
बिहार की ग्रामीण महिलाओं के बनाए उत्पादों को अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुंचाने की दिशा में एक अहम उपलब्धि सामने आई है। एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल फॉर हैंडीक्राफ्ट्स (EPCH) के अनुसार, बेगूसराय से JEEViKA दीदियों द्वारा बनाए गए 5,000 हस्तनिर्मित बैगों की पहली खेप यूरोप भेजी गई।
इस निर्यात को EPCH ने JEEViKA यानी बिहार रूरल लाइवलीहुड्स प्रमोशन सोसाइटी और Exmart International Pvt. Ltd. के सहयोग से सुगम बनाया। EPCH ने इसे बिहार के हस्तशिल्प को वैश्विक बाजार से जोड़ने वाली उपलब्धि बताया था। बता दें, यह खेप 2025 की शुरुआत में भेजी गई थी।
जीविका दीदियों की आर्थिक गतिविधियां केवल हस्तशिल्प तक सीमित नहीं हैं। मधुमक्खी पालन भी ग्रामीण महिलाओं के लिए आय का एक महत्वपूर्ण जरिया बन रहा है।
जनवरी 2026 में बिहार के ग्रामीण विकास मंत्री श्रवण कुमार के हवाले से प्रकाशित जानकारी के मुताबिक, मधुमक्खी पालन की शुरुआत 2009 में मुजफ्फरपुर में पायलट प्रोजेक्ट के रूप में हुई थी। अब यह गतिविधि बिहार के 20 जिलों और 90 प्रखंडों तक पहुंच चुकी है। करीब 11,855 महिलाएं इससे जुड़ी हैं और सालाना करीब 10 से 12 करोड़ रुपये मूल्य का शहद तैयार किया जा रहा है। औसतन एक महिला की आय करीब 10,000 रुपये प्रति माह बताई गई है।
उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, उत्पादित शहद को बेहतर प्रोसेसिंग और पैकेजिंग के लिए हिमाचल प्रदेश की एक कंपनी को भेजा जाता है और इसकी मांग देश के साथ विदेशों में भी बताई गई है।
हालांकि, इस आधार पर पूरे शहद कारोबार को सीधे “ब्रांड बिहार” के नाम से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्थापित ब्रांड कहना उचित नहीं होगा। उपलब्ध जानकारी इसे बिहार की महिलाओं द्वारा तैयार शहद की देश-विदेश में पहुंच और मांग के रूप में पेश करती है।
बिहार में ग्रामीण महिलाओं के लिए बाजार उपलब्ध कराने की दिशा में एक अलग पहल JEEViKA Didi Haat के रूप में सामने आई है।
नालंदा जिले के तेल्हाड़ा गांव में 5 अगस्त 2025 को बिहार का पहला JEEViKA Didi Haat शुरू किया गया। इसे स्थानीय महिलाओं के लिए रोजगार, आजीविका और पौष्टिक खाद्य पदार्थों की उपलब्धता बढ़ाने वाले पायलट मॉडल के रूप में विकसित किया गया है।
इस हाट में स्थानीय JEEViKA स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी महिलाएं कारोबार करती हैं। यहां सब्जियों, फलों, दूध, अंडे और अन्य पौष्टिक खाद्य पदार्थों के साथ अलग-अलग सेवाओं और उत्पादों के लिए भी जगह बनाई गई है। उद्घाटन के दौरान करीब 100–150 जीविका दीदियों की मौजूदगी दर्ज की गई थी।
इस मॉडल की एक खासियत इसका जलवायु और खाद्य सुरक्षा पर ध्यान है। हाट में बारिश और धूप से बचाव के लिए ऊंचे प्लेटफॉर्म और शेड तथा पानी की निकासी की व्यवस्था की गई है। भविष्य में छोटे स्तर के, संभावित रूप से सौर ऊर्जा आधारित, कोल्ड स्टोरेज की संभावना भी बताई गई है।
इसलिए इसे “अंतरराष्ट्रीय हाट” या “इंटरनेशनल मार्ट” कहना सही नहीं होगा। इसका मौजूदा उद्देश्य मुख्य रूप से स्थानीय बाजार, पोषण, खाद्य सुरक्षा और महिलाओं की आजीविका को मजबूत करना है।
इन सभी पहलों को एक साथ देखने पर बिहार की ग्रामीण अर्थव्यवस्था में एक महत्वपूर्ण बदलाव की संभावना दिखाई देती है। लेकिन यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि इनसे वैश्विक बाजार में बड़ा बदलाव आ गया है।
सबसे बड़ा बदलाव यह हो सकता है कि ग्रामीण महिलाओं द्वारा तैयार उत्पाद स्थानीय बाजार से आगे बड़े बाजारों तक पहुंचने लगें। 5,000 हस्तनिर्मित बैगों की यूरोप भेजी गई खेप इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है।
दूसरी ओर, मधुमक्खी पालन जैसे कारोबार महिलाओं को केवल उत्पादन से जोड़ने के बजाय उन्हें एक पूरी वैल्यू चेन का हिस्सा बना सकते हैं—जिसमें उत्पादन, प्रोसेसिंग, पैकेजिंग और बाजार तक पहुंच शामिल है।
यहां सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि ग्रामीण महिलाओं को केवल सहायता पाने वाली लाभार्थी के रूप में नहीं, बल्कि उत्पादक और उद्यमी के रूप में देखा जा रहा है।
जब किसी गांव में बनी वस्तु यूरोप तक पहुंचती है या स्थानीय महिला अपने उत्पाद को बाजार में बेचती है, तो उसके साथ उत्पादन से लेकर पैकेजिंग, परिवहन, बिक्री और मार्केटिंग तक कई स्तरों पर आर्थिक गतिविधियां जुड़ती हैं।
यही वजह है कि JEEViKA जैसी पहल का प्रभाव केवल महिलाओं की आय तक सीमित नहीं रह सकता। मजबूत बाजार संपर्क मिलने पर इसका फायदा परिवार, स्थानीय रोजगार और ग्रामीण कारोबार तक पहुंच सकता है।
अंतरराष्ट्रीय बाजार तक एक खेप पहुंचना महत्वपूर्ण उपलब्धि है, लेकिन इसे टिकाऊ निर्यात कारोबार में बदलना अगली बड़ी चुनौती होगी। इसके लिए उत्पादों की गुणवत्ता, लगातार सप्लाई, पैकेजिंग, अंतरराष्ट्रीय मानकों, लॉजिस्टिक्स, बाजार संपर्क और ब्रांडिंग पर लगातार काम करना होगा।
इसी तरह Didi Haat जैसे स्थानीय बाजारों की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वहां महिलाओं के लिए कारोबार कितना टिकाऊ बनता है और ग्राहकों की नियमित मांग कितनी विकसित होती है।