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अफगानिस्तान में तालिबानी राज के 5 साल पूरे: सत्ता मजबूत, महिलाएं सबसे अलग-थलग, भारत से कैसे हैं रिश्ते?

अफगानिस्तान में तालिबान के सत्ता संभालने के पांच साल पूरे हो चुके हैं। पांच साल बाद अफगानिस्तान की तस्वीर कुछ बदली हुई है। आइए जानते हैं तालिबानी सत्ता से क्या बड़े बदलाव हुए हैं?
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Aug 30, 2026
taliban rule in afghanistan
सांकेतिक इमेज (सोर्स- chatgpt)

अफगानिस्तान में तालिबान के दोबारा सत्ता में आने को 15 अगस्त 2026 को 5 साल पूरे हो चुके हैं। अगस्त 2021 में जब अमेरिकी और नाटो सैनिकों की वापसी के बीच तालिबान लड़ाके बिना किसी बड़े प्रतिरोध के काबुल में दाखिल हुए थे, तब सवाल था कि क्या अफगानिस्तान फिर 1990 के दशक के कट्टरपंथी शासन की ओर लौटेगा? पांच साल बाद तस्वीर जटिल है, तालिबान सत्ता पर मजबूती से काबिज है और क्षेत्रीय देशों के साथ उसके संपर्क बढ़े हैं। लेकिन आर्थिक संकट गहरा है और महिलाओं व लड़कियों के अधिकारों पर लगी पाबंदियां दुनिया में बेमिसाल मानी जा रही हैं।

सुरक्षा लौटी, स्थायी शांति नहीं


तालिबान अपने शासन की सबसे बड़ी उपलब्धि सुरक्षा बहाली को बताता है और दावा करता रहा है कि अफगान जमीन का इस्तेमाल दूसरे देशों के खिलाफ नहीं होने दिया जाएगा। लेकिन देश पूरी तरह हिंसामुक्त नहीं हुआ। इस्लामिक स्टेट-खुरासान (ISKP) जैसे संगठन अब भी चुनौती बने हुए हैं। पड़ोसी पाकिस्तान के साथ रिश्तों में आई कड़वाहट ने हालात और जटिल कर दिए हैं। सीमा-पार आतंकवाद के आरोपों को लेकर दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ा है और सीमा पर सैन्य झड़पें भी सामने आई हैं।

आर्थिक हालात अब भी कमजोर


सत्ता पर पकड़ मजबूत होने के बावजूद अफगानिस्तान की अर्थव्यवस्था बेहद कमजोर बनी हुई है। अंतरराष्ट्रीय मानवीय सहायता में लगातार कटौती, बेरोजगारी और गरीबी ने आम अफगान की मुश्किलें कम नहीं होने दीं। ईरान और पाकिस्तान से लाखों अफगान शरणार्थियों की वापसी ने रोजगार, आवास, खाद्य सुरक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं पर अतिरिक्त बोझ डाल दिया है, जिसे लेकर 5वीं वर्षगांठ पर अंतरराष्ट्रीय राहत संगठनों ने फिर आगाह किया है।

तालिबान शासन में महिलाओं की हालत


तालिबान शासन की सबसे विवादित पहचान महिलाओं और लड़कियों पर लगे प्रतिबंध हैं। UN वीमेन की हाल में जारी रिपोर्ट 'फाइव ईयर्स ऑन: अफगान वीमेंस फ्यूचर्स एट अ क्रॉसरोड्स' के मुताबिक, करीब 52 प्रतिशत अफगान महिलाएं महीने में केवल एक या दो बार ही घर से बाहर निकलती हैं। इसी सर्वे में शामिल 96 प्रतिशत पुरुषों ने कहा कि वे रोज घर से बाहर जाते हैं। यह रिपोर्ट फरवरी-मार्च 2025 में हुए 2,190 लोगों के दरवाजा-दर-दरवाजा सर्वे और अप्रैल-मई 2026 में हुए 2,811 लोगों के टेलीफोन सर्वे पर आधारित है।

