
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को लेकर अब तक सबसे ज्यादा चर्चा नौकरी, चिप और डेटा की हुई है। लेकिन AI की एक ऐसी जरूरत है, जिसके बिना कोई बड़ा मॉडल चल ही नहीं सकता-बिजली।
आप किसी AI से सवाल पूछते हैं और कुछ सेकंड में जवाब मिल जाता है। इसके पीछे हजारों GPU, सर्वर, नेटवर्किंग सिस्टम और उन्हें ठंडा रखने वाली पूरी व्यवस्था काम करती है। यही वजह है कि दुनिया में AI के बढ़ने के साथ डेटा सेंटरों की बिजली खपत भी तेजी से बढ़ रही है।
अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी यानी IEA के मुताबिक दुनिया के डेटा सेंटरों की बिजली खपत 2025 के करीब 485 TWh से बढ़कर 2030 में लगभग 950 TWh हो सकती है। यानी करीब दोगुनी। वहीं AI-केंद्रित डेटा सेंटरों की बिजली खपत इस अवधि में लगभग तीन गुना होने का अनुमान है।
भारत के लिए यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि देश में AI और डेटा सेंटर का ढांचा तेजी से बढ़ रहा है।
सबसे पहले एक जरूरी अंतर समझिए। डेटा सेंटर की क्षमता MW में और सालाना बिजली खपत MWh/TWh में मापी जाती है।
भारत में कुल डेटा सेंटर क्षमता 2020 में करीब 375 MW थी, जो 2025 में बढ़कर करीब 1,500 MW और अगस्त 2026 तक लगभग 1,575 MW हो गई। लेकिन, AI डेटा सेंटर सामान्य डेटा सेंटर से अलग होते हैं।
सामान्य डेटा सेंटर में वेबसाइट, बैंकिंग, ई-कॉमर्स, वीडियो, क्लाउड स्टोरेज आदि के सर्वर होते हैं। AI डेटा सेंटर में बड़ी संख्या में GPU आधारित हाई-परफॉर्मेंस कंप्यूटिंग सिस्टम लगाए जाते हैं।
यही GPU बहुत ज्यादा बिजली और cooling मांगते हैं। उदाहरण के लिए NVIDIA का H100 SXM GPU अधिकतम 700 वाट तक बिजली ले सकता है। नई Blackwell B200 GPU का अधिकतम TDP 1,000 वाट तक है। इसलिए AI डेटा सेंटर में प्रति रैक बिजली की जरूरत सामान्य सर्वर रैक से कई गुना अधिक हो सकती है।
सामान्य डेटा सेंटर : एक रैक में अपेक्षाकृत कम power-density वाले CPU सर्वर हो सकते हैं। बिजली की जरूरत कम होती है और कई जगह air cooling पर्याप्त होती है।
AI डेटा सेंटर : यहां एक ही रैक में दर्जनों शक्तिशाली GPU लगाए जा सकते हैं। GPU लगातार भारी गणना करते हैं और लगभग पूरी बिजली अंततः गर्मी में बदलती है। इसलिए AI डेटा सेंटर में केवल बिजली पहुंचाना काफी नहीं है। बिजली → GPU → गर्मी → cooling → फिर बिजली/पानी की जरूरत
NVIDIA का GB200 NVL72 इसका अच्छा उदाहरण है। इसमें 72 Blackwell GPU एक ही liquid-cooled rack में जुड़े होते हैं और पूरे रैक की बिजली खपत लगभग 120 kW है। यानी एक ही AI रैक को चलाने के लिए उतनी बिजली चाहिए जितनी कई दर्जन सामान्य घरों की कुल मांग के बराबर हो सकती है।
यह आंकड़ा GPU के मॉडल और वास्तविक उपयोग पर निर्भर करेगा। लेकिन एक उदाहरण से तस्वीर साफ हो जाती है। अगर 1 लाख H100 GPU लगाए जाएं और हर GPU अधिकतम 700 वाट पर चले: 1,00,000 × 700 W = 70 MW…यानी सिर्फ GPU के लिए 70 MW।
लेकिन यह पूरे डेटा सेंटर की जरूरत नहीं है। इसके अलावा CPU, मेमोरी, नेटवर्किंग, स्टोरेज, पावर कन्वर्जन और cooling भी बिजली लेते हैं। इसलिए वास्तविक डेटा सेंटर लोड इससे काफी अधिक होगा।
और अगर नई पीढ़ी के 1,000-वाट तक के B200 GPU का उदाहरण लें तो: 1,00,000 × 1,000 W = 100 MW…यह भी केवल GPU का सैद्धांतिक अधिकतम है। यानी 1 लाख हाई-पावर GPU वाला AI परिसर आसानी से 100 MW से अधिक का विशाल बिजली लोड बन सकता है। इसीलिए AI डेटा सेंटर अब केवल IT परियोजना नहीं रह गए हैं। वे ऊर्जा अवसंरचना की परियोजना भी बन गए हैं।
भारत सरकार के मुताबिक डेटा सेंटरों से बिजली की मांग 2031-32 तक 13.56 GW तक पहुंचने का अनुमान है। यह सिर्फ AI की बिजली नहीं है, बल्कि व्यापक डेटा सेंटर मांग है। तुलना के लिए भारत की कुल स्थापित बिजली उत्पादन क्षमता 2026 की शुरुआत में करीब 514 GW थी। इसलिए 13.56 GW राष्ट्रीय स्तर पर अभी बहुत बड़ा हिस्सा नहीं है। लेकिन समस्या सिर्फ कुल बिजली की नहीं है।
