
क्या आपने कभी सोचा है कि हिम्मत और साहस की पहली उड़ान भरने वाली महिलाएं कौन थीं? उनकी कहानी सिर्फ इतिहास नहीं, आपके अपने सपनों को साकार करने की प्रेरणा भी है। तो चलिए, आपको ले चलते हैं दो सदी पीछे - जहां से शुरू होती है महिलाओं की आसमानी उड़ान की असली दास्तान।
बात है 4 जून 1784 की। फ्रांस के ल्योन शहर में एक ओपेरा गायिका एलिजाबेथ थीबल गर्म हवा के गुब्बारे "ला गुस्ताव" में सवार हुईं। उनके साथ थे बैलूनिस्ट मॉन्स्यूर फ्लोरां। यह गुब्बारा किसी डोरी से बंधा नहीं था - यानी पूरी तरह खुले आसमान में उड़ान भरने वाली वे दुनिया की पहली महिला बनीं।
कहते हैं कि हवा में उड़ते हुए वे इतनी रोमांचित हो गईं कि गाना गाने लगीं। उस दिन स्वीडन के राजा गुस्ताव तृतीय खुद इस नज़ारे को देखने ल्योन आए हुए थे, और गुब्बारे का नाम भी उन्हीं के सम्मान में रखा गया था।
थीबल की उड़ान के करीब 14 साल बाद, 10 नवंबर 1798 को, फ्रांस की जीन लाब्रोस ने पेरिस के पार्क मॉन्सो से अकेले गुब्बारा उड़ाकर एक नया इतिहास रचा - वे बिना किसी सहारे के गुब्बारा उड़ाने वाली पहली महिला बनीं। उनके गुरु और बाद में पति बने आंद्रे-जाक गार्नरां थे, जिन्होंने पैराशूट का आविष्कार किया था। एक साल बाद, 12 अक्टूबर 1799 को, जीन लाब्रोस ने एक और कमाल किया उन्होंने गुब्बारे से गोंडोला अलग करके करीब 900 मीटर की ऊंचाई से पैराशूट के सहारे सुरक्षित धरती पर उतरकर पैराशूट इस्तेमाल करने वाली पहली महिला होने का गौरव भी हासिल किया।
अब बात करते हैं एक ऐसी कहानी की, जो लगभग 30 साल तक एक राज बनी रही। 27 जून 1903 को पेरिस में, महज 19 साल की अमेरिकी युवती आइडा दे अकोस्ता की मुलाकात मशहूर ब्राज़ीली एविएटर अल्बर्टो सैंटोस-ड्यूमोंट से हुई। सैंटोस-ड्यूमोंट अपने छोटे डिरिजिबल (मोटर से चलने वाला हवाई पोत) "नंबर 9" में पेरिस की सैर किया करते थे। आइडा ने उनसे उड़ान सीखने की जिद की।
सिर्फ तीन सबक के बाद, उन्होंने पेरिस से शातो दे बगातेल तक अकेले डिरिजिबल उड़ाया जबकि सैंटोस-ड्यूमोंट नीचे साइकिल पर चलते हुए रूमाल हिलाकर उन्हें दिशा बताते रहे। लैंडिंग के बाद जब आइडा ने पूछा कैसा रहा, तो सैंटोस-ड्यूमोंट ने खुशी से कहा:
"आप, मैडमोज़ेल, दुनिया की पहली महिला एरो-चालक हैं!"
