
भारत में अगर कोई संस्था, एनजीओ या संगठन विदेश से पैसा लेना चाहता है तो उस पर Foreign Contribution (Regulation) Act यानी FCRA लागू होता है। इसका मकसद यह तय करना है कि विदेश से आने वाला पैसा भारत में कहां और किस काम में इस्तेमाल हो रहा है और उसका इस्तेमाल देश के राष्ट्रीय हित के खिलाफ न हो। गृह मंत्रालय FCRA के जरिए विदेशी अंशदान और विदेशी आतिथ्य को नियंत्रित करता है।
अभी जिस बदलाव की चर्चा है, वह कोई नया FCRA कानून नहीं है। Foreign Contribution (Regulation) Amendment Bill, 2026 मौजूदा FCRA, 2010 में बदलाव का प्रस्ताव है। यह बिल 25 मार्च 2026 को लोकसभा में पेश किया गया था और 12 अगस्त 2026 को संयुक्त संसदीय समिति के पास विचार के लिए भेजा गया। इसलिए इसके प्रावधानों को अभी प्रस्तावित बदलाव के रूप में समझना चाहिए।
FCRA यानी विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम। इसके तहत भारत में काम करने वाली पात्र संस्थाओं को विदेशी चंदा या अनुदान लेने के लिए FCRA पंजीकरण या कुछ मामलों में पूर्व अनुमति लेनी होती है।
विदेशी अंशदान में विदेशी स्रोत से मिलने वाला पैसा, प्रतिभूतियां या कानून में निर्धारित मूल्य से अधिक की वस्तुएं शामिल हो सकती हैं। सामाजिक, धार्मिक, शैक्षणिक, आर्थिक या सांस्कृतिक क्षेत्र में काम करने वाली संस्थाएं इसके दायरे में आ सकती हैं।
FCRA के तहत संस्था को मिलने वाले विदेशी पैसे का हिसाब रखना, उसका निर्धारित उद्देश्य के लिए इस्तेमाल करना और सरकार को इसकी जानकारी देना जरूरी है। मौजूदा व्यवस्था में FCRA पंजीकरण सामान्य तौर पर पांच साल के लिए होता है और इसे आगे नवीनीकृत कराना पड़ता है।
सरकार का तर्क है कि विदेशी फंड और उससे बनाई गई संपत्तियों के प्रबंधन को लेकर मौजूदा कानून में ज्यादा स्पष्ट और व्यापक व्यवस्था की जरूरत है।
2026 के संशोधन विधेयक में सबसे बड़ा बदलाव यह है कि अगर किसी संस्था का FCRA प्रमाणपत्र रद्द हो जाता है, संस्था खुद उसे सरेंडर कर देती है या उसका प्रमाणपत्र खत्म हो जाता है, तो विदेशी फंड और उससे बनी संपत्तियों को संभालने के लिए एक नामित प्राधिकरण यानी Designated Authority की व्यवस्था होगी।
बिल के मुताबिक प्रमाणपत्र तब भी समाप्त माना जा सकता है जब संस्था ने समय पर नवीनीकरण के लिए आवेदन नहीं किया या उसका नवीनीकरण आवेदन खारिज हो गया।
यानी सरकार सिर्फ यह नहीं देखना चाहती कि विदेशी पैसा आया कहां से और खर्च कहां हुआ, बल्कि यह भी तय करना चाहती है कि FCRA समाप्त होने के बाद उस पैसे से बनी संपत्ति का क्या होगा।
इसे एक उदाहरण से समझिए। मान लीजिए किसी संस्था ने विदेशी फंड से अस्पताल बनाया। बाद में उस संस्था का FCRA प्रमाणपत्र खत्म हो गया। प्रस्तावित व्यवस्था में उस अस्पताल जैसी विदेशी योगदान से बनी संपत्ति को Designated Authority के अधीन लाया जा सकता है।
अगर संस्था निर्धारित समय के भीतर नया पंजीकरण हासिल कर लेती है या प्रमाणपत्र का नवीनीकरण/बहाली हो जाती है तो संपत्ति या अप्रयुक्त विदेशी योगदान वापस किए जाने की व्यवस्था प्रस्तावित है।
लेकिन अगर संस्था ऐसा नहीं कर पाती तो संपत्ति स्थायी रूप से प्राधिकरण में निहित हो सकती है। इसके बाद उसे सार्वजनिक उद्देश्य के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है, किसी सरकारी मंत्रालय या एजेंसी को दिया जा सकता है या कुछ परिस्थितियों में बेचा जा सकता है। बिक्री से मिलने वाली राशि और अप्रयुक्त विदेशी योगदान को भारत की संचित निधि में जमा करने का प्रस्ताव है।
