
भारत और चीन के बीच व्यापारिक संबंध लंबे समय से गहरे और जटिल रहे हैं। हाल ही में यह असंतुलन और अधिक स्पष्ट हुआ है। चीन से आयात बढ़ रहा है, जबकि भारत के निर्यात की वृद्धि अपेक्षाकृत सीमित है। इस लेख में हम भारत-चीन के बीच इस व्यापारिक असंतुलन की चुनौतियों को समझने का प्रयास करेंगे। साथ ही यह जानने की कोशिश करेंगे कि इसका भारत के लिए क्या अर्थ है?
चीन और भारत के बीच पहले 6 महीनों में कुल व्यापार 91.7 अरब डॉलर तक पहुंच गया, जिसमें चीन से भारत का आयात 79.4 अरब डॉलर रहा और भारत का निर्यात चीन को केवल 12.3 अरब डॉलर रहा। इस कारण व्यापार घाटा 67.1 अरब डॉलर तक पहुंच गया। पूरे वित्त वर्ष 2025–26 में भारत–चीन का द्विपक्षीय व्यापार 151.1 अरब डॉलर तक पहुंच गया, जबकि व्यापार घाटा 112.6 अरब डॉलर हो गया। इससे स्पष्ट होता है कि यह असंतुलन केवल एक तात्कालिक घटना नहीं, बल्कि एक दीर्घकालिक संरचनात्मक समस्या है।
भारत की आयात निर्भरता विशेष रूप से इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी, रसायन, फार्मा इंटरमीडिएट्स और ग्रीन टेक्नोलॉजी पर है। ये वे क्षेत्र हैं, जहां भारत का घरेलू उत्पादन अभी पर्याप्त नहीं है। भारत–चीन व्यापार घाटा FY2024–25 में 99.2 अरब डॉलर था, जो FY2025 में बढ़कर लगभग 106 अरब डॉलर हो गया। यह दर्शाता है कि यह समस्या केवल हाल की नहीं, बल्कि पिछले कई वर्षों से बढ़ रही है।
भारत ने PLI (Production-Linked Incentive) योजनाओं के माध्यम से इलेक्ट्रॉनिक्स, उन्नत रसायन, सोलर मॉड्यूल और फार्मा जैसे क्षेत्रों में घरेलू उत्पादन बढ़ाने का प्रयास किया है। लेकिन इन योजनाओं के बावजूद, इन उद्योगों को अभी भी चीन से कई इनपुट्स की आवश्यकता है। साथ ही, जून 2026 से लागू स्थानीय सामग्री अनिवार्यता ने सोलर पैनलों के लिए घरेलू सेल्स के उपयोग को अनिवार्य कर दिया है, जिससे चीन पर निर्भरता कम करने की दिशा में कदम उठाया गया है।
भारत के निर्यात का स्वरूप अभी भी मुख्यतः कच्चे माल और कम मूल्य वाले उत्पादों (जैसे लौह अयस्क, कपास, समुद्री उत्पाद, नैफ्था) तक सीमित है, जबकि चीन उच्च मूल्य वाले तैयार माल (इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी, बैटरियां) निर्यात करता है। इसके अलावा, भारतीय फार्मा, आईटी सेवाओं और कृषि उत्पादों पर चीन की ओर से गैर-शुल्क बाधाएं बनी हुई हैं, जो भारत के निर्यात को सीमित करती हैं।
भारत 'चीन+1' रणनीति अपनाकर चीन पर निर्भरता कम करने का प्रयास कर रहा है, लेकिन वास्तविकता यह है कि यह निर्भरता अभी भी बनी हुई है। हालिया विश्लेषणों से पता चलता है कि शीर्ष 5 आयात देशों में चीन की प्रभुत्वता सूचकांक में केवल 5% की गिरावट आई है। इसका अर्थ है कि भारत की आपूर्ति श्रृंखला में चीन का प्रभाव अभी भी काफी मजबूत है।
भारत और चीन व्यापार में असंतुलन एक जटिल और दीर्घकालिक समस्या है। यह केवल व्यापार का आंकड़ा नहीं, बल्कि भारत की आर्थिक संरचना, प्रतिस्पर्धात्मकता और रणनीतिक सुरक्षा से जुड़ा मुद्दा है। हालिया नीतिगत प्रयास जैसे PLI, स्थानीय सामग्री अनिवार्यता और निर्यात विविधीकरण सही दिशा में कदम हैं, लेकिन वास्तविक सुधार वर्षों में ही संभव है। यह जानना आवश्यक है कि भारत की आर्थिक रणनीति में यह समस्या कितनी गहरी है और इसे दूर करने के लिए क्या-क्या कदम उठाए जा रहे हैं।