यह उपलब्धि राइट बंधुओं की ऐतिहासिक उड़ान से करीब छह महीने पहले की थी। लेकिन आइडा के माता-पिता को यह बात इतनी शर्मिंदगी वाली लगी कि उन्होंने सैंटोस-ड्यूमोंट से वादा लिया कि वे कभी उनकी पहचान उजागर नहीं करेंगे। यह राज करीब तीन दशक तक छिपा रहा, जब तक 1932 में एक डिनर पार्टी में आइडा ने खुद इसे उजागर नहीं किया।
थेरेस पेल्टियर पेशे से एक फ्रांसीसी मूर्तिकार थीं, जिनकी दोस्ती मशहूर एविएटर लियोन डेलाग्रांज से थी। 8 जुलाई 1908 को इटली में डेलाग्रांज के वॉइज़िन विमान में यात्री के तौर पर सवार होकर करीब 200 मीटर उड़ीं और इस तरह वे विमान में उड़ने वाली शुरुआती महिलाओं में गिनी गईं। इसके बाद डेलाग्रांज ने उन्हें उड़ान की बारीकियां सिखाईं, और सितंबर 1908 में ट्यूरिन के मिलिट्री स्क्वायर में थेरेस ने अकेले विमान उड़ाया - करीब 200 मीटर की सीधी दूरी, जमीन से महज ढाई मीटर ऊपर।
हालांकि उन्होंने कभी औपचारिक पायलट लाइसेंस नहीं लिया और डेलाग्रांज की असामयिक मृत्यु के कारण उनकी उड़ान की यात्रा थम गई। फिर भी इतिहास उन्हें विमान उड़ाने वाली शुरुआती महिलाओं में एक अहम नाम मानता है। यह जरूर बता दें कि इतिहासकारों के बीच उनकी सोलो उड़ान को लेकर कुछ मतभेद भी है, क्योंकि उस पल की कोई आधिकारिक तस्वीर या दस्तावेज़ मौजूद नहीं है।
और फिर आती है वो तारीख, जो आज भी दुनिया भर में मनाई जाती है - 8 मार्च 1910। फ्रांस की एलिस रेयमोंद डेरोश, जिन्हें दुनिया रेयमोंद दे लारोश के नाम से जानती है, ने एयरो क्लब दे फ्रांस से 36वां पायलट लाइसेंस हासिल कर दुनिया की पहली आधिकारिक लाइसेंसधारी महिला पायलट होने का गौरव पाया। पेशे से एक अभिनेत्री रहीं रेयमोंद ने 1908 में राइट बंधुओं की एक हवाई प्रदर्शनी देखने के बाद खुद से कहा था:
"मैं भी यह कर सकती हूं। मैं उड़ूंगी।"
उन्होंने विमान निर्माता चार्ल्स वॉइज़िन को अपनी उड़ान सिखाने के लिए राजी किया, और अक्टूबर 1909 में पहली बार टैक्सी करते-करते गलती से (या शायद जान-बूझकर) विमान हवा में उठा लिया - करीब 300 गज की उड़ान। इसके कुछ ही महीनों बाद उन्होंने लाइसेंस हासिल कर लिया।
दिलचस्प बात यह है कि प्रथम विश्व युद्ध के दौरान रेयमोंद ने फ्रांसीसी सेना के लिए उड़ान भरने की पेशकश की, लेकिन सिर्फ महिला होने के कारण उन्हें मना कर दिया गया - फिर भी उन्होंने मोर्चे पर अफसरों को गाड़ी चलाकर लाने-ले-जाने का काम किया।
1913 में उन्होंने चार घंटे से ज्यादा लंबी उड़ान भरकर फेमिना कप जीता। दुर्भाग्य से, 18 जुलाई 1919 को एक टेस्ट फ्लाइट के दौरान हुए हादसे में उनकी मृत्यु हो गई।
एक और नाम जो इस फेहरिस्त में जरूरी है, वो हैं सोफी ब्लांशार्ड। उनके पति जीन-पिएर ब्लांशार्ड दुनिया के पहले पेशेवर बैलूनिस्ट थे। 27 दिसंबर 1804 को सोफी ने पहली बार अपने पति के साथ गुब्बारे में उड़ान भरी, और 1805 में अकेले गुब्बारा उड़ाकर सोलो उड़ान भरने वाली महिलाओं में शामिल हो गईं।
