
हर महीने अच्छी सैलरी आने के बावजूद अगर महीने के आखिर में बैंक बैलेंस लगभग खाली हो जाता है, तो समस्या कम कमाई से ज्यादा खर्च के तरीके में हो सकती है। हाल ही सामने आए एक फाइनेंशियल ऑडिट के उदाहरण में 28 वर्षीय कामकाजी महिला की 70,000 रुपये मासिक इन हैंड सैलरी थी। इसके बावजूद 6 महीने के खर्च का विश्लेषण करने पर पता चला कि बड़ी रकम ऐसे खर्चों में जा रही थी, जिनका साफ हिसाब नहीं था। अप्रैल से सितंबर 2026 के खर्च में औसत मासिक खर्च करीब 56,716 रुपये रहा।
दरअसल महिला ने चैट जीपीटी से अपनी सैलरी और खर्च का ऑडिट करवाया। इसके बाद इस एआई टूल ने 3 बड़ी गलतियां बताईं और निवेश व बचत का नया फॉर्मूला बताया।
ऑडिट में सबसे बड़ा खर्च Miscellaneous UPI (विविध या अन्य यूपीआई भुगतान) कैटेगरी में दिखाई दिया। इस मद (श्रेणी) में औसतन 7,000 रुपये महीने खर्च हो रहे थे। 6 महीने में यह रकम करीब 42,000 रुपये बैठी। इसके अलावा फूड डिलीवरी पर करीब 5,000 रुपये और बाहर खाने पर करीब 2,333 रुपये मासिक खर्च हो रहे थे। यानी केवल इन दो खाने से जुड़े खर्चों पर करीब 7,333 रुपये हर महीने जा रहे थे।
यहां सबसे अहम बात यह थी कि बचत के लिए कोई तय सिस्टम नहीं था। पहले खर्च और फिर बची हुई रकम को सेव करने की आदत के कारण हर महीने बचत कम रह जाती थी। ऐसे में सलाह दी गई कि सैलरी आने के तुरंत बाद बचत और निवेश की रकम अलग कर दी जाए। शुरुआत में 10,000 से 12,000 रुपये अलग रखने और SIP को धीरे-धीरे बढ़ाने का सुझाव दिया गया।
वित्तीय योजना में बजट की भूमिका महत्वपूर्ण है। SEBI (भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड) के निवेशक शिक्षा संसाधनों के अनुसार आय और खर्च का बजट बनाना, खर्चों को ट्रैक करना और नियमित रूप से बचत और निवेश के लिए रकम अलग रखना जरूरी है। साथ ही जरूरतों को प्राथमिकता देने और गैर जरूरी या अचानक होने वाले खर्चों को नियंत्रित करने की सलाह दी जाती है।
SEBI यह भी बताता है कि निवेश शुरू करने से पहले रोजमर्रा के खर्चों के लिए पर्याप्त आय, इमरजेंसी फंड और जरूरी बीमा सुरक्षा पर ध्यान देना चाहिए। नियमित और छोटी रकम का निवेश लंबे समय में वित्तीय लक्ष्यों को पूरा करने में मदद कर सकता है।
RBI (भारतीय रिजर्व बैंक) की वित्तीय शिक्षा सामग्री के अनुसार, इमरजेंसी फंड में कम से कम 3 महीने के जीवन यापन के खर्च जितनी रकम रखने की सलाह दी जाती है। जिन लोगों की आय कम स्थिर है, उनके लिए 6 महीने या उससे अधिक खर्च की राशि का रिजर्व रखना उपयोगी हो सकता है। इस रकम को आसानी से उपलब्ध खाते में अलग रखना चाहिए।
इसलिए 70,000 रुपये की सैलरी वाले व्यक्ति के लिए एक तय बजट बनाना ज्यादा महत्वपूर्ण है। किराया, EMI, राशन और बिल जैसे जरूरी खर्च पहले तय करें। इसके बाद इमरजेंसी फंड के लिए रकम अलग करें और फिर लक्ष्य के अनुसार SIP या दूसरे निवेश विकल्पों पर विचार करें। हर महीने खर्च की समीक्षा करने से यह भी पता चलेगा कि पैसा किन छोटी छोटी आदतों में लगातार निकल रहा है।
सबसे जरूरी बात यह है कि ChatGPT या कोई भी AI टूल आपके खर्चों को समझने और बजट बनाने में मदद कर सकता है, लेकिन निवेश का अंतिम फैसला अपनी आय, लक्ष्य, जोखिम क्षमता और वित्तीय स्थिति को समझकर ही लेना चाहिए। SEBI भी निवेश से पहले वित्तीय लक्ष्यों और जोखिम को ध्यान में रखने पर जोर देता है।
( डिस्क्लेमरः यह लेख सामान्य जानकारी पर आधारित है। किसी भी महत्वपूर्ण निर्णय से पहले विशेषज्ञ की सलाह लें।)