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बिहार की जीविका दीदियों का हुनर यूरोप तक पहुंचा, देखिए कैसे बदल रही ग्रामीण अर्थव्यवस्था

बिहार की जीविका दीदियों के बनाए हस्तशिल्प बैगों की पहली खेप यूरोप पहुंच चुकी है। वहीं, मधुमक्खी पालन से जुड़ी हजारों महिलाएं शहद उत्पादन के जरिए अपनी आमदनी बढ़ा रही हैं। दूसरी ओर, नालंदा में शुरू हुआ JEEViKA Didi Haat स्थानीय महिलाओं और किसानों को बाजार उपलब्ध कराने की नई पहल है। इन अलग-अलग प्रयासों से बिहार की ग्रामीण महिलाओं के लिए स्थानीय से वैश्विक बाजार तक पहुंच बनाने की संभावनाएं मजबूत हो रही हैं।
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Aug 24, 2026
jeevika didi journey
प्रतीकात्मक तस्वीर | ChatGPT

बिहार की ग्रामीण महिलाओं के बनाए उत्पादों को अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुंचाने की दिशा में एक अहम उपलब्धि सामने आई है। एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल फॉर हैंडीक्राफ्ट्स (EPCH) के अनुसार, बेगूसराय से JEEViKA दीदियों द्वारा बनाए गए 5,000 हस्तनिर्मित बैगों की पहली खेप यूरोप भेजी गई।

इस निर्यात को EPCH ने JEEViKA यानी बिहार रूरल लाइवलीहुड्स प्रमोशन सोसाइटी और Exmart International Pvt. Ltd. के सहयोग से सुगम बनाया। EPCH ने इसे बिहार के हस्तशिल्प को वैश्विक बाजार से जोड़ने वाली उपलब्धि बताया था। बता दें, यह खेप 2025 की शुरुआत में भेजी गई थी।

शहद कारोबार में भी मजबूत हो रही जीविका दीदियों की भूमिका

जीविका दीदियों की आर्थिक गतिविधियां केवल हस्तशिल्प तक सीमित नहीं हैं। मधुमक्खी पालन भी ग्रामीण महिलाओं के लिए आय का एक महत्वपूर्ण जरिया बन रहा है।

जनवरी 2026 में बिहार के ग्रामीण विकास मंत्री श्रवण कुमार के हवाले से प्रकाशित जानकारी के मुताबिक, मधुमक्खी पालन की शुरुआत 2009 में मुजफ्फरपुर में पायलट प्रोजेक्ट के रूप में हुई थी। अब यह गतिविधि बिहार के 20 जिलों और 90 प्रखंडों तक पहुंच चुकी है। करीब 11,855 महिलाएं इससे जुड़ी हैं और सालाना करीब 10 से 12 करोड़ रुपये मूल्य का शहद तैयार किया जा रहा है। औसतन एक महिला की आय करीब 10,000 रुपये प्रति माह बताई गई है।

उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, उत्पादित शहद को बेहतर प्रोसेसिंग और पैकेजिंग के लिए हिमाचल प्रदेश की एक कंपनी को भेजा जाता है और इसकी मांग देश के साथ विदेशों में भी बताई गई है।

हालांकि, इस आधार पर पूरे शहद कारोबार को सीधे “ब्रांड बिहार” के नाम से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्थापित ब्रांड कहना उचित नहीं होगा। उपलब्ध जानकारी इसे बिहार की महिलाओं द्वारा तैयार शहद की देश-विदेश में पहुंच और मांग के रूप में पेश करती है।

JEEViKA Didi Haat: स्थानीय बाजार का नया मॉडल

बिहार में ग्रामीण महिलाओं के लिए बाजार उपलब्ध कराने की दिशा में एक अलग पहल JEEViKA Didi Haat के रूप में सामने आई है।

नालंदा जिले के तेल्हाड़ा गांव में 5 अगस्त 2025 को बिहार का पहला JEEViKA Didi Haat शुरू किया गया। इसे स्थानीय महिलाओं के लिए रोजगार, आजीविका और पौष्टिक खाद्य पदार्थों की उपलब्धता बढ़ाने वाले पायलट मॉडल के रूप में विकसित किया गया है।

इस हाट में स्थानीय JEEViKA स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी महिलाएं कारोबार करती हैं। यहां सब्जियों, फलों, दूध, अंडे और अन्य पौष्टिक खाद्य पदार्थों के साथ अलग-अलग सेवाओं और उत्पादों के लिए भी जगह बनाई गई है। उद्घाटन के दौरान करीब 100–150 जीविका दीदियों की मौजूदगी दर्ज की गई थी।

