
भारत में शादी को परंपरागत रूप से सात जन्मों का बंधन माना जाता रहा है, लेकिन बदलते दौर में यह सोच तेजी से बदल रही है। अब तलाक सिर्फ युवा जोड़ों तक सीमित नहीं रहा है। अब 50 साल या उससे अधिक उम्र में शादी तोड़ने वाले पति-पत्नी की संख्या भी बढ़ रही है। दुनियाभर में इस ट्रेंड को "ग्रे डिवोर्स" या "सिल्वर स्प्लिटर्स" कहा जाता है। भारतीय शहरों में भी इसके संकेत साफ दिखने लगे हैं।
बेंगलुरु के डिटेक्टिव एजेंसियों और वकीलों के हवाले से सामने आए आंकड़े बताते हैं कि वैवाहिक बेवफाई से जुड़े मामले पिछले पांच सालों में करीब 3 गुने हो गए हैं। एक क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट के मुताबिक, हर महीने आने वाले ऐसे मामले करीब 60 से बढ़कर 100 तक पहुंच गए हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि रिश्ते पहले भी बनते थे, लेकिन सीमित संपर्क के कारण वे पूरी तरह विकसित नहीं हो पाते थे।
अब कॉल, टेक्स्ट और वीडियो चैट ने इन्हें बनाए रखना आसान बना दिया है। ज्यादातर मामलों में सहकर्मी या पुराने दोस्त शुरुआती जुड़ाव की वजह बनते हैं, जो सोशल मीडिया के जरिए दोबारा संपर्क में आने के बाद भावनात्मक सहारे से होते हुए धीरे-धीरे गहरे रिश्ते में बदल जाते हैं। वकीलों के मुताबिक बेवफाई से जुड़े तलाक के मामले पिछले पांच सालों में करीब 25-30 प्रतिशत बढ़े हैं।
अब एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर और तलाक के मामले सिर्फ 25-45 की उम्र तक सीमित नहीं रहे हैं। आज के दौर में लोग 50 साल की उम्र के बाद भी तलाक ले रहे हैं। विशेषज्ञ इसकी एक बड़ी वजह "एम्प्टी नेस्ट सिंड्रोम" मानते हैं। इसका मतलब है कि जब बच्चे बड़े होकर अपनी अलग जिंदगी में व्यस्त हो जाते हैं, तो पति-पत्नी को अक्सर अहसास होता है कि उनके बीच पहले जैसी नजदीकी नहीं बची।
इसके अलावा महिलाओं में बढ़ती आर्थिक स्वतंत्रता ने उन्हें असंतोषजनक रिश्ते में बने रहने की मजबूरी से मुक्त किया है, जबकि समाज अब तलाक को पहले जितना कलंक नहीं मानता। कई लोग 50 की उम्र के बाद जिंदगी की "दूसरी पारी" के तौर पर नई शुरुआत को भी एक विकल्प के रूप में देखने लगे हैं।
डिजिटल सबूतों को लेकर भारतीय अदालतों का रुख भी अब बदल रहा है। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने हाल ही में कहा कि निजता के अधिकार के बावजूद वॉट्सऐप चैट जैसे सबूत पारिवारिक अदालतों में स्वीकार किए जा सकते हैं, क्योंकि निष्पक्ष सुनवाई का अधिकार भी उतना ही अहम है।
वहीं, बॉम्बे हाई कोर्ट ने एक अलग मामले में स्पष्ट किया कि केवल वॉट्सऐप चैट के आधार पर पक्षकार को सफाई का मौका दिए बिना तलाक की डिक्री नहीं दी जा सकती। यानी डिजिटल सबूत अब पारिवारिक विवादों में अहम भूमिका निभा रहे हैं, लेकिन अदालतें इनके इस्तेमाल में सावधानी भी बरत रही हैं।
भारत की जानी-मानी मनोवैज्ञानिक डॉ. प्रेरणा कोहली के मुताबिक, शहरी भारतीय शादियों में बेवफाई के मामले बढ़ने के पीछे बढ़ते मौके, सोशल मीडिया और अरेंज्ड मैरिज में देर से बनने वाली भावनात्मक नजदीकी जैसे कारण हैं। मुंबई की मनोवैज्ञानिक प्रतिष्ठा त्रिवेदी मिर्जा के मुताबिक, बेवफाई का मामला अक्सर सिर्फ शारीरिक आकर्षण का नहीं होता, बल्कि इसकी जड़ में अधूरी भावनात्मक जरूरतें और पहचान से जुड़ी तलाश छिपी होती है। विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि सोशल मीडिया ने घर पर मौजूद भावनात्मक खालीपन को बाहर तलाशना पहले से कहीं आसान बना दिया है।
यह ट्रेंड सिर्फ भारत तक सीमित नहीं है। अमेरिका में 1990 में 50 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों में तलाक की दर महज 8.7 प्रतिशत थी, जो अब बढ़कर करीब 36 प्रतिशत हो चुकी है। जापान में भी करीब 22 प्रतिशत तलाक ग्रे डिवोर्स की श्रेणी में आते हैं, वहीं दक्षिण कोरिया में यह दर 2011 के 7 प्रतिशत से बढ़कर अब 22 प्रतिशत हो गई है।
नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (NFHS) के आंकड़े बताते हैं कि भारत में 50 वर्ष से अधिक उम्र में तलाक के मामले अब भी कुल मिलाकर 1 प्रतिशत से कम हैं। यानी यह पश्चिमी देशों जितना बड़ा ट्रेंड फिलहाल नहीं है। लेकिन दिल्ली, मुंबई और बेंगलुरु जैसे बड़े शहरों में इसकी रफ्तार तेजी से बढ़ रही है। पारिवारिक अपेक्षाएं, बच्चों की जिम्मेदारी और सामाजिक दबाव अब भी बड़ी संख्या में लोगों को तलाक से रोकते हैं, लेकिन बदलाव के संकेत साफ हैं।
शोध बताते हैं कि ग्रे डिवोर्स का असर सिर्फ पति-पत्नी तक सीमित नहीं रहता। बड़े हो चुके बच्चे भी अक्सर इमोशनल अस्थिरता और गुस्से जैसी भावनाओं से गुजरते हैं, माता-पिता में से किसी एक का अकेलापन बढ़ जाता है। साथ ही कई बार बेटियां मां की जिम्मेदारी संभालती हैं जबकि बेटे पिता से दूर हो जाते हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक, यह ट्रेंड सिर्फ तकनीक की समस्या नहीं है, बल्कि रिश्तों में संवाद की लंबे समय से चली आ रही कमी का नतीजा है।