
उत्तर प्रदेश में एनकाउंटर की राजनीति को समझने के लिए 1982 को एक महत्वपूर्ण मोड़ के तौर पर देखा जा सकता है। लेकिन एक तथ्य शुरुआत में साफ करना जरूरी है। डकैत विरोधी अभियान और बड़ी संख्या में पुलिस मुठभेड़ों की शुरुआत 1981 में हुई थी, जबकि 1982 में इस पूरे दौर से जुड़े कई गंभीर मामले सामने आए।
इसकी पृष्ठभूमि में था चंबल और बुंदेलखंड से जुड़े इलाकों में डकैतों का आतंक, ग्रामीण इलाकों में हिंसा और पुलिस पर अपराधियों के खिलाफ तेजी से कार्रवाई करने का राजनीतिक दबाव।
इसी दौर में एक दूसरा सवाल भी पैदा हुआ, क्या पुलिस जिन लोगों को मुठभेड़ में डकैत बताकर मार रही है, वे वास्तव में डकैत थे? यहीं से यूपी की ‘एनकाउंटर पुलिसिंग’ पर गंभीर सवाल उठने शुरू हुए।
1981 में मैनपुरी जिले के देहुली गांव में 24 दलितों की हत्या ने पूरे उत्तर प्रदेश को हिला दिया। सुप्रीम कोर्ट के बाद के रिकॉर्ड में भी इस घटना को डकैत विरोधी अभियान की पृष्ठभूमि के रूप में दर्ज किया गया है। तत्कालीन मुख्यमंत्री वीपी सिंह ने डकैतों के खिलाफ अभियान तेज करने का फैसला किया। सरकार पर दबाव इतना था कि डकैतों के आतंक को जल्दी खत्म करने का लक्ष्य सामने रखा गया।
पुलिस ने बड़े पैमाने पर अभियान शुरू किया। वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों, खुफिया एजेंसियों और बड़ी संख्या में पुलिस बल को डकैत प्रभावित जिलों में लगाया गया। दिसंबर 1981 की एक समकालीन रिपोर्ट के मुताबिक अभियान में करीब 25 वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी, 100 से ज्यादा खुफिया अधिकारी और 1,500 पुलिसकर्मी/पीएसी जवान लगाए गए थे।
18 नवंबर से 28 दिसंबर 1981 के बीच पुलिस ने 299 कथित डकैतों को मारने और 1,228 को पकड़ने का दावा किया। लेकिन इसी आंकड़े ने विवाद पैदा कर दिया।
उस समय की इंडिया टुडे की जांच में कई ऐसे मामलों पर सवाल उठाए गए जिनमें पुलिस के दावे और ग्रामीणों के बयानों में अंतर था। रिपोर्ट ने आरोप लगाया कि अभियान में ‘बॉडी काउंट’ का दबाव इतना बढ़ गया था कि निर्दोष लोगों को भी मुठभेड़ में मार दिए जाने के आरोप सामने आए। यही वह बिंदु था जहां डकैत विरोधी अभियान और ‘फर्जी एनकाउंटर’ का सवाल एक-दूसरे से जुड़ने लगा।
हालांकि 299 का आंकड़ा निर्दोष लोगों के मारे जाने का सरकारी आंकड़ा नहीं था। यह बाद में पत्रकार चैतन्य कालबाग और अन्य याचिकाकर्ताओं द्वारा लगाए गए आरोप का हिस्सा था। सुप्रीम कोर्ट ने 1989 के फैसले में इसी आरोप का उल्लेख किया।
12 मार्च 1982 की रात गोंडा जिले के माधवपुर गांव में एक ऐसी घटना हुई जिसने पूरे एनकाउंटर अभियान पर सवाल खड़े कर दिए। पुलिस के मुताबिक वहां डकैतों के आने की सूचना थी और पुलिस कार्रवाई के दौरान डीएसपी केपी सिंह तथा 12 अन्य लोग मारे गए। लेकिन बाद में कहानी बदल गई।
केपी सिंह की पत्नी विभा सिंह ने पुलिस के आधिकारिक संस्करण पर सवाल उठाया और सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। इसके बाद मामले की जांच सीबीआई को दी गई। सीबीआई ने 19 पुलिसकर्मियों के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल किया।
2013 में विशेष सीबीआई अदालत ने आठ पुलिसकर्मियों को दोषी ठहराया। तीन को मौत की सजा और पांच को उम्रकैद दी गई। अदालत के मुताबिक यह एक सुनियोजित हत्या थी जिसे मुठभेड़ का रूप दिया गया था। लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई।
2017 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने छह दोषसिद्ध पुलिसकर्मियों को बरी कर दिया। हाईकोर्ट ने कहा कि उपलब्ध सामग्री के आधार पर उसे मुठभेड़ वास्तविक लगी और निचली अदालत ने इसे फर्जी मानने में गलती की थी। इसलिए इस मामले को लिखते समय '1982 में गोंडा का एनकाउंटर फर्जी साबित हुआ” कहना तथ्यात्मक रूप से अधूरा होगा।
