
एक दौर था, जब पुरानी पीढ़ी जरूरी सामान की खरीदारी पर भी पाई-पाई का हिसाब रखती थी। खरीदने से पहले बजट बनाकर प्राथमिकताएं तय होती थी। लेकिन अब युवा पीढ़ी खासकर डिजिटल मीडिया पर सक्रिय जेनजी (Gen Z) और अल्फा (Gen Alpha) की सोच बदल गई है। नई पीढ़ी जरूरत से ज्यादा ये देखकर खर्च कर रही है कि दूसरे क्या कर रहे हैं? नई पीड़ी दूसरों के कपड़े, मोबाइल फोन, रेस्तरां, होटल और यहां तक कि घूमने-फिरने का प्लान में भी इसी होड़ का हिस्सा बन गई है।
नई पीढ़ी में तेजी से बदल रहे फैशन और लाइफस्टाइल का कारण युवाओं में पैदा हुए ‘फोमो’ (Fear of missing out) का नतीजा है। सोशल मीडिया ने इसे धार दी तो कंपनियां पीछे छूटने का डर दिखाकर युवाओं में खरीदारी का आवेग पैदा कर रही हैं। विभिन्न डिजिटल प्लेटफार्म पर- अभी नहीं तो कभी नहीं, ऑफर सीमित, ऐसा मौका फिर नहीं मिलेगा…जैसे लुभावने तरीकों ने युवा पीढ़ी की जेब ढीली करनी शुरू कर दी। इसका असर ये होता है कि अनावश्यक प्रोडक्ट खरीदने से खर्च भी बढ़ता है और संतुष्टि भी नहीं मिलती।
युवाओं में खर्च के इस नए ट्रेंड ने 'फोमो इकोनॉमी' को जन्म दिया। हाल ही संसद में भी एक केंद्रीय मंत्री द्वारा 'फोमो' शब्द के जिक्र के बाद यह ट्रेंड फिर चर्चा में है। MERGE सर्वे के अनुसार, लाइव कार्यक्रमों में शामिल 1,000 जेन-जी में 85 से 88 फीसदी ने बताया कि उन्होंने तय बजट से ज्यादा खर्च किया। भारत में इसका असर इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि युवा आबादी बहुत बड़ी है। रेडसीयर के अनुसार 2030 तक जेन-जी भारत की आबादी का करीब 27 प्रतिशत होंगे।
फोमो इकोनॉमी, वह आर्थिक गतिविधि है जो लोगों के इस डर पर टिकी है कि अगर उन्होंने किसी ट्रेंड, अनुभव या उत्पाद को तुरंत नहीं अपनाया तो वे समाज या अपने दोस्तों के सर्कल से पीछे छूट जाएंगे। इस इकोनॉमी का सबसे बड़ा शिकार युवा वर्ग है। पीछे न छूटने की इस दौड़ में युवा अपनी कमाई से कहीं ज्यादा खर्च कर रहे हैं। फोमो और स्वाभाविक खरीदारी में अंतर समझने के लिए कुछ तरीके अपनाए जा सकते हैं, जैसे- खरीदारी से पहले 3 सवाल पूछें।
फोमो के साथ ही बाजार में ‘जोमो’ यानी जॉय ऑफ मिसिंग आउट की अवधारणा भी चर्चा में है। इसका अर्थ है कि हर ट्रेंड में शामिल होना या हर अनुभव खरीदना जरूरी नहीं। व्यावहारिक तरीका यही है कि सीमित समय की छूट या वायरल ट्रेंड देखकर तुरंत फैसला न किया जाए।