
भारत और पाकिस्तान के बीच जल विवाद एक जटिल और संवेदनशील विषय है। इसका प्रभाव केवल दोनों देशों के रिश्तों तक सीमित नहीं है, बल्कि क्षेत्रीय स्थिरता, कृषि, ऊर्जा और जल सुरक्षा पर भी पड़ सकता है। अप्रैल 2025 में भारत ने सिंधु जल संधि (Indus Waters Treaty, 1960) को स्थगित करने का फैसला लिया। आइए समझते हैं कि यह संधि क्या है, भारत ने यह कदम क्यों उठाया और इसके संभावित प्रभाव क्या हो सकते हैं।
जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में 22 अप्रेल 2025 को हुए आतंकवादी हमले में 26 लोगों की मौत हुई। इसके बाद 23 अप्रेल 2025 को भारत की कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी (CCS) ने सिंधु जल संधि को तत्काल प्रभाव से Abeyance यानी स्थगित रखने का निर्णय लिया।
भारत ने कहा कि यह फैसला तब तक लागू रहेगा, जब तक पाकिस्तान सीमा पार आतंकवाद के समर्थन को विश्वसनीय और अपरिवर्तनीय रूप से समाप्त नहीं करता।
इसके साथ ही भारत ने अटारी इंटीग्रेटेड चेक पोस्ट को बंद करने, पाकिस्तानी सैन्य सलाहकारों को Persona Non Grata घोषित करने और नई दिल्ली स्थित पाकिस्तानी मिशन की संख्या कम करने जैसे कई कूटनीतिक कदम भी उठाए।
इससे स्पष्ट हुआ कि भारत ने सिंधु जल संधि के मुद्दे को व्यापक सुरक्षा और कूटनीतिक संदर्भ से जोड़ दिया है।
सिंधु जल संधि वर्ष 1960 में भारत और पाकिस्तान के बीच हुई थी। इसमें विश्व बैंक ने समझौते की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
संधि के तहत छह नदियों को दो समूहों में बांटा गया। पूर्वी नदियां 'रावी, ब्यास और सतलुज'मुख्य रूप से भारत के उपयोग के लिए निर्धारित की गईं। वहीं पश्चिमी नदियां 'सिंधु, झेलम और चेनाब' का अधिकांश जल पाकिस्तान के लिए निर्धारित किया गया।
हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि भारत को पश्चिमी नदियों पर कोई अधिकार नहीं है। संधि भारत को घरेलू उपयोग, सीमित सिंचाई और निर्धारित शर्तों के तहत रन-ऑफ-द-रिवर जलविद्युत परियोजनाओं की अनुमति देती है। यही प्रावधान किशनगंगा और रैटले जैसी जलविद्युत परियोजनाओं से जुड़े विवादों का आधार भी रहे हैं।
सिंधु जल संधि भारत और पाकिस्तान के बीच कई युद्धों और तनावपूर्ण दौरों के बावजूद लंबे समय तक लागू रही। इसलिए 2025 में इसे स्थगित करने का भारतीय फैसला एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक कदम माना गया। पाकिस्तान ने भारत के फैसले का विरोध किया और इसे जल को राजनीतिक दबाव के साधन के रूप में इस्तेमाल करने की कोशिश बताया। दूसरी ओर, भारत ने अपने फैसले को आतंकवाद के मुद्दे से जोड़ते हुए स्पष्ट किया कि संधि का स्थगन उसकी सुरक्षा चिंताओं से संबंधित है।
भारत ने लगातार कहा है कि सिंधु जल संधि का स्थगन तब तक जारी रहेगा, जब तक सीमा पार आतंकवाद से जुड़ी उसकी चिंताओं का समाधान नहीं होता।
किशनगंगा और रैटले परियोजनाओं से जुड़े विवादों को लेकर भारत और पाकिस्तान के बीच लंबे समय से मतभेद रहे हैं। इन मामलों में संधि के तहत उपलब्ध विवाद निपटान तंत्र और विश्व बैंक से जुड़ी प्रक्रियाओं की भूमिका भी महत्वपूर्ण रही है।
