आखिरकार पारंपरिक शैली 'कंटीन्यूअस राफ्टस्टोन' से ही बनेगी राम मंदिर की नींव

-देश के आठ दिग्गजों ने सुझाए थे दो सुझाव
-कंटीन्यूअस राफ्टस्टोन' से नींव बनाने को हरी झंडी
-कार्यदाई संस्था एलएण्डटी को सौंपी जिम्मेदारी

By: Mahendra Pratap

Published: 30 Dec 2020, 06:26 PM IST

अयोध्या. स्कंद पुराण के अयोध्या महात्म्य के वैष्णवकांड के 18-19वें श्लोक लिखा है कि वशिष्ठ आश्रम से उत्तर, लोमश आश्रम के पश्चिम में, विघ्नेश्वर से पूर्व में वो भूमि है जहां राम का जन्म हुआ था। वह महल सरयू के किनारे स्थित था। हजारों साल पहले इस महल का निर्माण किया गया था। आखिरकार राम मंदिर नींव बनाने पर चल रही चर्चाओं को विराम मिल गया। रामजन्मभूमि पर प्रस्तावित मंदिर की नींव अब 1200 भूमिगत खंभों पर नहीं बनेगी। अब रामलला मंदिर की नींव की डिजाइन पर सबकी सहमति बन गई है। मंदिर निर्माण समिति व श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के पदाधिकारियों ने अपनी मुहर लगा दी है। विशेषज्ञों की कमेटी से मिले दो सुझावों में से एक 'कंटीन्यूअस राफ्टस्टोन' से राम मंदिर की नींव बनाने को हरी झंडी दिखा दी गई। कार्यदाई संस्था एलएण्डटी नींव बनाने की जिम्मेदारी सौंप दी गई है।

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पुरानी तकनीक पर बने बड़े किले :- बताया जाता है कि वाइब्रोस्टोन कॉलम, कंटीन्यूअस राफ्ट स्टोन को आधार बनाकर मध्यकाल के अनेक किलों और प्राचीन मंदिरों की नींव बनाई गई है। आज भी बड़े-बड़े बांधों की नींव इसी तकनीक से बनायी जाती है।

'कंटीन्यूअस राफ्ट स्टोन' के आधार पर बनेगी नींव :- रामजन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के कोषाध्यक्ष स्वामी गोविददेव गिरि ने बताया कि आईआईटी, दिल्ली के पूर्व निदेशक प्रो. वीएस राजू की अध्यक्षता में गठित विशेषज्ञों की कमेटी की ओर से दो सुझाव दिए गये थे। इनमें पहला पत्थरों की पाइल्स बनाने का सुझाव था। इस सुझाव को खारिज कर दिया गया है। दूसरे सुझाव 'कंटीन्यूअस राफ्ट स्टोन' पर सबकी सहमति बनी है। पहले सुझाव को तकनीकी भाषा में 'वाइब्रोस्टोन कॉलम' कहा जाता है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह दोनों विकल्प पारंपरिक निर्माण शैली से जुड़े हैं। आधुनिक तकनीक का प्रयोग कर इसे और प्रभावी बनाया जा सकता है।

एलएण्डटी व टीईसी को सौंपी जिम्मेदारी :- महंत गोविददेव गिरि ने बताया कि दूसरे विकल्प में पहले नींव की खुदाई कराई जाए। फिर निचली सतह में मिट्टी का ट्रीटमेंट कर उस पर पत्थरों को बिछाकर एक-एक लेयर को दबाकर ऊपर तक आधार तैयार किया जाए। फिर मुख्य मंदिर का निर्माण होगा। पत्थरों का आधार तैयार करने में सीमेंट व लोहे का प्रयोग किसी दशा में नहीं किया जाएगा। कार्यदाई संस्था एलएण्डटी व टीईसी को बता दिया गया है। अब वह उसके अनुसार नई डिजाइन बनाकर काम को गति प्रदान करें।

वाइब्रोस्टोन कॉलम को नकारा :- इस तकनीक के तहत पत्थरों के कॉलम ऊपर लाए जाते हैं। इस तकनीक में जमीन की गहराई से पत्थरों के कॉलम खास पैटर्न में सतह तक लाये जाते हैं। जमीन को ऐसी ताकत दी जाती है, जिससे सतह मजबूती के साथ भूकंप और भूजल से भी सुरक्षित रहती है। इसके ऊपर राफ्ट तैयार की जाती है।

कंटीन्यूअस राफ्ट स्टोन पर हुई सहमति :- राफ्ट स्टोन तकनीक में नींव में पत्थर, चूना, बालू की सतह बिछाते हैं। इस तकनीक में निश्चित गहराई तक खुदाई होती है। फिर पत्थर, बालू और चूने की परत बिछायी जाती है। प्रत्येक स्तर को निश्चित तरीके से दबाव डालकर स्थिरता और मजबूती दी जाती है। इसके बाद प्लेटफार्म तैयार कर अपेक्षित निर्माण किया जाता है।

57 हजार वर्ग फिट में होगा मुख्य मंदिर का निर्माण :- अब मुख्य मंदिर का निर्माण 57 हजार वर्ग फिट में किया जाएगा। मंदिर की नींव की खुदाई पूरे क्षेत्रफल में की जाएगी। इसके अलावा मुख्य स्थल पर 50 फिट गहराई तक मलबा पटा है। पहले मलबे को हटाया जाएगा। फिर बालू के सतह की सफाई कर चिकनी मिट्टी की सतह को स्टेबलाइज करने के उपाय किए जाएंगे और फिर पूरी सतह पर पत्थरों को बिछाने का काम होगा। जिससे बड़े-बड़े झटकों में आधार पर कोई असर न पड़े।

इन आठ को मिली मिली थी जिम्मेदारी :- मंदिर की नींव की डिजाइन फाइनल करने वाली विशेषज्ञ समिति के अध्यक्ष आइआइटी-दिल्ली के पूर्व निदेशक वीएस राजू हैं। समिति के संयोजक सीबीआरआई- रुड़की के निदेशक प्रो. एन गोपालकृष्णन हैं। समिति के सदस्यों में प्रो. एसआर गांधी, प्रो. टीजी सीताराम, प्रो. बी भट्टाचार्जी, एपी मुल, प्रो. मनु संथानम और प्रो. प्रदीपता बनर्जी शामिल हैं।

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