रिपोर्ट के मुताबिक, करीब तीन-चौथाई महिलाएं बिना किसी पुरुष अभिभावक (महरम) के बाहर निकलने में खुद को असुरक्षित महसूस करती हैं और हर 10 में से 7 महिलाओं ने अपनी मानसिक सेहत को 'खराब' या 'बहुत खराब' बताया। UN वीमेन के मुताबिक, अफगानिस्तान में महिलाओं की श्रमबल भागीदारी घटकर महज 7 प्रतिशत रह गई है, जबकि पुरुषों में यह 84 प्रतिशत है।

महिलाओं के आर्थिक बहिष्कार से 2024-2026 के बीच अफगान अर्थव्यवस्था को करीब 92 करोड़ डॉलर (जीडीपी का 5.8 प्रतिशत) के नुकसान का अनुमान है। अफगानिस्तान दुनिया का इकलौता देश है जहां लड़कियों की माध्यमिक शिक्षा और महिलाओं का विश्वविद्यालय जाना प्रतिबंधित है। यूएन वीमेन ने इसे "आधुनिक दुनिया में बेमिसाल" संकट करार दिया है।

रूस की मान्यता और बढ़ती क्षेत्रीय कूटनीति

तालिबान सरकार को औपचारिक मान्यता देने वाला रूस जुलाई 2025 में दुनिया का पहला देश बना। रूसी विदेश मंत्रालय ने तालिबान के नियुक्त राजदूत के परिचय-पत्र स्वीकार करते हुए यह घोषणा की और अफगानिस्तान को अपनी प्रतिबंधित संगठनों की सूची से भी हटा दिया। इसके अलावा चीन, ईरान और मध्य एशियाई देशों के साथ भी तालिबान का व्यावहारिक संपर्क बढ़ा है, हालांकि पश्चिमी देशों में से किसी ने अब तक औपचारिक मान्यता नहीं दी है।

भारत-तालिबान: दूरी से दूतावास तक

भारत ने 2021 में तालिबान सत्ता में आने के बाद उसे औपचारिक मान्यता नहीं दी, लेकिन अफगानिस्तान से पूरी तरह दूरी भी नहीं बनाई। सत्ता परिवर्तन से पहले भारत ने अफगानिस्तान के पुनर्निर्माण में 3 अरब डॉलर से ज्यादा का योगदान दिया था, जिसमें अफगान संसद भवन का निर्माण भी शामिल है। तालिबान के आने के बाद कुछ समय के लिए रिश्तों में ठहराव आया, लेकिन जून 2022 में काबुल में भारतीय तकनीकी मिशन को दोबारा शुरू किया गया और भारत ने गेहूं, दवाएं, टीके जैसी मानवीय सहायता भेजना जारी रखा।

रिश्तों में सबसे बड़ा मोड़ अक्टूबर 2025 में आया, जब तालिबान के कार्यवाहक विदेश मंत्री आमिर खान मुत्ताकी आठ दिन की यात्रा पर दिल्ली पहुंचे। साल 2021 के बाद तालिबान के किसी वरिष्ठ नेता का यह पहला उच्चस्तरीय भारत दौरा था। विदेश मंत्री एस. जयशंकर के साथ हुई बैठक में भारत ने काबुल स्थित अपने तकनीकी मिशन को पूर्ण दूतावास का दर्जा देने की घोषणा की।

हालांकि इसका मतलब तालिबान सरकार को औपचारिक राजनयिक मान्यता देना नहीं है। भारत ने इस दौरान भी अफगानिस्तान की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता के सम्मान की बात दोहराई। भारत के लिए अफगानिस्तान से जुड़ाव सिर्फ कूटनीतिक नहीं है। आतंकवादी संगठनों की मौजूदगी, पाकिस्तान की भूमिका, क्षेत्रीय सुरक्षा और मध्य एशिया तक पहुंच जैसे मुद्दे भारत की रणनीति को सीधे प्रभावित करते हैं।

Updated on:
30 Aug 2026 09:51 pm
Published on:
30 Aug 2026 09:51 pm