इसलिए भारत का वर्तमान रुख केवल पानी के बंटवारे तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें जल कूटनीति, सुरक्षा और द्विपक्षीय संबंधों के व्यापक पहलू शामिल हैं।
पाकिस्तान की कृषि और सिंचाई व्यवस्था सिंधु नदी प्रणाली पर काफी निर्भर है। विश्व बैंक और अन्य अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के आकलनों के अनुसार, पाकिस्तान की लगभग 80 प्रतिशत सिंचित कृषि सिंधु नदी प्रणाली से जुड़े जल संसाधनों पर निर्भर है।
यदि दोनों देशों के बीच जल संबंधी तनाव लंबे समय तक बना रहता है, तो पाकिस्तान के लिए सिंचाई, कृषि उत्पादन और जल प्रबंधन से जुड़ी चुनौतियां बढ़ सकती हैं।
हालांकि, संधि के स्थगन का अर्थ यह नहीं है कि भारत तत्काल पाकिस्तान का पूरा जल प्रवाह रोक सकता है। नदियों का प्रवाह, मौजूदा जल ढांचा, बांधों की क्षमता और तकनीकी सीमाएं भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
इस विवाद का असर केवल पाकिस्तान तक सीमित नहीं माना जा सकता। भारत के लिए भी जल प्रबंधन, सिंचाई, बाढ़ नियंत्रण और जलविद्युत से जुड़े मुद्दे महत्वपूर्ण हैं।
सिंधु नदी प्रणाली से जुड़े जल संसाधनों का बेहतर उपयोग करने के लिए भारत को जल भंडारण, सिंचाई दक्षता, जल संरक्षण और आधुनिक जल प्रबंधन पर लगातार ध्यान देना होगा।
इसलिए यह मुद्दा भारत के लिए केवल पाकिस्तान के साथ कूटनीतिक दबाव का विषय नहीं है, बल्कि अपने जल संसाधनों के दीर्घकालीन प्रबंधन से भी जुड़ा है।
फिलहाल सिंधु जल संधि के स्थगन का मतलब यह नहीं है कि भारत या पाकिस्तान के आम लोगों के नलों में पानी की आपूर्ति तुरंत बंद हो जाएगी।
हालांकि, यदि जल विवाद लंबे समय तक चलता है, तो इसका अप्रत्यक्ष प्रभाव कृषि, खाद्य सुरक्षा, जल प्रबंधन और ऊर्जा क्षेत्र पर पड़ सकता है।
भारत में भी जल संरक्षण, वर्षा जल संचयन, जल पुनर्चक्रण और सिंचाई की दक्षता बढ़ाने की आवश्यकता और महत्वपूर्ण हो जाती है।
आगे की स्थिति कई बातों पर निर्भर करेगी। सबसे महत्वपूर्ण भारत-पाकिस्तान संबंधों में सुरक्षा और आतंकवाद से जुड़े मुद्दे हैं। यदि दोनों देशों के बीच राजनीतिक और सुरक्षा संबंधों में सुधार होता है, तो भविष्य में सिंधु जल संधि की स्थिति पर भी पुनर्विचार की संभावना बन सकती है।
दूसरी ओर, यदि तनाव लंबे समय तक बना रहता है, तो जल कूटनीति दोनों देशों के बीच संबंधों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बनी रह सकती है।
इस दौरान भारत के लिए अपने जल संसाधनों का बेहतर उपयोग, जल संरक्षण और आधुनिक जल प्रबंधन को मजबूत करना महत्वपूर्ण होगा।
बहरहाल, भारत और पाकिस्तान के बीच सिंधु जल संधि का विवाद केवल पानी के बंटवारे का मामला नहीं है। यह राष्ट्रीय सुरक्षा, कूटनीति, कृषि, ऊर्जा और जल सुरक्षा से जुड़ा व्यापक मुद्दा बन चुका है। सिंधु जल संधि का भविष्य दोनों देशों के राजनीतिक और सुरक्षा संबंधों से भी जुड़ा हुआ है। ऐसे में आने वाले समय में जल कूटनीति भारत-पाकिस्तान संबंधों का एक महत्वपूर्ण पहलू बनी रह सकती है। आम लोगों के लिए भी इसका सबसे बड़ा संदेश यही है कि जल संसाधनों का संरक्षण और उनका बेहतर प्रबंधन भविष्य की जल सुरक्षा के लिए बेहद जरूरी है।