
भारत में आज लगभग हर चीज का डेटा तैयार हो रहा है, कितने लोग काम कर रहे हैं, कितने बच्चे स्कूल जा रहे हैं, कितनी बारिश हुई, कितने किसानों को सरकारी योजनाओं का लाभ मिला, किस जिले में कितने अस्पताल हैं और किस राज्य में कितनी बिजली पैदा हो रही है। केंद्र और राज्य सरकारों के अलग-अलग विभाग हर दिन बड़ी मात्रा में आंकड़े जुटाते हैं।
फिर भी अगर कोई शोधकर्ता, पत्रकार, कंपनी या सरकार किसी सवाल का जवाब डेटा से निकालना चाहे तो पहली समस्या अक्सर यही होती है- आंकड़ा मिलेगा कहां?
यही समस्या अब कर्नाटक के Tathyakosh प्लेटफॉर्म ने सामने ला दी है। 12 अगस्त 2026 को लॉन्च किए गए इस प्लेटफॉर्म के मुताबिक यह 458 स्रोतों से 15 लाख से ज्यादा डेटासेट को एक जगह खोजने की सुविधा देता है। इनमें स्वास्थ्य, कृषि, शिक्षा और शासन जैसे 16 क्षेत्र शामिल हैं। रिपोर्ट के अनुसार करीब 92% डेटासेट खुले तौर पर उपलब्ध हैं और लगभग 95% मशीन-पठनीय हैं।
इससे एक बड़ा सवाल उठता है, क्या भारत में डेटा की कमी है या समस्या डेटा तक पहुंचने की है?
भारत में आंकड़े किसी एक संस्था द्वारा तैयार नहीं किए जाते। अलग-अलग मंत्रालय, विभाग, राज्य सरकारें, स्थानीय निकाय और सरकारी संस्थान अपने-अपने काम के हिसाब से डेटा जुटाते हैं। मसलन, रोजगार से जुड़े आंकड़े एक जगह मिलेंगे, कृषि का डेटा दूसरी जगह, स्वास्थ्य का तीसरी जगह और राज्यों का स्थानीय डेटा अलग-अलग पोर्टल पर।
MoSPI देश की सांख्यिकी व्यवस्था का नोडल मंत्रालय है और केंद्र, राज्यों तथा दूसरे संस्थानों के सांख्यिकीय काम में समन्वय की भूमिका निभाता है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि देश का हर सरकारी डेटा एक ही जगह उपलब्ध है। यही वजह है कि किसी एक विषय पर काम करने वाले व्यक्ति को कई वेबसाइटों, रिपोर्टों और दस्तावेजों से आंकड़े जुटाने पड़ सकते हैं।
भारत सरकार का Open Government Data Platform यानी data.gov.in इसी समस्या को कम करने के लिए बनाया गया है। इसका उद्देश्य सरकारी डेटा को मानव और मशीन दोनों के पढ़ने योग्य रूप में उपलब्ध कराना और उसकी खोज आसान बनाना है।
जुलाई 2026 के अंत में इसके पोर्टल पर 12,547 कैटलॉग और 4.14 लाख से ज्यादा संसाधन दर्ज थे। साथ ही हजारों एपीआई और विजुअलाइजेशन भी उपलब्ध थे।
फिर भी चुनौती खत्म नहीं होती। क्योंकि भारत का सरकारी डेटा सिर्फ एक पोर्टल पर पैदा नहीं होता। कई विभागों की वेबसाइटें और रिपोर्टें अलग-अलग बनी रहती हैं। ऐसे में डेटा उपलब्ध होना और डेटा आसानी से खोज पाना दो अलग बातें हैं।
Tathyakosh इसी दूसरी समस्या को हल करने की कोशिश करता है। यह खुद हर डेटा को अपने पास रखने के बजाय अलग-अलग स्रोतों में मौजूद आंकड़ों को खोजने और उनकी गुणवत्ता को समझने का रास्ता देता है।
यह सवाल सबसे ज्यादा भ्रम पैदा करता है। मान लीजिए बेरोजगारी के दो आंकड़े सामने आते हैं और दोनों सरकारी स्रोतों से हैं। इसका मतलब जरूरी नहीं कि उनमें से एक गलत है। अलग-अलग आंकड़े अलग समय, नमूने, परिभाषा, गणना पद्धति या डेटा स्रोत के आधार पर तैयार हो सकते हैं।
MoSPI की सांख्यिकी प्रणाली में भी डेटा के संशोधन की व्यवस्था है। शुरुआती आंकड़े सीमित जानकारी के आधार पर जारी किए जा सकते हैं और बाद में ज्यादा जानकारी मिलने पर उन्हें संशोधित किया जा सकता है। मंत्रालय के दस्तावेज के मुताबिक संशोधन नई जानकारी, पद्धति में बदलाव, डेटा स्रोत में बदलाव या त्रुटि सुधार जैसी वजहों से हो सकता है।
