
भारतीय सिनेमा में जब भी यथार्थवादी और विचारोत्तेजक कहानियों का जिक्र होता है, मेघना गुलजार का नाम सबसे आगे आता है। ‘तलवार’, ‘राज़ी’ और ‘सैम बहादुर’ जैसी बहुचर्चित फिल्मों के बाद मेघना एक बार फिर न्याय प्रणाली और मानवीय नैतिकता के अनसुलझे सवालों को लेकर बड़े पर्दे पर लौट रही हैं। उनकी आगामी फिल्म ‘दायरा’ का ट्रेलर रिलीज होते ही चर्चा का केंद्र बन गया है। 18 सितंबर 2026 को सिनेमाघरों में रिलीज होने जा रही यह फिल्म महज एक सस्पेंस-क्राइम ड्रामा नहीं है, बल्कि यह उस 'दायरे' की पड़ताल करती है जहां न्याय और कानून के बीच की रेखा धुंधली पड़ जाती है।
फिल्म की शुरुआत एक सनसनीखेज पुलिस एनकाउंटर से होती है। अमूमन थ्रिलर फिल्मों में एनकाउंटर को न्याय के अंत या विजय के रूप में दिखाया जाता है, लेकिन ‘दायरा’ में यह घटना कहानी की शुरुआत भर है। यहाँ से असली संघर्ष शुरू होता है—सिस्टम के भीतर काम करने वाले दो शीर्ष अधिकारियों की सोच का संघर्ष।
DCP अजूनी कोहली (करीना कपूर खान): एक ऐसी कर्तव्यनिष्ठ और सख्त अधिकारी जो कानून की सीमाओं, प्रक्रियाओं और संविधान के दायरे में रहकर न्याय दिलाने में विश्वास रखती हैं।
DCP रमन कुमार (पृथ्वीराज सुकुमारन): एक ऐसा गंभीर और व्यावहारिक पुलिस अफसर, जिसके लिए परिणाम ज्यादा मायने रखते हैं। वह जरूरत पड़ने पर त्वरित इंसाफ के लिए व्यवस्था की परिधि लांघने से भी पीछे नहीं हटता।
जैसे-जैसे दोनों अधिकारी मामले की तह तक पहुँचते हैं, उनके बीच का व्यक्तिगत और पेशेवर टकराव और गहरा होता जाता है।
कहानी तब और उलझ जाती है जब एक बेबस माँ अपनी लापता बेटी की तलाश में पुलिस का दरवाजा खटखटाती है। जांच के दौरान यह चौंकाने वाला खुलासा होता है कि एक संदिग्ध पिछले दो वर्षों से एक ही पैटर्न और रास्ते का इस्तेमाल करके वारदातों को अंजाम दे रहा है।
यह जांच सिर्फ एक अपराधी को पकड़ने तक सीमित नहीं रहती, बल्कि कई गंभीर नैतिक और कानूनी सवाल खड़े करती है:
नाबालिग अपराध कानून (Juvenile Justice Law): क्या जघन्य और सुनियोजित अपराधों में लिप्त नाबालिगों को केवल उनकी उम्र के आधार पर संरक्षण मिलना चाहिए?
प्रक्रिया बनाम परिणाम: क्या पीड़ित को समय पर न्याय दिलाने के लिए कानूनी औपचारिकताओं को दरकिनार करना सही ठहराया जा सकता है?
एनकाउंटर संस्कृति की वैधता: क्या त्वरित न्याय का विचार वास्तव में समाज को सुरक्षित बनाता है या यह पुलिस व्यवस्था की जवाबदेही को कमजोर करता है?
‘दायरा’ की सबसे बड़ी ताकतों में से एक है करीना कपूर खान और पृथ्वीराज सुकुमारन की पहली बार बनी ऑन-स्क्रीन जोड़ी। दोनों ही अपने किरदारों में जबरदस्त गंभीरता लेकर आए हैं।
करीना कपूर खान ने अपने अभिनय से यह साबित किया है कि वह केवल ग्लैमरस भूमिकाओं तक सीमित नहीं हैं। डीसीपी अजूनी के रूप में उनका संयम और दृढ़ता साफ झलकती है। वहीं, पृथ्वीराज सुकुमारन ने डीसीपी रमन के जटिल, अनिर्णायक और नैतिक रूप से ग्रे किरदार को पूरी शिद्दत से निभाया है। दोनों के बीच के संवाद और वैचारिक टकराव फिल्म को एक सामान्य पुलिस प्रक्रियात्मक ड्रामा से ऊपर उठाकर बौद्धिक द्वंद्व का रूप देते हैं।
मेघना गुलजार का सिनेमा: 'ग्रे एरिया' की खोज
मेघना गुलजार की सबसे बड़ी खासियत यह रही है कि वह अपनी कहानियों में किसी को पूरी तरह 'नायक' या 'खलनायक' बनाकर पेश नहीं करतीं। समाज में न्याय को अक्सर काले या सफेद रंग में देखा जाता है, लेकिन असलियत उन दोनों के बीच के 'ग्रे एरिया' (धुंधले क्षेत्र) में बसती है।
सच्ची घटनाओं से प्रेरित इस कहानी को यश केसवानी, सीमा अग्रवाल और खुद मेघना गुलजार ने लिखा है। पटकथा दर्शकों को किसी एक पक्ष का समर्थन करने के लिए मजबूर नहीं करती, बल्कि उन्हें स्वयं यह सोचने पर विवश करती है कि अगर वे उस स्थिति में होते, तो क्या करते।
फिल्म का तकनीकी ढांचा इसे एक उच्च स्तरीय रियलिस्टिक थ्रिलर का रूप देता है:
निर्माण व वितरण: इसका निर्माण जंगली पिक्चर्स (Junglee Pictures) और पेन स्टूडियोज (Pen Studios) ने मिलकर किया है, जबकि वितरण पेन मरुधर के जिम्मे है।
सिनेमैटोग्राफी: सौरभ गोस्वामी (ISC) ने कैमरे के जरिए एक तनावपूर्ण, यथार्थवादी और गंभीर माहौल तैयार किया है।
संपादन: चारु श्री रॉय और मेघना गुलजार का संपादन कहानी की गति को बिना किसी अतिरिक्त ड्रामे के बांधे रखता है।
एक्शन डिजाइन: परवेज शेख का एक्शन डिजाइन जमीनी हकीकत के बेहद करीब है, जिसमें कोई गैर-जरूरी मेलोड्रामा नहीं जोड़ा गया है।
प्रोडक्शन डिजाइन: सुब्रत चक्रवर्ती और अमित रे ने जांच कक्षों, पुलिस थानों और वास्तविक लोकेशंस को पूरी प्रामाणिकता के साथ पर्दे पर उतारा है।
आज के समय में, जब समाज अक्सर अपराधों पर त्वरित फैसले और 'ऑन-द-स्पॉट जस्टिस' की मांग करता है, ‘दायरा’ जैसी फिल्मों की प्रासंगिकता और बढ़ जाती है। यह फिल्म न्याय की उस सीमा रेखा को रेखांकित करती है जिसे लांघने पर कानून के रक्षक और कानून तोड़ने वाले के बीच का फर्क मिटने लगता है।
18 सितंबर 2026 को रिलीज हो रही ‘दायरा’ केवल 2 घंटे का रोमांच नहीं परोसती, बल्कि यह सिनेमाघर से बाहर निकलने के बाद भी दर्शकों के जेहन में न्याय, सिस्टम और व्यक्तिगत विवेक को लेकर कई सवाल छोड़ जाएगी।