
US China robot dogs war: आज दुनिया में रोबोट डॉग्स यानी चार-पैर वाले रोबोटिक कुत्तों का युग तेजी से उभर रहा है। अमेरिका और चीन के बीच इस क्षेत्र में तकनीकी प्रतिस्पर्धा तेज होती जा रही है और इस दौड़ का असर भारत पर क्या होगा, यह समझना अब जरूरी हो गया है।
अमेरिका ने हाल ही में विदेशी, विशेषकर चीनी निर्मित ह्यूमनॉइड और क्वाड्रुपेड (रोबोट डॉग) रोबोट्स पर आयात प्रतिबंध लगा दिया है। अमेरिकी फेडरल कम्युनिकेशन्स कमीशन (FCC) ने जुलाई 2026 में यह फैसला लिया, यह कहते हुए कि ऐसे रोबोट राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा हो सकते हैं। वे डेटा एकत्र कर सकते हैं, निगरानी कर सकते हैं, या दूर से नियंत्रित किए जा सकते हैं। चीन इस क्षेत्र में वैश्विक उत्पादन का लगभग 85% हिस्सा नियंत्रित करता है।
चीन की यूनिट्री रोबोटिक्स ने हाल ही में शंघाई में अपनी स्टॉक लिस्टिंग की। इसमें उसने लगभग 6.1 अरब युआन (करीब 904 मिलियन डॉलर) जुटाए और शेयर शुरुआती दिन 629% तक उछल गए। 2025 में यूनिट्री ने लगभग 1.7 अरब युआन (करीब 250 मिलियन डॉलर) की आय दर्ज की, जिसमें 40% से अधिक आय विदेशों से थी।
चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) ने 'रोबोट वुल्फ' नामक स्वार्म रोबोट डॉग्स का प्रदर्शन किया। ये एक सैनिक द्वारा नियंत्रित समूह में काम कर सकते हैं और इनमें कुछ मॉडल्स राइफल या ग्रेनेड लांचर से लैस हैं। यह एक स्पष्ट संकेत है कि चीन इस तकनीक को सैन्य उपयोगों के लिए भी तेजी से विकसित कर रहा है।
फरवरी 2026 में इंडिया AI इम्पैक्ट समिट में नोएडा की गलगोटियास यूनिवर्सिटी विवादों में आ गई, जब उसने एक चीनी यूनिट्री Go2 रोबोट डॉग को अपनी खुद की खोज बताकर प्रदर्शित किया। यह मॉडल ऑनलाइन 1,600 रुपए में उपलब्ध है। सोशल मीडिया और अधिकारियों ने इसे तुरंत पहचान लिया और विश्वविद्यालय को अपना स्टॉल खाली करना पड़ा।
भारत में रक्षा क्षेत्र में भी रोबोटिक डॉग्स पर काम चल रहा है। भारतीय सेना ने AI-Enabled Autonomous Robot Dogs की एक टीम (हाइव) विकसित करने की चुनौती जारी की है। इसमें 6-10 स्वायत्त क्वाड्रुपेड रोबोट्स को एक साथ काम करने के लिए तैयार किया जाना है, जो टोही, सीमा सुरक्षा, पेलोड कैरी, और संचार विस्तार जैसे काम कर सकें।
चीन की औद्योगिक ताकत भी बढ़ रही है। 2025 में चीन में प्रति 10,000 श्रमिकों पर 567 रोबोट थे, जो जर्मनी (449) और फ्रांस (195) से कहीं अधिक है। 2026 की शुरुआत तक चीन में लगभग 30,000 पूरी तरह स्वचालित फैक्ट्रियां थीं।
पहला, अमेरिका द्वारा चीनी रोबोट्स पर प्रतिबंध से भारत को वैकल्पिक स्रोतों की तलाश करनी होगी। चाहे वह घरेलू विकास हो या ताइवान जैसे अन्य देशों से साझेदारी। ताइवान भी इसी क्षेत्र में सक्रिय है और 2028 तक सैन्य उपयोग के लिए बड़े पैमाने पर उत्पादन शुरू करने की योजना है।
दूसरा, चीन की सैन्य उपयोग वाली तकनीक, जैसे स्वार्म रोबोट वुल्फ, भारत के लिए सीमा पर नई चुनौतियां खड़ी कर सकती हैं। खासकर LAC (लाइन ऑफ एक्टुअल कंट्रोल) पर, जहां चीन पहले से ही क्वाड्रुपेड रोबोट्स का इस्तेमाल कर रहा है।
तीसरा, भारत को अपनी तकनीकी क्षमता बढ़ानी होगी। गलगोटियास घटना ने यह दिखाया कि दिखावा नहीं, असली विकास मायने रखता है। रक्षा विभाग की हाइव चुनौती एक सकारात्मक कदम है, लेकिन इसे तेजी से आगे बढ़ाना होगा।
चौथा, औद्योगिक स्वचालन में भारत को चीन जैसी गति पकड़ने के लिए नीति और निवेश दोनों की जरूरत है। भारत की ड्राफ्ट नेशनल स्ट्रैटेजी ऑन रोबोटिक्स में यह उल्लेख है कि रोबोटिक्स पारिस्थितिकी तंत्र को बढ़ावा देने के लिए हस्तक्षेप जरूरी हैं।
भारत के छात्रों, प्रोफेशनल्स और नीति-रुचि पाठकों के लिए यह समय है कि वे रोबोटिक्स में कौशल और समझ विकसित करें। चाहे वह इंजीनियरिंग हो, AI हो, या रक्षा तकनीक। यह क्षेत्र भविष्य में वैश्विक करियर, विदेश पढ़ाई, और सुरक्षा रणनीति में अहम भूमिका निभा सकता है।
कहना होगा कि इस नई तकनीकी दौड़ में भारत के लिए अवसर और चुनौतियां दोनों हैं। अगर हम समय रहते तैयारी करें, तो यह युग भारत को वैश्विक तकनीकी मानचित्र पर एक मजबूत खिलाड़ी बना सकता है।