इसलिए अलग आंकड़ा दिखना हमेशा डेटा में गड़बड़ी का प्रमाण नहीं है। असल समस्या तब पैदा होती है जब आंकड़े के साथ यह स्पष्ट न हो कि उसे कैसे तैयार किया गया, किस अवधि का है और उसकी परिभाषा क्या है।
असली समस्या सिर्फ डेटा नहीं, ‘मेटाडेटा’ भी है, किसी आंकड़े को समझने के लिए सिर्फ संख्या काफी नहीं है। उदाहरण के लिए लिखा है- 'जिले में 50,000 रोजगार।' लेकिन सवाल होगा…
इसी जानकारी को मेटाडेटा कहा जाता है। भारत सरकार के Open Government Data दिशानिर्देशों में भी डेटा के साथ स्रोत, पद्धति, आवृत्ति, क्षेत्र, भौगोलिक दायरा और दूसरी जानकारी उपलब्ध कराने पर जोर दिया गया है।
यानी अच्छा डेटा वह नहीं है जिसमें सिर्फ बड़ी संख्या हो। अच्छा डेटा वह है जिसे कोई दूसरा व्यक्ति समझ, जांच और दोबारा इस्तेमाल कर सके।
यह समस्या पत्रकारों और शोधकर्ताओं के लिए खास तौर पर बड़ी है। सरकारी विभाग अक्सर अपनी रिपोर्ट PDF में जारी करते हैं। PDF इंसान के पढ़ने के लिए सुविधाजनक हो सकती है, लेकिन कंप्यूटर के लिए डेटा निकालना मुश्किल हो सकता है।
दिलचस्प बात यह है कि भारत सरकार के Open Data Platform के अपने दिशानिर्देश भी कहते हैं कि PDF मशीन के लिए डेटा को पार्स करने में कठिन होती है और डेटा को CSV, Excel, XML जैसे मशीन-पठनीय प्रारूप में उपलब्ध कराना बेहतर है।
मान लीजिए किसी 300 पेज की रिपोर्ट में एक जरूरी आंकड़ा 147वें पेज पर है। इंसान उसे पढ़ सकता है, लेकिन अगर हजारों ऐसी रिपोर्टों से डेटा निकालना हो तो यह काम बेहद धीमा और महंगा हो जाता है। यही वजह है कि डेटा का डिजिटल होना और डेटा का मशीन-पठनीय होना एक ही बात नहीं है।
AI को सिर्फ बहुत सारा डेटा नहीं चाहिए। उसे साफ, संरचित, विश्वसनीय और संदर्भ के साथ उपलब्ध डेटा चाहिए। अगर सरकारी आंकड़े अलग-अलग वेबसाइटों पर हों, पुराने और नए संस्करणों का फर्क साफ न हो या डेटा PDF में बिखरा हो तो AI के लिए भी उसका इस्तेमाल कठिन हो जाता है।
इसके उलट अगर डेटा मशीन-पठनीय हो, उसकी परिभाषा स्पष्ट हो और अपडेट की तारीख दिखाई दे तो AI मॉडल, शोधकर्ता और कंपनियां उसे तेजी से इस्तेमाल कर सकते हैं। यही कारण है कि Tathyakosh जैसे प्लेटफॉर्म को सिर्फ एक वेबसाइट नहीं, बल्कि डेटा खोजने के बुनियादी ढांचे के रूप में देखा जा रहा है।
यानी डेटा जितना खोजने योग्य और इस्तेमाल योग्य होगा, उसकी आर्थिक और सामाजिक उपयोगिता उतनी ही बढ़ेगी। लेकिन सिर्फ डेटा एक जगह जमा कर देना काफी नहीं। यहां सबसे महत्वपूर्ण बात है।
Tathyakosh जैसे प्लेटफॉर्म डेटा खोजने की समस्या कम कर सकते हैं, लेकिन डेटा की मूल गुणवत्ता की जिम्मेदारी उस विभाग या संस्था की ही रहेगी जिसने उसे तैयार किया है।
Data.gov.in भी स्पष्ट करता है कि वहां प्रकाशित डेटा संबंधित मंत्रालय, राज्य या विभाग के स्वामित्व में रहता है। प्लेटफॉर्म का काम उसे उपलब्ध और खोजने योग्य बनाना है। इसलिए आगे की चुनौती तीन स्तरों पर होगी
अगर इनमें से कोई एक कड़ी कमजोर हुई तो सिर्फ बड़ा डेटाबेस बनाने से समस्या हल नहीं होगी।
सबसे पहले सभी सरकारी विभागों के लिए एक जैसे डेटा मानक जरूरी हैं। एक राज्य में किसी चीज की परिभाषा कुछ और और दूसरे राज्य में कुछ और होगी तो तुलना मुश्किल रहेगी। दूसरा, ज्यादा से ज्यादा डेटा मशीन-पठनीय प्रारूप में उपलब्ध होना चाहिए।तीसरा, हर डेटा सेट के साथ उसकी पद्धति, स्रोत, समय अवधि और अपडेट की तारीख साफ लिखी होनी चाहिए। चौथा, पुराने डेटा को हटाने के बजाय उसके पुराने संस्करण और संशोधन का रिकॉर्ड रखना जरूरी है और पांचवां, जहां डेटा सार्वजनिक किया जा सकता है वहां उसे खुला और आसानी से इस्तेमाल करने योग्य बनाया जाना चाहिए।