
जलवायु परिवर्तन और बढ़ते तापमान को लेकर दुनियाभर में चिंता गहराती जा रही है। इसी बीच अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी NASA के गोडार्ड इंस्टीट्यूट फॉर स्पेस स्टडीज (GISS) के वैज्ञानिकों और हार्वर्ड विश्वविद्यालय समेत कई अंतरराष्ट्रीय संस्थानों के शोधकर्ताओं ने चौंकाने वाला खुलासा किया है। वैज्ञानिकों का कहना है कि भारत में औसत तापमान दुनिया के मुकाबले काफी धीमी रफ्तार से बढ़ रहा है। वैज्ञानिक इस असामान्य पैटर्न को 'वार्मिंग होल' यानी तापमान वृद्धि में एक तरह का 'छेद' या ठंडा धब्बा कह रहे हैं।
पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के आधिकारिक आकलन के मुताबिक, 1901 से 2018 के बीच भारत का वार्षिक औसत तापमान करीब 0.7 डिग्री सेल्सियस बढ़ा है। इसकी तुलना में दुनिया की जमीन का औसत तापमान इसी दौर में करीब दोगुनी रफ्तार से बढ़ा है। नासा के गोडार्ड इंस्टीट्यूट के आंकड़ों पर आधारित एक विश्लेषण के अनुसार भी भारत का तापमान 1901 के बाद से आधे से भी कम, यानी वैश्विक औसत के लगभग आधे स्तर पर बढ़ा है। वहीं, वैश्विक स्तर पर औद्योगिक क्रांति के पहले (1850-1900) के मुकाबले अब तक धरती का तापमान करीब 1.1 से 1.2 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ चुका है। साल 2024 व 2025 अब तक के सबसे गर्म वर्षों में गिने गए हैं।
दुनियाभर के अन्य देशों के मुकाबले भारत में 'ठंडक' क्यों है? इस सवाल का सटीक जवाब वैज्ञानिकों के पास भी नहीं है। सबसे दिलचस्प बात है कि वैज्ञानिक अब तक इस बात पर एकमत नहीं हो पाए हैं कि आखिर भारत में यह 'ठंडक' क्यों बनी हुई है। नासा के जलवायु वैज्ञानिक 'बेंजामिन कुक' और उनके सहयोगियों के मुताबिक इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं। जिन पर अलग-अलग शोध हो रहे हैं।
एक बड़ी वजह मानी जा रही है कि वायु प्रदूषण से पैदा होने वाले एरोसॉल कण, जो सूरज की किरणों को आंशिक रूप से परावर्तित कर धरती की सतह तक कम गर्मी पहुंचने देते हैं। दूसरी वजह उत्तर भारत में सिंचाई के बड़े पैमाने पर विस्तार को बताया गया है। खेतों से वाष्पीकरण की प्रक्रिया हवा से गर्मी सोख लेती है, जिससे सतह का तापमान कुछ हद तक नियंत्रित रहता है।
हाल ही में नेचर कम्युनिकेशंस पत्रिका में प्रकाशित एक अध्ययन ने एक तीसरी वजह की ओर इशारा किया है। बढ़ती कार्बन डाइऑक्साइड सांद्रता खुद भारत में गर्मियों के दौरान एक अलग तरह की शीतलता पैदा कर रही है। शोधकर्ताओं के अनुसार, CO2 के कारण यूरेशियाई महाद्वीप के अपेक्षाकृत ज्यादा गर्म होने से हवा के प्रवाह और नमी परिवहन में बदलाव आता है।
हिमालय व हिंदूकुश पर्वत श्रृंखलाओं की रुकावट के चलते भारत के ऊपर बादलों का आवरण बढ़ जाता है। घने बादल सूरज की किरणों को सतह तक पहुंचने से रोकते हैं, जिससे गर्मियों में एक तरह की ठंडक बनी रहती है। हालांकि, वैज्ञानिक यह भी मानते हैं कि अगर प्रदूषण घटा या सिंचाई पैटर्न बदला, तो यह 'सुरक्षा कवच' कभी भी कमजोर पड़ सकता है।
धीमी औसत वृद्धि, पर हीटवेव तेज यहां एक बड़ा विरोधाभास सामने आता है। भले ही भारत का औसत तापमान धीमी गति से बढ़ रहा हो, लेकिन गर्म लहरों (हीटवेव) की तस्वीर बिल्कुल अलग है। पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में हीटवेव के दिनों की संख्या बीते करीब एक दशक में लगभग दोगुनी हो गई है, जो पहले सालाना करीब 100 दिन के आसपास थी।
वह अब बढ़कर करीब 200 दिन तक पहुंच चुकी है। मौसम विभाग (IMD) के अलग आंकड़े भी बताते हैं कि 1981-90 के दशक से लेकर 2011-20 के दशक तक देशभर में अत्यधिक गर्म दिनों की कुल संख्या लगातार बढ़ती गई है। यानी औसत तापमान भले संयमित दिख रहा हो, लेकिन गर्मी की चरम घटनाएं- लू, गर्म रातें और नमी भरी उमस पहले से कहीं ज्यादा बार और ज्यादा तीव्रता से आ रही हैं।
जलवायु वैज्ञानिकों की चिंता यह है कि 'वार्मिंग होल' का यह सुकून लंबे समय तक टिकने वाला नहीं है। इस बीच बढ़ते सूखे व चरम मौसमी घटनाओं का खतरा बना हुआ है। कई अध्ययनों में यह आशंका जताई गई है कि आने वाले दशकों में उत्तर, उत्तर-पूर्व और मध्य भारत में कृषि सूखे की तीव्रता और अवधि बढ़ सकती है। जिसका सीधा असर सिंचाई पर निर्भर खेती और भूजल भंडार पर पड़ेगा।
हीटवेव से जुड़ी बीमारियों, श्रम उत्पादकता में गिरावट और सार्वजनिक स्वास्थ्य पर बोझ बढ़ने के जोखिम को लेकर भी शोधकर्ता आगाह कर चुके हैं। जलवायु विशेषज्ञों की स्पष्ट राय है कि 'वार्मिंग होल' को भारत के लिए राहत की तरह नहीं देखा जाना चाहिए। औसत आंकड़े पूरी तस्वीर नहीं दिखाते हैं, वे चरम घटनाओं के उतार-चढ़ाव को छिपा देते हैं।