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‘राजस्थान सूरज से बिजली बना रहा, फिर भी बिजली क्यों बर्बाद हो रही? ग्रिड की इस समस्या को समझिए’

Rajasthan Solar Power Grid Curtailment : राजस्थान में रिकॉर्ड सोलर बिजली उत्पादन के बावजूद ग्रिड की कमी और ट्रांसमिशन नेटवर्क के पिछड़ेपन के कारण बिजली क्यों काटनी पड़ रही है? जानें वजहें और आगे की राह।
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Aug 24, 2026
Rajasthan Solar Power Grid Curtailment
Rajasthan Solar Power Grid Curtailment : राजस्थान सोलर उत्पादन में देश में नंबर वन बना, PC- Chatgpt

राजस्थान को देश का सोलर पावर हब कहा जाता है। रेगिस्तान की खाली जमीन, साल में 300 से ज्यादा धूप वाले दिन और बड़े-बड़े सोलर पार्कों ने राज्य को भारत की अक्षय ऊर्जा कहानी के केंद्र में ला दिया है। लेकिन अब इसी सफलता ने बिजली व्यवस्था के सामने एक नई समस्या खड़ी कर दी है, बिजली पैदा करने की क्षमता तेजी से बढ़ी, लेकिन उसे देश के दूसरे हिस्सों तक पहुंचाने वाली ट्रांसमिशन व्यवस्था उतनी तेजी से नहीं बढ़ सकी।

नतीजा यह है कि जब दोपहर में राजस्थान के सोलर प्लांट पूरी क्षमता से बिजली बना रहे होते हैं, तब ग्रिड हर यूनिट को अपने अंदर लेने की स्थिति में नहीं होता। ऐसी बिजली को curtailment यानी उत्पादन रोकना/कम करना पड़ता है।

अप्रैल-जून 2026 में पूरे भारत में 8,133 GWh यानी 8.13 अरब यूनिट सौर बिजली को ट्रांसमिशन और ग्रिड सुरक्षा संबंधी दिक्कतों के कारण ग्रिड में नहीं लिया गया। राजस्थान इस समस्या से सबसे ज्यादा प्रभावित राज्यों में है।

राजस्थान में कितनी सोलर क्षमता है?

31 मार्च 2026 तक राजस्थान देश का सबसे बड़ा सोलर क्षमता वाला राज्य बन चुका था। उस समय भारत की कुल स्थापित सौर क्षमता करीब 1.50 लाख MW यानी 150 GW थी और राजस्थान की हिस्सेदारी लगभग 27% थी। इसका मतलब राजस्थान में करीब 40 GW से ज्यादा सौर क्षमता स्थापित थी। यानी भारत में लगने वाले हर चार सोलर पैनल में लगभग एक की क्षमता राजस्थान से जुड़ी हुई है।

राज्य में बड़े सोलर पार्कों के अलावा निजी कंपनियों के विशाल प्लांट और विकेंद्रीकृत परियोजनाएं भी तेजी से बढ़ रही हैं। राजस्थान में नई सोलर परियोजनाओं के करीब 40 GW के पंजीकरण की जानकारी भी सामने आई है।

यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है, 40 GW क्षमता का मतलब यह नहीं कि राजस्थान हर समय 40 GW बिजली बना रहा है।

सोलर प्लांट सिर्फ सूरज निकलने के दौरान बिजली बनाते हैं। बादल, मौसम, पैनल की स्थिति और दिन का समय उत्पादन बदलते हैं। इसलिए स्थापित क्षमता और वास्तविक बिजली उत्पादन अलग-अलग आंकड़े हैं।

कितनी बिजली वास्तव में पैदा होती है?

सोलर क्षमता को बिजली उत्पादन में बदलने के लिए Capacity Factor समझना जरूरी है। मान लीजिए किसी राज्य में 40 GW का सोलर प्लांट लगा है। अगर वह पूरे साल 40 GW की अधिकतम क्षमता पर चलता, तो उत्पादन करीब 3.50 लाख GWh होता। लेकिन सोलर प्लांट 24 घंटे नहीं चलते। राजस्थान जैसे अच्छे सौर क्षेत्र में वास्तविक उत्पादन क्षमता का औसत उपयोग मौसम और प्लांट के हिसाब से काफी कम रहता है। इसलिए 40 GW स्थापित क्षमता का मतलब 40 GW लगातार उपलब्ध बिजली नहीं है।

समस्या तब पैदा होती है जब दोपहर के कुछ घंटों में बहुत बड़ी मात्रा में सौर बिजली एक साथ पैदा होती है। इसी समय ट्रांसमिशन नेटवर्क पर दबाव बढ़ता है और यहीं से 'बिजली काटने' का सवाल आता है।

कितनी बिजली ग्रिड में नहीं जा पाती?

