
दक्षिण एशिया और मध्य पूर्व की बदलती भू-राजनीति में पाकिस्तान लगातार खुद को एक ऐसे देश के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश कर रहा है, जो तनावग्रस्त देशों के बीच संवाद की राह खोल सकता है। ईरान और सऊदी अरब के रिश्तों, अमेरिका के साथ पश्चिम एशिया की कूटनीति और क्षेत्रीय सुरक्षा के सवालों पर इस्लामाबाद की सक्रियता ने यह चर्चा तेज़ कर दी है कि क्या पाकिस्तान वास्तव में मध्यस्थ की भूमिका निभा सकता है या यह उसकी विदेश नीति की रणनीतिक कवायद है।
पाकिस्तान की विदेश नीति लंबे समय तक सुरक्षा और सैन्य सहयोग के इर्द-गिर्द घूमती रही। लेकिन हाल के वर्षों में उसने खुद को केवल सुरक्षा साझेदार नहीं, बल्कि संवाद को बढ़ावा देने वाले देश के रूप में भी स्थापित करने का प्रयास किया है।
इस्लामाबाद की कोशिश रही है कि वह ईरान और सऊदी अरब-दोनों के साथ अपने संबंध बनाए रखे। एक ओर सऊदी अरब पाकिस्तान को आर्थिक सहायता और निवेश देता रहा है, वहीं दूसरी ओर ईरान के साथ उसकी लंबी सीमा और सुरक्षा संबंधी चुनौतियां हैं। ऐसे में दोनों देशों के बीच संतुलन बनाए रखना पाकिस्तान के लिए रणनीतिक आवश्यकता भी है।
मध्य पूर्व पाकिस्तान के लिए केवल विदेश नीति का मुद्दा नहीं, बल्कि आर्थिक हितों से भी जुड़ा है। लाखों पाकिस्तानी नागरिक खाड़ी देशों में काम करते हैं और उनकी ओर से आने वाली विदेशी मुद्रा पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था के लिए अहम स्रोत है।
इसके अलावा सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और क़तर जैसे देशों से मिलने वाला निवेश और वित्तीय सहयोग पाकिस्तान के आर्थिक संकट के दौर में महत्वपूर्ण रहा है। इसलिए क्षेत्रीय स्थिरता पाकिस्तान के अपने आर्थिक हितों से भी जुड़ी हुई है।
पाकिस्तान पिछले कुछ वर्षों से ऊँची महँगाई, विदेशी मुद्रा भंडार की कमी, कर्ज़ के बढ़ते बोझ और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के कार्यक्रमों पर निर्भरता जैसी चुनौतियों का सामना कर रहा है।
विश्लेषकों का मानना है कि ऐसे दौर में सक्रिय कूटनीति पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अपनी उपयोगिता दिखाने का अवसर देती है। हालांकि यह कहना कि उसका पूरा उद्देश्य केवल आर्थिक संकट से ध्यान हटाना है, उपलब्ध तथ्यों से पूरी तरह सिद्ध नहीं होता। विदेश नीति में सुरक्षा, आर्थिक हित और क्षेत्रीय प्रभाव-तीनों कारक साथ-साथ काम करते हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार किसी भी सफल मध्यस्थ के लिए दोनों पक्षों का भरोसा सबसे बड़ी शर्त होती है। पाकिस्तान के सामने यही सबसे बड़ी चुनौती है।
ईरान और पाकिस्तान के बीच सीमा सुरक्षा तथा उग्रवादी गतिविधियों को लेकर समय-समय पर तनाव देखा गया है। वहीं अमेरिका और पाकिस्तान के रिश्ते भी पिछले दो दशकों में कई उतार-चढ़ाव से गुज़रे हैं।
इसके बावजूद पाकिस्तान इस्लामी सहयोग संगठन (OIC), संयुक्त राष्ट्र और अन्य बहुपक्षीय मंचों पर संवाद और क्षेत्रीय स्थिरता की बात करता रहा है।
बहरहाल,दक्षिण एशिया और मध्य पूर्व में बदलते शक्ति-संतुलन के बीच पाकिस्तान अपनी कूटनीतिक भूमिका को विस्तार देने की कोशिश जारी रख सकता है। लेकिन उसकी वास्तविक प्रभावशीलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वह पड़ोसी देशों के साथ विश्वास कायम रखने, आर्थिक स्थिरता हासिल करने और क्षेत्रीय सुरक्षा चुनौतियों से निपटने में कितना सफल होता है।