मुंबई, नवी मुंबई, चेन्नई, हैदराबाद और बेंगलुरु जैसे शहर डेटा सेंटर के बड़े केंद्र हैं। मार्च 2026 के सरकारी आंकड़ों के मुताबिक मुंबई/नवी मुंबई में करीब 790 MW, चेन्नई में 305 MW और हैदराबाद में 152 MW operational data-centre capacity थी।
अगर किसी शहर में अचानक कई सौ मेगावाट का नया AI load जुड़ता है तो वहां सिर्फ नया बिजलीघर बनाना पर्याप्त नहीं होगा।Transmission lines, substations, transformers और reliable backup भी बढ़ाने होंगे।
अभी ऐसा कहना सही नहीं होगा। भारत की कुल बिजली व्यवस्था AI डेटा सेंटरों से कहीं बड़ी है। सरकार के मुताबिक FY 2025-26 में देश ने 242.49 GW की रिकॉर्ड peak demand पूरी की और राष्ट्रीय ऊर्जा कमी सिर्फ 0.03% रही।
लेकिन आगे चुनौती बढ़ सकती है। IEA का अनुमान है कि भारत की कुल बिजली मांग 2026-30 के दौरान औसतन 6.4% सालाना बढ़ सकती है। इस अवधि में भारत की बिजली खपत में 570 TWh से ज्यादा की वृद्धि होने का अनुमान है। AI इस बढ़ती मांग का अकेला कारण नहीं होगा। उद्योग, एयर कंडीशनिंग, परिवहन का विद्युतीकरण और कृषि भी बड़ी वजहें हैं।
इसलिए ज्यादा सटीक बात यह है- AI भारत में बिजली संकट पैदा नहीं करेगा, लेकिन बिजली की भविष्य की मांग को और तेज कर सकता है।
यही AI की दूसरी बड़ी चुनौती है। GPU जितना शक्तिशाली होगा, उतनी ज्यादा गर्मी पैदा होगी। इसे हटाने के लिए cooling चाहिए। हर डेटा सेंटर समान मात्रा में पानी नहीं खाता। यह cooling technology, मौसम, डेटा सेंटर की डिजाइन और पानी के पुनर्चक्रण पर निर्भर करता है। IEA के अनुसार 2023 में दुनिया के डेटा सेंटरों ने प्रत्यक्ष रूप से करीब 140 अरब लीटर पानी खपत किया था।
लेकिन भारत में नई परियोजनाएं पानी की खपत घटाने के लिए direct-to-chip liquid cooling, adiabatic cooling और immersion cooling जैसी तकनीकों को अपना रही हैं। सरकार ने भी इसकी जानकारी संसद में दी है।
भारत के डेटा सेंटर पहले से कुछ चुनिंदा शहरों में केंद्रित हैं। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक मार्च 2026 में:
| शहर | डेटा सेंटर क्षमता |
|---|---|
| मुंबई/नवी मुंबई | 790 MW |
| चेन्नई | 305 MW |
| बेंगलुरु | 182 MW |
| हैदराबाद | 152 MW |
| दिल्ली-NCR/नोएडा | 76 MW |
मुंबई-नवी मुंबई को समुद्री केबल कनेक्टिविटी का फायदा मिलता है। चेन्नई भी अंतरराष्ट्रीय submarine cable नेटवर्क का महत्वपूर्ण केंद्र है। लेकिन डेटा सेंटर को सिर्फ इंटरनेट नहीं चाहिए।
उसे चाहिए- 24 घंटे बिजली + ठंडा रखने की व्यवस्था + पानी + जमीन + फाइबर कनेक्टिविटी। यही वजह है कि अब नए निवेश सिर्फ मुंबई और चेन्नई तक सीमित नहीं रह रहे। सरकार के मुताबिक आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और पश्चिम बंगाल जैसे नए राज्य भी डेटा सेंटर निवेश के गंतव्य बन रहे हैं।
पानी के मामले में स्थानीय असर ज्यादा स्पष्ट हो सकता है। अगर कोई विशाल डेटा सेंटर पानी की कमी वाले क्षेत्र में लगाया जाता है तो स्थानीय जल संसाधनों पर दबाव पड़ सकता है। इसलिए सरकार अब environmental clearance के दौरान water availability, water balance और wastewater recycling जैसे पहलुओं पर भी ध्यान देती है। हालांकि यह भी याद रखना जरूरी है कि हर AI सवाल के लिए हजारों लीटर पानी नहीं लगता।
Google के एक वास्तविक उत्पादन-स्तर के अध्ययन में Gemini Apps के median text prompt के लिए 0.24 Wh ऊर्जा और 0.26 ml पानी का अनुमान मिला। लेकिन यह Google के एक विशेष सिस्टम की measurement है; इसे हर AI मॉडल और हर डेटा सेंटर पर लागू नहीं किया जा सकता। यानी AI की environmental cost मॉडल, हार्डवेयर, cooling और बिजली के स्रोत के साथ बदलती है।
भारत को AI की दौड़ में आगे बढ़ना है तो केवल GPU खरीदना पर्याप्त नहीं होगा। उसे एक साथ पांच चीजें तैयार करनी होंगी—