
Ujjain News : शरद ऋतु के आगमन के साथ मध्य प्रदेश की धर्मनगरी उज्जैन के विश्व प्रसिद्ध महाकालेश्वर मंदिर में महाकाल की दिनचर्या में बदलाव होने जा रहा है। कार्तिक माह की शुरुआत और सर्दी के मौसम को देखते हुए 27 अक्टूबर से बाबा महाकाल की तीन प्रमुख आरतियों के समय में आंशिक बदलाव हो रहा है। नई व्यवस्था फाल्गुन पूर्णिमा यानी होली तक प्रभावी रहेगी। भस्म आरती और शयन आरती के समय में कोई बदलाव नहीं किया गया है।
इस संबंध में पुजारी आशीष गुरु ने बताया कि, भगवान महाकाल की आरतियों के समय में हर साल ऋतु के अनुसार बदलाव होता है। ग्रीष्म ऋतु में भगवान को शीतलता प्रदान करने के लिए 11 पवित्र नदियों के जल की अलग-अलग मटकियां बांधी जाती हैं, जिन्हें गलंतिका कहा जाता है। इसी तरह शीत ऋतु के आरंभ से ही बाबा की आरतियों के समय में परिवर्तन किया जाता है। अधिक सर्दी के दौरान भगवान को गर्म जल से स्नान कराने की परंपरा का निर्वहन भी किया जाता है।
27 अक्टूबर से दद्योदक आरती और भोग आरती अपने तय समय से 30 मिनट देरी से की जाएगी। वहीं, संध्या आरती अपने तय समय से आधा घंटा पहले होगी। भस्म आरती और शयन आरती के समय पूर्ववत रहेंगे। ऋतु परिवर्तन के साथ भगवान महाकाल की पूजा-अर्चना और दिनचर्या में होने वाले इन बदलावों का पालन परंपरानुसार किया जाएगा।
मंदिर में 25 अक्टूबर को शरद पूर्णिमा का पर्व उल्लास के साथ मनाया जाएगा। इस मौके पर संध्या आरती में भगवान महाकाल को विशेष रूप से केसरिया मीठे दूध का भोग अर्पित किया जाएगा। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, शरद पूर्णिमा से ही शीत ऋतु का विधिवत आगमन माना जाता है। इस दिन चंद्रमा की विशेष आराधना और खीर का भोग लगाने की परंपरा भी प्रचलित है।
रूप चौदस यानी नरक चतुर्दशी पर तड़के होने वाली भस्म आरती से भगवान महाकाल को गर्म जल से स्नान कराने की परंपरा प्रारंभ होगी। इस दिन पुजारी परिवार की महिलाएं भगवान को गर्म जल से स्नान कराने के बाद सुगंधित उबटन लगाएंगी। इसके पश्चात बाबा महाकाल का विशेष अलौकिक श्रृंगार किया जाएगा। गर्म जल से स्नान कराने की यह परंपरा होली तक निरंतर जारी रहेगी। ऋतु के अनुरूप भगवान की पूजा-अर्चना में होने वाले ये बदलाव महाकाल मंदिर की प्राचीन परंपराओं और धार्मिक मान्यताओं का हिस्सा हैं।