन कठोर तपस्या के बीच उन्हें तीव्र प्यास लगी। पहाड़ की अत्यधिक ऊंचाई पर जल का कोई स्रोत न होने पर जामवंतजी ने भक्तिभाव से मां नर्मदा का आह्वान किया। कहा जाता है कि भक्त की पुकार सुनते ही मां नर्मदा की एक पवित्र धारा चमत्कारिक रूप से उस ऊंची पहाड़ी पर ही फूट पड़ी। जामवंत जी ने जल पीकर अपनी प्यास बुझाई और इस स्थल को आशीर्वाद दिया। आज भी जामगढ़ की प्राचीन गुफाएं और वहां मौजूद अलौकिक जलस्रोत श्रद्धालुओं के लिए गहरी आस्था और कौतूहल का केंद्र बने हुए हैं।
रायसेन जिले में स्थित जामवंत गुफा को मप्र सरकार भले ही भगवान श्रीकृष्ण की ससुराल घोषित कर चुकी है, लेकिन इस पौराणिक गुफा तक पहुंचने के लिए आज भी श्रद्धालुओं और ग्रामीणों को मुरुम-पत्थरों भरे रास्ते से गुजरना पड़ता है। इससे वाहनों के क्षतिग्रस्त होने के साथ हादसों का खतरा बना रहता है। गांव की पुरातत्व धरोहर के संरक्षण में जुटे कमल याज्ञबल्क के अनुसार, पहाड़ी के नीचे तक महज दो किलोमीटर का पक्का रास्ता बन जाए, तो लोग आसानी से वाहनों से पहुंच सकेंगे। इसके साथ ही पहाड़ी पर चढ़ने के लिए पक्की सीढ़ियों और नीचे धूप व बारिश से बचाव के लिए टीन शेड की बेहद जरूरत है। लंबे समय से की जा रही इस मांग पर ग्राम पंचायत से लेकर जिला प्रशासन और पुरातत्व विभाग द्वारा ध्यान न दिए जाने से स्थानीय लोगों और श्रद्धालुओं में निराशा है।
रायसेन जिले की जामगढ़ ग्राम पंचायत स्थित जामवंत गुफा का एएसआई (ASI) भोपाल मंडल ने वर्ष 2016 और 2024 में सर्वे कर इसे बेहद महत्वपूर्ण माना था। राष्ट्रीय गोष्ठी में पुरातत्ववेत्ता डॉ. नारायण व्यास ने बताया था कि यहां की सभ्यता लगभग 15 लाख वर्ष पुरानी है। देशभर के विशेषज्ञों ने भी इस धरोहर के महत्व को स्वीकार किया है। इसके बावजूद, अब तक इस ऐतिहासिक क्षेत्र के संरक्षण और विकास के लिए कोई ठोस योजना नहीं बन सकी है। बुनियादी सुविधाओं का अभाव होने से यह अमूल्य पौराणिक स्थल उपेक्षा का शिकार बना हुआ है।
अयोध्या में श्रीराम मंदिर बनने के बाद प्रदेश सरकार भगवान श्रीकृष्ण से जुड़े धार्मिक स्थलों को पर्यटन के रूप में विकसित करने पर जोर दे रही है। लेकिन भगवान श्रीकृष्ण की ससुराल मानी जाने वाली जामवंत गुफा अब तक विकास की दौड़ से दूर है। जिला प्रशासन भी इसके विकास को लेकर चुप्पी साधे है। ग्रामीणों का कहना है कि जामवंत गुफा को मप्र के पर्यटन नक्शे से जोड़कर यहां जरूरी सुविधाएं विकसित की जाएं तो धार्मिक आस्था के साथ इलाके की अर्थव्यवस्था भी मजबूत होगी। पर्यटकों और श्रद्धालुओं के आने से गांव के लोगों को रोजगार मिल सकता है। अभी इस स्थल का कोई विशेष प्रचार-प्रसार नहीं है। इसके बावजूद श्रद्धालु यहां पहुंचते रहते हैं। ग्रामीणों का मानना है कि बेहतर सड़क, सुविधाएं और प्रचार-प्रसार होने पर यहां श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ सकती है और जामगढ़ धार्मिक पर्यटन के प्रमुख केंद्र के रूप में पहचान बना सकता है।
मध्यप्रदेश सरकार द्वारा भगवान श्रीकृष्ण की ससुराल घोषित की गई जामवंत गुफा क्षेत्र में 4 सितंबर को जन्माष्टमी का त्योहार उत्साह से मनाया जाएगा। जिला प्रशासन ने धार्मिक और सांस्कृतिक कार्यक्रमों की तैयारियां शुरू कर दी हैं। हर वर्ष यहां गीता जयंती और जन्माष्टमी पर विशेष आयोजन होते हैं। ग्रामीणों के अनुसार, इस अवसर पर जिलेभर से बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां पहुंचकर दर्शन करते हैं और आयोजित कार्यक्रमों में शामिल होते हैं।