राजस्थान के लिए उपलब्ध ताजा रिपोर्टों में अलग-अलग अवधि और अलग-अलग परिभाषाओं के कारण आंकड़े अलग हैं, इसलिए किसी एक संख्या को पूरे साल की बर्बादी मानना सही नहीं होगा।

अप्रैल 2026 की रिपोर्ट के अनुसार राजस्थान के सोलर ऑपरेटरों ने बताया था कि रोजाना करीब 1,500-2,000 MW बिजली ट्रांसमिशन क्षमता की कमी के कारण इस्तेमाल नहीं हो पा रही थी। एक अन्य रिपोर्ट में राजस्थान में पीक सोलर घंटों लगभग सुबह 10:30 से दोपहर 2:30 बजे के दौरान करीब 25% अक्षय ऊर्जा उत्पादन के curtailment की बात सामने आई थी। 2025 में तो राजस्थान के कुछ सोलर उत्पादकों ने पीक घंटों में 48% तक curtailment की शिकायत की थी।

लेकिन इसे ऐसे नहीं समझना चाहिए कि राजस्थान की साल भर की 25 या 48% सौर बिजली बर्बाद हो रही है। ये विशिष्ट समय और परियोजनाओं से जुड़े आंकड़े हैं। राष्ट्रीय स्तर पर तस्वीर भी गंभीर है। अप्रैल-जून 2026 में भारत की लगभग 14% सौर बिजली ग्रिड में नहीं ली जा सकी।

ट्रांसमिशन लाइन और सोलर प्लांट में तालमेल क्यों नहीं?

यही पूरी समस्या की जड़ है। सोलर प्लांट बनाना अपेक्षाकृत तेज हो सकता है, लेकिन उसके लिए 765 kV या 400 kV जैसी बड़ी ट्रांसमिशन लाइनें, सब-स्टेशन और pooling stations तैयार करने में ज्यादा समय लगता है।

मान लीजिए किसी इलाके में 5,000 MW के सोलर प्लांट लग गए। लेकिन वहां से बाहर बिजली ले जाने वाली ट्रांसमिशन क्षमता सिर्फ 3,000 MW है। तब सूरज तेज होने पर 5,000 MW उत्पादन होने के बावजूद ग्रिड सिर्फ करीब 3,000 MW निकाल पाएगा। बाकी उत्पादन रोकना पड़ेगा।

राजस्थान में यही समस्या बड़े पैमाने पर दिखाई दे रही है। अप्रैल 2026 में Reuters ने रिपोर्ट किया कि राज्य में लगभग 60 GW की स्वच्छ ऊर्जा परियोजनाएं ट्रांसमिशन कनेक्शन का इंतजार कर रही थीं। यानी समस्या सिर्फ आज की बिजली की नहीं है। भविष्य में बनने वाली बिजली के लिए भी रास्ता अभी से तैयार करना होगा।

सरकार Green Energy Corridor, नए pooling stations, इंटर-स्टेट ट्रांसमिशन नेटवर्क और ऊर्जा भंडारण जैसी व्यवस्थाओं पर काम कर रही है। बिजली मंत्रालय ने भी माना है कि बेहतर transmission planning, storage, forecasting और real-time dispatch से curtailment कम किया जा सकता है।

इसका नुकसान किसे सरकार, कंपनी या उपभोक्ता?

तीनों को, लेकिन अलग-अलग तरीके से। कंपनी को सीधा नुकसान। सोलर कंपनी ने प्लांट लगाने के लिए करोड़ों-अरबों रुपये का निवेश किया है। उसे उम्मीद होती है कि उत्पादित बिजली बेचकर कर्ज चुकाएगी और मुनाफा कमाएगी।

अगर बिजली पैदा होने के बावजूद ग्रिड उसे नहीं लेता तो कंपनी की आय प्रभावित होती है। अगस्त 2026 में ऐसी स्थिति से प्रभावित अक्षय ऊर्जा कंपनियां सरकार से राहत पैकेज की मांग कर रही थीं। कुछ परियोजनाओं में 70-80% तक उत्पादन curtail होने की रिपोर्ट सामने आई।

सरकार को नुकसान : सरकार ने सोलर पार्क, सड़क, सब-स्टेशन और ट्रांसमिशन नेटवर्क पर भारी निवेश किया है। अगर प्लांट तैयार है लेकिन बिजली बाहर नहीं जा सकती, तो उस निवेश का पूरा लाभ नहीं मिलता।