सही तथ्य यह है कि सीबीआई ने इसे फर्जी एनकाउंटर माना, विशेष सीबीआई अदालत ने पुलिसकर्मियों को दोषी ठहराया, लेकिन बाद में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने छह दोषियों को बरी कर दिया। यही इस मामले की कानूनी जटिलता है।
उस दौर की पुलिसिंग को समझने के लिए उस समय के राजनीतिक माहौल को देखना जरूरी है। डकैतों के खिलाफ कार्रवाई सिर्फ कानून-व्यवस्था का सवाल नहीं रह गई थी। ग्रामीण इलाकों में डकैती, हत्या और अपहरण से जनता में डर था। सरकार पर यह दिखाने का दबाव था कि वह डकैतों के खिलाफ निर्णायक कार्रवाई कर रही है। ऐसे माहौल में पुलिस के लिए गिरफ्तारी और मुकदमे से ज्यादा तेज परिणाम देने वाला रास्ता मुठभेड़ दिखाई दे सकता था।
यहीं से ‘एनकाउंटर’ सिर्फ पुलिस कार्रवाई नहीं बल्कि राजनीतिक प्रदर्शन का हिस्सा बनने लगा- यानी सरकार यह दिखा सकती थी कि अपराधियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई हो रही है।
1982 से जुड़े पुलिस एनकाउंटरों पर पत्रकार चैतन्य कालबाग और अन्य लोगों ने सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएं दायर की थीं। 1989 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इन मामलों में व्यापक समीक्षा की जरूरत है। अदालत ने यह भी कहा कि कानून-व्यवस्था की ऐसी परिस्थितियों में इस संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता कि निजी दुश्मनी या दूसरे मकसद भी कानून-व्यवस्था के नाम पर बल प्रयोग के जरिए पूरे किए जाएं।
अदालत ने यह भी जोर दिया कि कानून-व्यवस्था के रक्षक निर्दोष नागरिकों के संरक्षक के रूप में अपनी जिम्मेदारी निभाएं। यह टिप्पणी महत्वपूर्ण थी क्योंकि अदालत ने पहली बार नहीं, बल्कि बहुत स्पष्ट तरीके से यह सवाल सामने रखा कि पुलिस मुठभेड़ के नाम पर निजी दुश्मनी या गैरकानूनी हत्या की संभावना को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
नहीं। बाद के दशकों में भी उत्तर प्रदेश और दूसरे राज्यों में पुलिस एनकाउंटरों को लेकर विवाद सामने आते रहे। 1989 के सुप्रीम कोर्ट के मामले में जिस समस्या की ओर ध्यान दिलाया गया था। यानी पुलिस की कार्रवाई की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच- वही सवाल बाद के मामलों में भी उठता रहा।
2014 में सुप्रीम कोर्ट ने PUCL बनाम महाराष्ट्र मामले में पुलिस एनकाउंटरों से जुड़े दिशानिर्देश तय किए और कहा कि जीवन के अधिकार की संवैधानिक सुरक्षा बनी रहती है। अदालत ने पुराने मामलों का उल्लेख करते हुए कहा कि पुलिस मुठभेड़ में हुई मौत वास्तविक थी या फर्जी, इसकी निष्पक्ष जांच जरूरी है। यानी 1980 के दशक के विवादों ने आगे चलकर एनकाउंटर की जांच और जवाबदेही की बड़ी कानूनी बहस को जन्म दिया।
क्योंकि आज जब किसी राज्य में एनकाउंटर को कानून-व्यवस्था की सफलता के प्रतीक के तौर पर पेश किया जाता है, तो 1980 के दशक का यूपी एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक सबक देता है। अपराध के खिलाफ कठोर कार्रवाई जरूरी हो सकती है, लेकिन कठोरता और कानून से बाहर जाकर कार्रवाई एक ही चीज नहीं हैं।
1982 का दौर यह दिखाता है कि जब सरकार पर अपराध खत्म करने का दबाव, पुलिस पर परिणाम देने का दबाव और जनता में सुरक्षा की मांग एक साथ बढ़ती है, तो मुठभेड़ें राजनीतिक रूप से आकर्षक हथियार बन सकती हैं।
लेकिन उसी समय यह सवाल भी उतना ही जरूरी है- मुठभेड़ में मरा व्यक्ति वास्तव में अपराधी था या नहीं? और इसका जवाब पुलिस की प्रेस रिलीज नहीं, बल्कि स्वतंत्र जांच, सबूत और न्यायिक प्रक्रिया से ही मिल सकता है।