
मध्यप्रदेश के पांढुर्ना में वर्षों पुरानी परंपरा और रोमांच का खतरनाक खेल 11 सितंबर 2026 यानी शुक्रवार को जाम नदी के तट पर देखने को मिलेगा। विश्व प्रसिद्ध गोटमार मेले में सूर्योदय से सूर्यास्त तक पांढुर्ना और सांवरगांव के लोग आमने-सामने होंगे और एक-दूसरे पर पत्थरों की बौछार करेंगे। मेले को लेकर तैयारियां तेज हो गई हैं। बुधवार को ही नदी के दोनों तटों पर बड़ी संख्या में पत्थर जमा कर दिए गए।
गोटमार मेले के दौरान जाम नदी के बीचों-बीच पलास का पेड़ गाड़कर उस पर झंडा लगाया जाता है। इसे अपने कब्जे में लेने के लिए पांढुर्ना और सांवरगांव के लोग दिनभर संघर्ष करते हैं। पांढुर्ना पक्ष झंडे को तोडने का प्रयास करता है, जबकि सांवरगांव पक्ष पत्थरों की बौछार कर उन्हें रोकता है। इस खेल में हर साल दर्जनों लोग गंभीर रूप से घायल होते हैं। मेले के इतिहास में अब तक 14 लोगों की जान जा चुकी है। इस साल के मेले को लेकर पुलिस-प्रशासन की ओर से सुरक्षा व चिकित्सा व्यवस्था आदि की तैयारियां की गई है।
मान्यता के अनुसार, पांढुर्ना के एक युवक को सांवरगांव की युवती से प्रेम था। युवक के युवती को लेकर जाम नदी पार करते समय सांवरगांव के लोगों ने उन्हें रोकने के लिए पत्थर बरसाए। इसके जवाब में पांढुर्ना के लोगों ने प्रेमी युगल की रक्षा के लिए पत्थर बरसाए। इस हिंसक संघर्ष में पत्थर लगने से प्रेमी युगल की मौत हो गई। उनकी याद में ही गोटमार मेले की परंपरा शुरू होने की मान्यता है।
दूसरी किंवदंती के अनुसार, सन 1740 में देवगढ़ के राजा जाटवा नरेश और नागपुर रियासत के राजा रघुजी भोसले की सेनाओं के बीच सीमा विवाद को लेकर संघर्ष हुआ था। रघुजी भोसले की सेना आधुनिक हथियारों से लैस थी, जबकि जाटवा नरेश की सेना तीर-कमान से मुकाबला कर रही थी। तीर समाप्त होने के बाद सैनिकों ने पत्थरों से ही दुश्मन सेना को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया था। इसी घटना को गोटमार परंपरा की शुरुआत भी माना जाता है।
इस साल के मेले को लेकर पुलिस-प्रशासन ने सुरक्षा व चिकित्सा व्यवस्था की व्यापक तैयारियां की हैं। शांति समिति की बैठकें कर लोगों से शांतिपूर्ण ढंग से उत्सव मनाने की अपील की गई है। सुरक्षा के मद्देनजर कलेक्टर-एसपी सहित करीब 700 पुलिसकर्मी तैनात रहेंगे, जबकि ड्रोन कैमरों और सीसीटीवी के जरिए पूरे मेला परिसर पर नजर रखी जाएगी। किसी भी आपात स्थिति से निपटने के लिए स्वास्थ्य विभाग को पहले से अलर्ट मोड पर रखा गया है, ताकि घायलों को तुरंत चिकित्सा सहायता मिल सके। गोटमार मेला अपने खतरनाक स्वरूप के बावजूद क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा बना हुआ है और हर साल दूर-दूर से लोग इसे देखने पांढुर्णा पहुंचते हैं।