इसके अलावा निवेशकों का भरोसा प्रभावित हो सकता है। अगर कंपनी को लगे कि बिजली बेचने की गारंटी नहीं है तो वह नई परियोजना में पैसा लगाने से पहले दो बार सोचेगी।

उपभोक्ता पर असर : यह सबसे दिलचस्प हिस्सा है। दोपहर में बिजली की अधिकता के बावजूद शाम को सोलर बिजली उपलब्ध नहीं होती। सूरज ढलने के बाद मांग बनी रहती है, लेकिन सोलर उत्पादन तेजी से गिर जाता है।

यानी समस्या सिर्फ 'बिजली ज्यादा बन रही है' नहीं है। असली समस्या है- बिजली सही समय और सही जगह पर उपलब्ध नहीं है।

क्या राजस्थान का सोलर मॉडल भविष्य में बिजली संकट पैदा कर सकता है? : अगर सिर्फ सोलर प्लांट लगते रहे और उसके साथ ट्रांसमिशन, बैटरी स्टोरेज, pumped storage और flexible power generation नहीं बढ़ा, तो समस्या गंभीर हो सकती है। दिन में बिजली इतनी ज्यादा हो सकती है कि उसे ग्रिड में लेना मुश्किल हो, लेकिन शाम को मांग बढ़ने पर वही बिजली उपलब्ध न हो।

यानी एक अजीब स्थिति पैदा हो सकती है
दोपहर: बिजली की भरमार
शाम: बिजली की कमी

भारत में 2026 में इसका संकेत भी दिखा। Reuters के मुताबिक गर्मियों में दिन के समय सौर ऊर्जा ने मांग का एक हिस्सा पूरा किया, लेकिन शाम के घंटों में आपूर्ति के लिए थर्मल और हाइड्रो बिजली पर ज्यादा निर्भरता बनी रही। इसका समाधान केवल और सोलर प्लांट लगाना नहीं है।

आगे का रास्ता क्या है?

पहला-ट्रांसमिशन पहले, प्लांट बाद में।
जहां बड़े सोलर पार्क बन रहे हैं, वहां पहले से पर्याप्त निकासी क्षमता तैयार करनी होगी।

दूसरा-बैटरी स्टोरेज।
दोपहर की अतिरिक्त बिजली बैटरी में जमा करके शाम को इस्तेमाल की जा सकती है।

तीसरा-पंप्ड हाइड्रो स्टोरेज।
जब सस्ती सौर बिजली उपलब्ध हो तो पानी को ऊंचाई पर पहुंचाया जाए और जरूरत के समय उससे बिजली बनाई जाए।

चौथा-देश के दूसरे हिस्सों से बेहतर कनेक्शन।
राजस्थान में बनी बिजली को दिल्ली, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और दूसरे बिजली-घाटे वाले क्षेत्रों तक पहुंचाने के लिए मजबूत इंटर-स्टेट नेटवर्क जरूरी है।

पांचवां-सोलर के साथ दूसरी तकनीक।
भविष्य का मॉडल सिर्फ सोलर नहीं, बल्कि सोलर + बैटरी + पवन + हाइड्रो + लचीली थर्मल बिजली का मिश्रण होगा।

असली कहानी सोलर की नहीं, ग्रिड की है। राजस्थान ने सोलर क्षमता बनाने में देश को पीछे छोड़ दिया है। लेकिन अब चुनौती बदल गई है।

पहले सवाल था-'बिजली बनाएं कैसे?'

अब सवाल है- बनी हुई बिजली को सही समय पर सही जगह पहुंचाएं कैसे? राजस्थान में रोजाना 1,500-2,000 MW तक सौर बिजली के इस्तेमाल में बाधा की रिपोर्ट और करीब 60 GW परियोजनाओं के ट्रांसमिशन कनेक्शन का इंतजार बताता है कि अगली लड़ाई पैनल लगाने की नहीं, ग्रिड बनाने की है।

अगर ट्रांसमिशन और स्टोरेज क्षमता सोलर क्षमता की रफ्तार के साथ नहीं बढ़ी तो राजस्थान की सबसे बड़ी ताकत-उसकी धूप-ही उसकी सबसे बड़ी चुनौती बन सकती है।

इसलिए राजस्थान का अगला सोलर लक्ष्य सिर्फ कितने GW पैनल लगेंगे, यह नहीं होना चाहिए। असली लक्ष्य होना चाहिए—कितनी सौर बिजली वास्तव में उपभोक्ता तक पहुंची।

Updated on:
24 Aug 2026 03:03 pm
Published on:
24 Aug 2026 01:40 pm