अगर विधेयक कानून बनता है तो इसका सबसे सीधा फायदा सरकार और नियामक व्यवस्था को होगा।
विदेशी फंड पर ज्यादा निगरानी : सरकार के पास विदेशी फंड से बनी संपत्तियों की स्थिति पर ज्यादा स्पष्ट अधिकार होंगे।
बंद हो चुकी संस्थाओं की संपत्ति का प्रबंधन : ऐसी संस्थाओं की संपत्तियां जिनका FCRA प्रमाणपत्र खत्म हो गया है, लंबे समय तक अनिश्चित स्थिति में रहने के बजाय एक निर्धारित व्यवस्था के तहत लाई जा सकेंगी।
सार्वजनिक इस्तेमाल की संभावना : स्थायी रूप से सरकारी नियंत्रण में आने वाली संपत्ति को सार्वजनिक उद्देश्य के लिए इस्तेमाल करने का प्रावधान प्रस्तावित है।
यहीं इस विधेयक का सबसे विवादित हिस्सा है। PRS Legislative Research के विश्लेषण के मुताबिक, अगर किसी संस्था ने अतीत में विदेशी पैसे से अस्पताल, स्कूल या दूसरी संपत्ति बनाई है और बाद में उसने FCRA नवीनीकृत नहीं कराया, तो प्रस्तावित व्यवस्था में वह संपत्ति भी प्राधिकरण के अधीन जा सकती है। यानी संस्था के पास FCRA से पूरी तरह बाहर निकलने का विकल्प सीमित हो सकता है, अगर उसके पास विदेशी फंड से बनाई गई संपत्तियां हैं।
एक और सवाल अपील के अधिकार को लेकर है। मौजूदा कानून में कुछ फैसलों के खिलाफ अपील की व्यवस्था है, लेकिन प्रस्तावित बदलाव में नवीनीकरण से इनकार की स्थिति और उससे जुड़ी संपत्ति के नुकसान के खिलाफ स्पष्ट अपील व्यवस्था को लेकर PRS ने चिंता जताई है।
इसका मतलब यह है कि छोटे एनजीओ के लिए FCRA अनुपालन और भी महत्वपूर्ण हो जाएगा। समय पर नवीनीकरण, दस्तावेज, हिसाब-किताब और विदेशी फंड के इस्तेमाल से जुड़ी शर्तों का पालन करना जरूरी होगा।
गृह मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, 2019 से 2022 के बीच 13,520 संस्थाओं को करीब 55,741 करोड़ रुपये का विदेशी योगदान मिला। 15 जुलाई 2026 तक FCRA पोर्टल पर 14,449 सक्रिय FCRA प्रमाणपत्र थे, जबकि 22,498 प्रमाणपत्र रद्द और 15,212 को समाप्त माना गया था।
इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि FCRA में होने वाला बदलाव केवल कुछ बड़े एनजीओ तक सीमित मुद्दा नहीं है। इसका असर विदेशी फंड लेने वाली बड़ी संख्या में संस्थाओं पर पड़ सकता है।
सरकार की ओर से इसे विदेशी योगदान की पारदर्शिता, निगरानी और जवाबदेही मजबूत करने की दिशा में देखा जा रहा है। लेकिन आलोचना का सवाल यह है कि निगरानी मजबूत करने के नाम पर संस्थाओं की संपत्तियों पर सरकार की शक्ति कितनी बढ़नी चाहिए और संस्था को अपने पक्ष में सुनवाई तथा अपील का पर्याप्त अवसर मिलेगा या नहीं।
यानी असली बहस विदेशी पैसे की निगरानी बनाम संस्थाओं की स्वायत्तता और संपत्ति के अधिकार के बीच है।
FCRA में प्रस्तावित 2026 का बदलाव सिर्फ विदेशी चंदे की निगरानी का मामला नहीं है। इसका सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि विदेशी पैसे से बनी संपत्ति का भविष्य FCRA प्रमाणपत्र खत्म होने के बाद कैसे तय होगा।
सरकार के लिए यह व्यवस्था विदेशी फंड पर नियंत्रण और जवाबदेही मजबूत करने का माध्यम हो सकती है। वहीं एनजीओ और नागरिक संगठनों के लिए सबसे बड़ा सवाल यह है कि नवीनीकरण न होने या खारिज होने की स्थिति में उनकी संपत्ति कितनी सुरक्षित रहेगी और उन्हें सरकार के फैसले के खिलाफ कितनी प्रभावी कानूनी सुरक्षा मिलेगी। फिलहाल यह प्रस्तावित विधेयक है, कानून नहीं। इसलिए अंतिम असर संसद में विचार और कानून के अंतिम रूप पर निर्भर करेगा।