
राजस्थान की प्राचीन पूजा विधियों की यह यात्रा हमें उस विरासत से जोड़ती है, जो समय की धूल में भी अपनी चमक बनाए हुए है। इस लेख में हम देखेंगे कि कैसे शक्ति‑पूजा से लेकर लोकदेवताओं की आराधना तक, राजस्थान की पूजा‑परंपराएं आज भी जीवन का हिस्सा हैं और परिवार, संस्कृति और आस्था में उनका क्या महत्व है।
राजस्थान में शक्ति‑पूजा का प्रचलन प्राचीन काल से मिलता है। ककोर्टनगर (टौंक) में मिली मिट्टी की थाली पर देवी महिषासुर वध का अंकन प्रथम शताब्दी ई. के मध्य का माना जाता है। इसके बाद कालक्रम में कालीबंगा (गंगानगर), ओसियां (8वीं-9वीं शताब्दी), बाड़ोली (9वीं), जगत (10वीं), रेवाड़ा (वि.सं. 1237) और विजय स्तंभ की शक्ति प्रतिमाएं इस पूजा परंपरा की निरंतरता को दर्शाती हैं।
राजस्थान में लोकदेवताओं की पूजा व्यापक है। गोगाजी सांपदंश से रक्षा के लिए, सीतला माता चेचक से, भेरूजी संतानहीनता से, और तेजाजी फसल बोने के समय पूजे जाते हैं। इन देवताओं की आराधना अक्सर महिलाओं द्वारा गाए जाने वाले लोकगीतों के साथ होती है, जो पारिवारिक और सामाजिक बंधनों को मजबूत करते हैं।
फड़ एक चलती‑फिरती पूजा विधि है, जिसमें पाबूजी की महाकाव्य कथा को चित्रित एक लंबी कपड़े की पट्टी पर दर्शाया जाता है। भोपाओं द्वारा इसे एक चलती मंदिर की तरह प्रस्तुत किया जाता है। यह विधि 13वीं शताब्दी के राठौड़ नायक पाबूजी की पूजा से जुड़ी है, जिन्हें भील जनजाति में देवता माना जाता है।
देवस्थान विभाग के अनुसार, पारंपरिक पूजा विधि में पंचोपचार और षोडशोपचार पूजा प्रमुख हैं। पूजा से पहले आत्म‑शुद्धि, आसन‑शुद्धि, पवित्री धारण, पृथ्वी पूजन, संकल्प, दीप‑पूजन, शंख‑पूजन, घंटा‑पूजन और स्वस्तिवाचन जैसे आचार आवश्यक माने जाते हैं। यह विधि भगवान का सत्कार करने की भावना पर आधारित है, जिसमें स्वयं और पूजा सामग्री दोनों का पवित्रीकरण शामिल है।
मध्यकाल में राजस्थान में वैष्णव, शैव, शाक्त और सूर्य पूजा के सम्प्रदायों का विकास हुआ। 10वीं‑11वीं शताब्दी के मंदिरों और शिलालेखों में “ॐ नमो विष्णवे” और “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” जैसे उद्घोष मिलते हैं, जो विष्णु‑भक्ति की गहरी जड़ें दर्शाते हैं। शिव की पूजा “ॐ नमः शिवाय” उद्घोष के साथ होती थी। नाथ सम्प्रदाय भी राजस्थान में प्रसिद्ध था, और गुरु गोरखनाथ ने यहां साधना‑परंपरा को मजबूत किया।
अमेर (जयपुर) में स्थित अंबिकेश्वर महादेव मंदिर को द्वापर युग से जोड़कर देखा जाता है। ऐसा माना जाता है कि भगवान कृष्ण और नंद बाबा ने यहां शिव की पूजा की थी, और कृष्ण का मुंडन संस्कार यहीं हुआ था। मंदिर में लगभग 3000 वर्ष पुराना नंदी का प्राचीन प्रतिमा स्थापित है।
राजस्थान में लोकदेवियों जैसे करणी माता, जीण माता, जमवाय माता आदि की पूजा स्थानीय स्तर पर गहरी आस्था से की जाती है। विश्नोई समाज ने पर्यावरण संरक्षण को धर्म का हिस्सा बनाया, कुएं‑तालाब, बावड़ी और वनों की रक्षा में उनकी भूमिका उल्लेखनीय है।
आज भी राजस्थान में पूजा विधियां जीवन का हिस्सा हैं। पंचोपचार‑षोडशोपचार, लोकदेवताओं की आराधना, फड़ कला, भक्ति गीत और पारंपरिक मंदिर पूजा, ये सब आज भी परिवारों और समुदायों में जीवंत हैं। ये विधियां धार्मिक आस्था को बनाए रखती हैं और सांस्कृतिक पहचान और सामाजिक जुड़ाव को भी मजबूत करती हैं।