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मौसम और माहौल से लाइफ स्टाइल तक: जानें सस्टेनेबल फैशन का बदलता स्वरूप और भविष्य की मांग

आधुनिक फैशन उद्योग में पर्यावरणीय स्थिरता और नैतिक उत्पादन (इथिकल प्रोडक्शन) का महत्व तेजी से बढ़ रहा है। शोध आधारित यह रिपोर्ट पारंपरिक हथकरघा और आधुनिक डिजिटल रुझानों के बीच संतुलन को रेखांकित करती है।
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Sep 14, 2026
new sustainable fashion
सांकेतिक इमेज (सोर्स- Chatgpt)

आधुनिक जीवनशैली में फैशन अब केवल दिखावे का माध्यम नहीं रह गया है, बल्कि यह पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक उत्तरदायित्व का एक सशक्त जरिया बन चुका है। वैश्विक फैशन बाजार में सस्टेनेबल (सतत) विकास की मांग तेजी से बढ़ रही है। ग्लोबल टेक्सटाइल इंडेक्स (2025) के आंकड़ों के अनुसार, कुल वस्त्र उत्पादन का लगभग 28% हिस्सा अब पर्यावरण-अनुकूल सामग्रियों से तैयार किया जा रहा है। उपभोक्ता जैविक कपास, प्राकृतिक रंगों और पुनर्चक्रित (रीसाइकिल्ड) वस्त्रों को प्राथमिकता दे रहे हैं, जिससे कार्बन उत्सर्जन में उल्लेखनीय कमी दर्ज की गई है।

हैंडलूम और पारंपरिक परिधानों की वापसी

भारतीय परिधान बाजार में हथकरघा (हैंडलूम) और पारंपरिक कलाओं का पुनरुत्थान देखा जा रहा है। बनारसी, चंदेरी और खादी जैसे वस्त्रों को आधुनिक कट-डिज़ाइन के साथ प्रस्तुत किया जा रहा है। इस बदलाव से स्थानीय बुनकरों को आर्थिक संबल मिल रहा है और सांस्कृतिक विरासत सुरक्षित हो रही है। नेशनल फैशन इंस्टीट्यूट के एक सर्वेक्षण के मुताबिक, पारंपरिक परिधानों के प्रति युवा वर्ग का आकर्षण पिछले तीन वर्षों में 35% तक बढ़ा है।

डिजिटल तकनीक और वर्चुअल ट्रेंड्स

डिजिटल क्रांति ने फैशन उद्योग के विपणन (मार्केटिंग) और उपभोग के तौर-तरीकों को पूरी तरह बदल दिया है। वर्चुअल रियलिटी (VR) और ऑगमेंटेड रियलिटी (AR) तकनीकों के माध्यम से ग्राहक बिना कपड़े पहने उनकी फिटिंग और लुक का अनुभव घर बैठे कर रहे हैं। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर माइक्रो-इन्फ्लुएंसर्स के जरिए 'स्लो फैशन' को बढ़ावा दिया जा रहा है, जो तात्कालिक उपभोग (फास्ट फैशन) की संस्कृति पर अंकुश लगा रहा है।

पर्यावरण के लिए नासूर बनता फास्ट फैशन

फास्ट फैशन का मतलब है कि सस्ते दामों में ट्रेंडी कपड़े खरीदना, उन्हें कुछ ही बार पहनकर फेंक देना और नया ट्रेंड आने पर दोबारा खरीद लेना। विभिन्न वैश्विक पर्यावरण रिपोर्ट्स के अनुसार, फैशन इंडस्ट्री दुनिया भर में होने वाले कुल कार्बन उत्सर्जन का लगभग 8 से 10 प्रतिशत हिस्सा पैदा करती है, जो कि अंतरराष्ट्रीय उड़ानों और समुद्री जहाजों के कुल उत्सर्जन से भी ज्यादा है। इसके अलावा, कपड़ा उद्योग जल प्रदूषण का भी एक बहुत बड़ा जरिया है।

रीसाइक्ल्ड कपड़ों का बढ़ता क्रेज

इस पर्यावरण-विरोधी संस्कृति से पार पाने के लिए कपड़ा उद्योग में 'सर्कुलर इकोनॉमी' (वृत्ताकार अर्थव्यवस्था) का मॉडल अपनाया जा रहा है। इसका मूल सिद्धांत है- बनाओ, इस्तेमाल करो, फेंको के पुराने रास्ते को छोड़कर कम करो, पुनर्चक्रण (Recycle) करो और दोबारा उपयोग (Reuse) करो।

आज के दौर में रीसाइक्ल्ड कपड़ों का चलन तेजी से बढ़ रहा है। फैशन डिजाइनर और बड़े ब्रांड्स अब प्लास्टिक की बोतलों, कृषि कचरे और पुराने कपड़ों को गलाकर नया धागा बना रहे हैं। भारत के कई घरेलू स्टार्टअप्स और बड़े सस्टेनेबल ब्रांड्स ने ऐसे कपड़े तैयार करना शुरू कर दिया है जो पूरी तरह बायोडिग्रेडेबल या रीसाइक्ल्ड होते हैं। लोग अब पुराने कपड़ों को रीसायकल कर नए फैशन ट्रेंड में ढालने लगे हैं।

Updated on:
14 Sept 2026 09:45 pm
Published on:
14 Sept 2026 09:45 pm