
अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल बाजार में गुरुवार को तेज उछाल देखने को मिला और ब्रेंट क्रूड 105 डॉलर प्रति बैरल के स्तर को पार कर गया। अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य तनाव के कारण वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति बाधित होने की आशंकाएं गहरा गई हैं। इसके साथ ही चीन की मजबूत खरीदारी और सऊदी अरब के तेल उत्पादन में भारी गिरावट ने भी कीमतों को ऊपर धकेलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
कारोबार के दौरान ब्रेंट क्रूड वायदा कीमतों में लगभग 2.63 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई और यह 104 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुंच गया। इससे पहले पिछले सत्र में वैश्विक मानक तेल बेंचमार्क 100 डॉलर प्रति बैरल के स्तर को पार कर गया था, जो जुलाई के बाद पहली बार हुआ था। अब कीमतें मई के बाद के अपने उच्चतम स्तर पर पहुंच गई हैं।
तेल की कीमतों में आई इस तेजी ने दुनिया भर में ऊर्जा आधारित महंगाई को लेकर चिंताएं बढ़ा दी हैं। यदि पश्चिम एशिया में संघर्ष लंबा खिंचता है तो तेल के साथ-साथ प्राकृतिक गैस और डीजल जैसी ऊर्जा वस्तुओं की कीमतों पर भी दबाव बना रह सकता है, जिसका असर वैश्विक महंगाई और आर्थिक वृद्धि पर पड़ सकता है। पिछले एक सप्ताह में अमेरिका और ईरान के बीच तनाव फिर से बढ़ा है।
अमेरिका और ईरान के बीच अपेक्षाकृत शांत अवधि के बाद दोनों देशों के बीच टकराव तेज हो गया है और फिलहाल हालात में तत्काल सुधार की संभावना कम दिखाई दे रही है। एक वरिष्ठ ईरानी अधिकारी ने कहा है कि तेहरान अमेरिकी नौसैनिक नाकेबंदी के सामने झुकने वाला नहीं है और यदि अमेरिका ईरानी क्षेत्र पर हमले जारी रखता है तो जवाबी कार्रवाई और तेज की जाएगी।
इस बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने संकेत दिया है कि यह संघर्ष नवंबर में होने वाले मध्यावधि चुनावों के बाद तक जारी रह सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि पेट्रोल की कीमतों में उल्लेखनीय राहत निकट भविष्य में मिलना मुश्किल हो सकता है। इन बयानों ने बाजार में यह धारणा मजबूत की है कि अब 7वें महीने में पहुंच चुका यह संघर्ष ऊर्जा बाजारों पर लंबे समय तक दबाव बनाए रख सकता है।
अगस्त की शुरुआत में दर्ज निचले स्तरों की तुलना में ब्रेंट क्रूड की कीमतों में अब तक लगभग 30 प्रतिशत की वृद्धि हो चुकी है। अमेरिका और ईरान के बीच स्थायी समझौते के प्रयास सफल नहीं हो सके और अगस्त के अंत में संघर्ष दोबारा तेज होने से खाड़ी क्षेत्र से तेल आपूर्ति की सुरक्षा को लेकर चिंताएं बढ़ गईं।
तेल बाजार पर दबाव का एक और बड़ा कारण सऊदी अरब के उत्पादन में तेज गिरावट है। गुरुवार को प्रकाशित ओपेक की एक रिपोर्ट के अनुसार, अगस्त में सऊदी अरब का उत्पादन घटकर 62 लाख बैरल प्रतिदिन रह गया, जो वर्ष 2026 का सबसे निचला मासिक स्तर है। यह जुलाई की तुलना में लगभग 23 प्रतिशत कम है।
उत्पादन में यह कमी ऐसे समय आई है जब यमन के ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब के पश्चिमी तट से होने वाली तेल आपूर्ति को निशाना बनाने की धमकी दी है। हूती समूह की बढ़ती सक्रियता ने सऊदी अरब के लिए होर्मुज जलडमरूमध्य के विकल्प के रूप में इस्तेमाल किए जाने वाले निर्यात मार्गों पर भी दबाव बढ़ा दिया है।
ब्रेंट क्रूड के 105 डॉलर प्रति बैरल के पार जाने से भारत पर सीधा असर आयात बिल और महंगाई के रूप में पड़ सकता है। भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है। इसलिए महंगे तेल से पेट्रोल-डीजल, परिवहन लागत, खाद्य वस्तुओं और उद्योगों की लागत बढ़ने का दबाव बन सकता है। रुपये पर भी दबाव आ सकता है, जिससे आयात और महंगा होगा। हालांकि सरकार और तेल कंपनियां कीमतों को नियंत्रित करने के लिए रणनीतिक भंडार, सप्लाई स्रोतों में विविधता और कर समायोजन जैसे कदम उठा सकती हैं। लंबे समय तक ऊंची कीमतें रहने पर महंगाई और आर्थिक विकास दोनों प्रभावित हो सकते हैं।