
हिमालय क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन का असर अब सिर्फ अनुमान नहीं, आंकड़ों में भी साफ दिखने लगा है। वैश्विक कंसल्टेंसी सिस्टमिक (Systemiq) द्वारा इंटीग्रेटेड माउंटेन इनिशिएटिव के साथ मिलकर, और इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट (ICIMOD) व जी.बी. पंत नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन एनवायरनमेंट के इनपुट से तैयार नई रिपोर्ट के अनुसार, हिमालयी ग्लेशियर अब एक दशक पहले की तुलना में 65% ज्यादा तेजी से अपना द्रव्यमान खो रहे हैं। रिपोर्ट की मुख्य लेखिका और सिस्टमिक की सीनियर डायरेक्टर अरुषि चोपड़ा के अनुसार इस रफ्तार से लाखों लोगों की आजीविका दांव पर है। वैज्ञानिकों के मुताबिक, सदी के मध्य तक क्षेत्र "पीक वॉटर" यानी अधिकतम जल-प्रवाह की स्थिति में पहुंच सकता है, जिसके बाद नदियों का प्रवाह घटने लगेगा।
यह रिपोर्ट ऐसे समय आई है, जब अगस्त 2026 के आखिर में नेपाल-तिब्बत सीमा पर एक हिमालयी ग्लेशियर के टूटने से भारी भूस्खलन और अचानक बाढ़ आई थी, जिसमें अब तक 1,300 से अधिक लोगों की मौत की पुष्टि हो चुकी है। यह हादसा दिखाता है कि रिपोर्ट में जताई गई आशंकाएं कोई दूर की कल्पना नहीं, बल्कि पहले से घट रही घटनाएं हैं।
हालिया रिपोर्ट के अनुसार, बढ़ते तापमान के साथ-साथ अधूरे दहन से निकलने वाला ब्लैक कार्बन ग्लेशियरों पर जमकर सूर्य की गर्मी सोखता है, जिससे बर्फ पिघलने की रफ्तार और बढ़ जाती है। सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि हिमालय-काराकोरम क्षेत्र में फैले करीब 40,000 ग्लेशियरों में से सिर्फ 21 की ही विस्तृत, निरंतर निगरानी हो रही है। यह आंकड़ा रिपोर्ट में एक गंभीर खामी के तौर पर रेखांकित किया गया है।
संसद में जुलाई 2026 में दी गई जानकारी के अनुसार, 2025 के आकलन में भारतीय हिमालयी क्षेत्र की 189 झीलों को "उच्च जोखिम" श्रेणी में रखा गया था, जिनमें से 56 झीलों को "अत्यधिक उच्च जोखिम" घोषित किया गया। वहीं, केंद्रीय जल आयोग (Central Water Commission) देशभर में 10 हेक्टेयर से बड़ी कुल 2,485 ग्लेशियल झीलों पर निगरानी रख रहा है। यानी असली तस्वीर "करीब 200" के मोटे अनुमान से कहीं ज्यादा बड़ी और परतदार है।
इतिहास में इन झीलों के फटने के गंभीर नतीजे भी देखे जा चुके हैं। साल 2023 में सिक्किम में आई ग्लेशियल झील की अचानक बाढ़ (GLOF) में कम से कम 70 लोगों की जान गई थी और सड़कों, पुलों व जलविद्युत परियोजनाओं को भारी नुकसान पहुंचा था, जबकि 2021 में उत्तराखंड में ऋषिगंगा-धौलीगंगा घाटी में आई इसी तरह की बाढ़ में 200 से अधिक लोग मारे गए थे।
रिपोर्ट में 10 प्राथमिकता वाले कदम सुझाए गए हैं, जिनमें ब्लैक कार्बन उत्सर्जन घटाना, ग्लेशियर निगरानी का विस्तार, समय रहते चेतावनी देने वाली प्रणाली मजबूत करना, आपदा से निपटने के लिए पहले से तैयार प्रोटोकॉल और पर्यटन प्रबंधन में बदलाव शामिल हैं। रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय हिमालयी क्षेत्र में हर साल करीब 40 करोड़ पर्यटक आते हैं और सफलता को पर्यटकों की संख्या से नहीं बल्कि स्थानीय समुदायों को मिलने वाले आर्थिक लाभ से मापा जाना चाहिए।
ध्यान देने वाली बात यह है कि "प्रस्तावित हिमालय प्राधिकरण" इसी नई रिपोर्ट की सिफारिश नहीं है, बल्कि यह विचार पहले नीति आयोग (2018) और संसद की एक स्थायी समिति की रिपोर्ट में एक समन्वयकारी शीर्ष संस्था के तौर पर रखा जा चुका है। यानी यह एक पुरानी, लेकिन अभी भी प्रासंगिक मांग है।
रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि हिमालयी क्षेत्र भारत के कुल भूभाग का सिर्फ 18% है, लेकिन देश की करीब 35% आपदा घटनाएं इसी क्षेत्र में होती हैं। इससे पहले मार्च 2026 में जारी ICIMOD की अलग रिपोर्टों में भी बताया गया था कि हिंदू कुश हिमालय में बर्फ के नुकसान की दर 2000 के बाद से दोगुनी हो चुकी है और 1975 से अब तक ग्लेशियरों की मोटाई में 27 मीटर तक की कमी आ चुकी है, जिस पर लगभग दो अरब लोगों की जल-सुरक्षा निर्भर है।