इस मॉडल की एक खासियत इसका जलवायु और खाद्य सुरक्षा पर ध्यान है। हाट में बारिश और धूप से बचाव के लिए ऊंचे प्लेटफॉर्म और शेड तथा पानी की निकासी की व्यवस्था की गई है। भविष्य में छोटे स्तर के, संभावित रूप से सौर ऊर्जा आधारित, कोल्ड स्टोरेज की संभावना भी बताई गई है।

इसलिए इसे “अंतरराष्ट्रीय हाट” या “इंटरनेशनल मार्ट” कहना सही नहीं होगा। इसका मौजूदा उद्देश्य मुख्य रूप से स्थानीय बाजार, पोषण, खाद्य सुरक्षा और महिलाओं की आजीविका को मजबूत करना है।

तो वैश्विक बाजार में क्या बदलाव ला सकती हैं ये पहल?

इन सभी पहलों को एक साथ देखने पर बिहार की ग्रामीण अर्थव्यवस्था में एक महत्वपूर्ण बदलाव की संभावना दिखाई देती है। लेकिन यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि इनसे वैश्विक बाजार में बड़ा बदलाव आ गया है।

सबसे बड़ा बदलाव यह हो सकता है कि ग्रामीण महिलाओं द्वारा तैयार उत्पाद स्थानीय बाजार से आगे बड़े बाजारों तक पहुंचने लगें। 5,000 हस्तनिर्मित बैगों की यूरोप भेजी गई खेप इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है।

दूसरी ओर, मधुमक्खी पालन जैसे कारोबार महिलाओं को केवल उत्पादन से जोड़ने के बजाय उन्हें एक पूरी वैल्यू चेन का हिस्सा बना सकते हैं—जिसमें उत्पादन, प्रोसेसिंग, पैकेजिंग और बाजार तक पहुंच शामिल है।

संभावित असर

  • महिलाओं की आय में वृद्धि: स्थानीय स्तर पर कारोबार और बड़े बाजारों तक पहुंच से कमाई के अवसर बढ़ सकते हैं।
  • ग्रामीण उद्यमिता को बढ़ावा: SHG से जुड़ी महिलाएं उत्पादन के साथ कारोबार और बाजार प्रबंधन में भी भूमिका निभा सकती हैं।
  • स्थानीय उत्पादों की पहचान: हस्तशिल्प, शहद और खाद्य उत्पादों को बड़े बाजारों तक पहुंचने का अवसर मिल सकता है।
  • वैल्यू चेन मजबूत होने की संभावना: प्रोसेसिंग, पैकेजिंग और गुणवत्ता सुधार से उत्पादों की बाजार क्षमता बढ़ सकती है।
  • अन्य राज्यों के लिए मॉडल: अगर ऐसे उत्पाद लगातार बड़े बाजारों तक पहुंचते हैं और महिलाओं की आय में टिकाऊ वृद्धि होती है, तो यह मॉडल दूसरे राज्यों में भी अपनाया जा सकता है।

यहां सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि ग्रामीण महिलाओं को केवल सहायता पाने वाली लाभार्थी के रूप में नहीं, बल्कि उत्पादक और उद्यमी के रूप में देखा जा रहा है।

जब किसी गांव में बनी वस्तु यूरोप तक पहुंचती है या स्थानीय महिला अपने उत्पाद को बाजार में बेचती है, तो उसके साथ उत्पादन से लेकर पैकेजिंग, परिवहन, बिक्री और मार्केटिंग तक कई स्तरों पर आर्थिक गतिविधियां जुड़ती हैं।

यही वजह है कि JEEViKA जैसी पहल का प्रभाव केवल महिलाओं की आय तक सीमित नहीं रह सकता। मजबूत बाजार संपर्क मिलने पर इसका फायदा परिवार, स्थानीय रोजगार और ग्रामीण कारोबार तक पहुंच सकता है।

अंतरराष्ट्रीय बाजार तक एक खेप पहुंचना महत्वपूर्ण उपलब्धि है, लेकिन इसे टिकाऊ निर्यात कारोबार में बदलना अगली बड़ी चुनौती होगी। इसके लिए उत्पादों की गुणवत्ता, लगातार सप्लाई, पैकेजिंग, अंतरराष्ट्रीय मानकों, लॉजिस्टिक्स, बाजार संपर्क और ब्रांडिंग पर लगातार काम करना होगा।

इसी तरह Didi Haat जैसे स्थानीय बाजारों की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वहां महिलाओं के लिए कारोबार कितना टिकाऊ बनता है और ग्राहकों की नियमित मांग कितनी विकसित होती है।

Updated on:
24 Aug 2026 12:56 pm
Published on:
24 Aug 2026 12:56 pm