1804 में नेपोलियन ने उन्हें आधिकारिक उत्सवों की "एरोनॉट" नियुक्त किया। पति की मृत्यु के बाद भी सोफी ने उड़ान जारी रखी और अपने जीवनकाल में 60 से अधिक उड़ानें भरीं - रात की उड़ानें, आतिशबाजी के करतब, ऊंचाई के रिकॉर्ड, सब कुछ आजमाया। दुर्भाग्य से 6 जुलाई 1819 को पेरिस के तिवोली गार्डन में एक प्रदर्शन के दौरान उनके गुब्बारे में आग लग गई और गिरकर उनकी मौत हो गई - विमानन दुर्घटना में जान गंवाने वाली वे पहली महिला बनीं।
भारत में भी महिलाओं ने आसमान की सीमाएं तोड़ीं, और इसकी शुरुआत हुई दिल्ली में जन्मीं सरला ठकराल से। सिर्फ 21 साल की उम्र में, चार साल की बेटी की मां बन चुकीं सरला ने 1936 में पायलट लाइसेंस हासिल कर एक छोटा जिप्सी मॉथ बाइप्लेन अकेले उड़ाया और इस तरह भारत की पहली महिला पायलट बनने का गौरव पाया।
सबसे खास बात यह थी कि उन्होंने यह उड़ान पारंपरिक साड़ी पहनकर भरी थी, जो उस दौर में कॉकपिट जैसी पुरुष-प्रधान जगह के लिए बेहद असाधारण दृश्य था। उनके पति पी. डी. शर्मा, जो खुद एक पायलट थे और भारत के पहले एयरमेल पायलट लाइसेंसधारी बने और उनके ससुर जिनके परिवार में नौ पायलट थे दोनों ने उनका पूरा साथ दिया।
सरला ने लाहौर फ्लाइंग क्लब में 1000 घंटे की उड़ान पूरी कर 'A' लाइसेंस भी हासिल किया। 1939 में एक विमान हादसे में अपने पति को खोने के बाद वे कमर्शियल पायलट नहीं बन सकीं, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी - कला की दुनिया में कदम रखकर एक सफल चित्रकार और उद्यमी बनीं।
सरला का यह सफर आज भी भारत में लाखों महिलाओं को आसमान की ओर देखने की हिम्मत देता है और शायद यही वजह है कि आज भारत में महिला पायलटों का प्रतिशत दुनिया में सबसे अधिक है।
नहीं। यह उन महिलाओं के लिए प्रेरणा है, जो आज भी सीमाओं को चुनौती दे रही हैं - चाहे वह करियर हो, पढ़ाई हो या जीवन के किसी भी मोड़ पर खुद को साबित करना हो। एलिजाबेथ थीबल ने दिखाया कि पहला कदम उठाने के लिए किसी अनुभव की जरूरत नहीं होती।
जीन लाब्रोस और सोफी ब्लांशार्ड ने साबित किया कि अगर हौसला हो तो अकेले उड़ान भरना और उसे पेशा बनाना दोनों मुमकिन है।
आइडा दे अकोस्ता ने सिखाया कि तकनीकी सीमाओं को पार करने का साहस ही इतिहास रचता है।
थेरेस पेल्टियर ने बताया कि कला और विज्ञान का संगम भी नई राह खोल सकता है। और रेयमोंद दे लारोश ने साबित किया कि अगर हौसला हो, तो लाइसेंस से पहले भी सपनों की उड़ान भरी जा सकती है।
सरल ठकराल की कहानी बताती है कि कैसे एक भारतीय महिला की शुरुआत से भारत में महिला पायलटों का प्रतिशत दुनिया में सबसे अधिक तक पहुंच पाया है।
उड़ान की शुरुआत छोटी ही रही हो; पर कभी-कभी एक छोटा-सा साहस ही इतिहास बदल देता है।