
1 जुलाई 2026 से MGNREGA की जगह VB-G RAM G लागू हो गया है। नई व्यवस्था में ग्रामीण परिवार को एक वित्तीय वर्ष में 100 की जगह 125 दिन के मजदूरी रोजगार की गारंटी दी गई है। केंद्र ने इसके लिए शुरुआती तौर पर ₹95,692.31 करोड़ का आवंटन किया है।
| मुद्दा | पहले MGNREGA | अब VB-G RAM G |
|---|---|---|
| रोजगार गारंटी | 100 दिन | 125 दिन |
| न्यूनतम मजदूरी | राज्यवार | ₹300 से कम नहीं |
| सामान्य राज्यों की हिस्सेदारी | केंद्र की बड़ी भूमिका | केंद्र:राज्य 60:40 |
| पूर्वोत्तर/हिमालयी राज्य | अलग व्यवस्था | 90:10 |
| काम | ग्रामीण परिसंपत्तियां | जल, सड़क, आजीविका व ग्रामीण ढांचा |
नई व्यवस्था में मजदूरी दरों में औसतन करीब 10% बढ़ोतरी हुई है और किसी राज्य में दर ₹300 प्रतिदिन से कम नहीं रहेगी।
अगर किसी मजदूर को पूरे 125 दिन काम मिलता है और न्यूनतम ₹300 प्रतिदिन की दर मानें, तो ₹37,500 सालाना मजदूरी बनती है। लेकिन यह अधिकतम संभावित गणना है। वास्तविक भुगतान राज्य की अधिसूचित मजदूरी दर और परिवार को मिले वास्तविक काम के दिनों पर निर्भर करेगा।
नई व्यवस्था में सामान्य राज्यों के लिए केंद्र और राज्य 60:40 के अनुपात में खर्च साझा करेंगे। पूर्वोत्तर और हिमालयी राज्यों के लिए यह अनुपात 90:10 है। यानी 125 दिन का रोजगार बढ़ने के साथ राज्यों को भी ज्यादा पैसा लगाना पड़ सकता है। यही वजह है कि कुछ राज्यों ने लागत-साझेदारी को लेकर आपत्ति जताई है।
नई योजना का जोर सिर्फ मजदूरी देने पर नहीं, बल्कि गांवों में टिकाऊ परिसंपत्तियां बनाने पर है। मुख्य फोकस में शामिल हैं:
यानी सरकार का लक्ष्य है कि मजदूरी के साथ ऐसी संपत्ति भी बने जिसका फायदा गांव को लंबे समय तक मिले।
यह सबसे बड़ा सवाल है। कागज पर रोजगार की सीमा 25% बढ़ी है, लेकिन असली फायदा इस बात पर निर्भर करेगा कि मजदूरों को वास्तव में कितने दिन काम मिलता है।
नई व्यवस्था में सरकार ने डिजिटल निगरानी, जियो-टैगिंग, तकनीक आधारित निगरानी और सामाजिक ऑडिट पर भी जोर दिया है। इसका उद्देश्य फर्जीवाड़ा और खर्च की गड़बड़ी रोकना है।
लेकिन दूसरी तरफ राज्यों के लिए 60:40 की हिस्सेदारी यह सवाल भी खड़ा करती है कि क्या कमजोर वित्तीय स्थिति वाले राज्य पर्याप्त पैसा उपलब्ध करा पाएंगे?
VB-G RAM G का सबसे बड़ा वादा है-100 से बढ़कर 125 दिन रोजगार। लेकिन इसकी सफलता सिर्फ आंकड़े से नहीं मापी जाएगी। देखना होगा:
अगर 125 दिन वास्तव में काम में बदलते हैं, मजदूरी समय पर मिलती है और बनाए गए तालाब, सड़क, सिंचाई तथा दूसरी परिसंपत्तियां गांव की आय बढ़ाती हैं, तो नई व्यवस्था ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए बड़ा बदलाव बन सकती है।
लेकिन अगर रोजगार की गारंटी सिर्फ कागज पर 125 दिन रह गई और राज्यों के पास पर्याप्त पैसा नहीं रहा, तो 25 दिन की अतिरिक्त गारंटी का वास्तविक फायदा सीमित हो सकता है।