रतलाम। जीवन देने वाले व अनेक कष्ट से मुक्ति दिलाने वाले महामृत्युंजय मंत्र के बारे में तो करीब सभी जानते हैं, लेकिन इसका हिंदी में मतलब क्या हैं, क्यो इसके जप से संसार के सभी कष्ट से मुक्ति मिलती हैं। इस बारे में कम को पता हैं। पेटलावद के ज्योतिषी आंनद त्रिवेदी बता रहे हैं कि शिवपुराण में उल्लेख किए गए इस मंत्र के जप से ादि शंकराचार्य को भी जीवन की प्राप्ती हुई थी।
महामृत्युंजय मंत्र का अर्थ।
महामृत्युंजय मंत्र के 33 अक्षर हैं। जो महर्षि वशिष्ठ के अनुसार 33 करोड़ देवताओं के प्रतिक हैं। उन तैंतीस देवताओं में 8 वस,ु 11 रुद्र और 12 आदित्य, 1 प्रजापति तथा 1 षटकार हैं। इन तैंतीस कोटि देवताओं की सम्पूर्ण शक्तियाँ महामृत्युंजय मंत्र से निहीत होती है
ॐ त्रयंमकम यजामहे, सुंगधीपुष्टीवर्धनम
उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात।
महामृत्युंजय मंत्र-संस्कृत में महामृत्युंजय उस व्यक्ति को कहते हैं जो मृत्यु को जीतने वाला हो। ऋग्वेद से लेकर यजुर्वेद में भी इस मंत्र का उल्लेख मिलता हैं। इसके अलावा शिवमहापुराण में इस मंत्र व इसके आशय को विस्तार से बताया गया हैं। रतलाम के अनेक शिवमंदिरों में इस मंत्र का जप निरंतर चलता रहता हैं।
महा मृत्युंजय मंत्र का अक्षरश: अर्थ
त्रयंबकम- त्रि.नेत्रों वाला ;कर्मकारक।
यजामहे- हम पूजते हैं, सम्मान करते हैं। हमारे श्रद्देय।
सुगंधिम- मीठी महक वाला, सुगंधित।
पुष्टि- एक सुपोषित स्थिति, फलने वाला व्यक्ति। जीवन की परिपूर्णता
वर्धनम- वह जो पोषण करता है, शक्ति देता है।
बंधनात्र- वास्तव में समाप्ति से अधिक लंबी है।
मुक्षिया, हमें स्वतंत्र करें, मुक्ति दें।
हम त्रि-नेत्रीय वास्तविकता का चिंतन करते हैं। जो जीवन की मधुर परिपूर्णता को पोषित करता है और वृद्धि करता है। ककड़ी की तरह हम इसके तने से अलग हम जीवन व मृत्यु के बंधन से मुक्त हो।
ॐ हौं जूं स: ॐ भूर्भुव: स्व: ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात् ॐ स्व: भुव: भू: ॐ स: जूं हौं ॐ !!