आजमगढ़ मंडल में जनता कर्फ्यू का दिखा व्यापक असर, शहर-गांव में पसरा सन्नाटा

रोडवेज व निजी बसों में जरूर देखे गए यात्री
मुंबई से आने वालों की संख्या रही सर्वाधिक
प्रशासन की लापरवाही भी आई सामने
नहीं थी जांच की कोई व्यवस्था

By: Mahendra Pratap

Published: 22 Mar 2020, 07:05 PM IST

आजमगढ़. कोरोना वायरस की महामारी को रोकने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा की गई जनता कफ्यू की अपील रंग लाई। रविवार को आजमगढ़ मंडल के तीनों जिलों आजमगढ़, मऊ, बलिया में शहर से गांव तक वीरान नजर आया। चारों तरफ सन्नाटा ही सन्नाटा। बस कुछ सुनाई दे रहा था तो पुलिस वहनों के सायरन तथा रोड पर दौड़ती एक्का-दुक्का बसों से उतरने वाले यात्री। आम आदमी ने पीएम मोदी की अपील पर खुल कर अमल किया लेकिन कहीं न कहीं प्रशासन की कमजोरी भी सामने आयी। आजमगढ़ में बसों से उतरने वाले ज्यादातर यात्री दिल्ली या मुंबई के थे जहां कोरोना का सर्वाधिक कहर है लेकिन उनकी जांच का कोई इंतजाम नहीं था। अलबत्ता पुलिस वाले उन्हें एक जगह खड़ा होने से रोकते नजर आये। वैसे जब प्रशासन को जानकारी हुई कि 16-17 मार्च को मुंबई से आने वाली गोदान जिसने एक कोरोना पीड़ित था उससे मऊ के अलावा आजमगढ़ के भी दस यात्री उतरे थे तो अधिकारी सतर्क हो गए और सभी स्टेशनों पर जांच की व्यवस्था कर दी गयी। यहीं नहीं शाम के पांच बजते ही घरों में शंख, ताली और थाली बजाने की आवाज भी गूंजती नजर आई।

चर्चा यह भी रही कि बड़ी से बड़ी वारदात के बाद लगे कर्फ्यू में भी इतना सन्नाटा नही दिखा था और ना ही आजादी के बाद किसी एक व्यक्ति की अपील पर पूरा देश एक साथ इस तरह पहले खड़ा हुआ था। शहर रहा हो या गांव लोग घरों में दुबके रहे और टेलीविजन पर देश विदेश की हालत को देखते रहे। शहर में एक दो स्थानों पर निर्माण कार्य जरूर होता देखा गया लेकिन पुलिस ने उसे बंद करवा दिया। गांवों में घर के बाहर दीपक जलाने का सिलसिला भी लगातार जारी रहा। मंडल के तीनों जिलों के अधिकारी पूरे दिन सड़कों पर नजर आये।

बाहर से रोडवेज पहुंच रहे लोगों में इस बात की नाराजगी जरूर थी कि वहां कोई व्यवस्था नहीं थी कि जिससे वे जान सके कि वे पूरी तरह स्वस्थ्य है या नहीं। यहीं नहीं उन्हें घर जाने के लिए सवारी न मिलने पर लंबा सफर पैदल भी तय करना पड़ा। खास बात यह रही कि समाज का हर तबका सरकार के फैसले के साथ दिखा। इसलिए प्रशासन का काम भी आसान हो गया। मंदिरों में ताले लटके रहे। पुजारी भी मंदिर पर नहीं दिखे। शाम होते ही तीनों जिलों में लोगों ने ताली, थाली और शंख बजाकर कोरोना को दूर भगाने का प्रयास किया।

सुबह-सवेरे दैनिक वस्तुओं जैसे अखबार व दूध आदि की खरीदारी करने के लिए लोग निकले जरूर लेकिन सामान की उपलब्धता के बाद तत्काल अपने घरों के लिए वापस चल पड़े। नगर क्षेत्र में दवा की कुछ एक दुकानें खुली जरूर थी लेकिन वहां ग्राहक नजर नहीं आए। मुहम्मद ताहा, शरफराज अहमद, अनिल सिंह, विजय जायसवाल, सर्वेष जायसवाल आदि का कहना था कि सरकार ने लाक डाउन का फैसला समाज के हित को देखते हुए लिया है। शायद इस बीमारी को रोकने का इससे अलावा कोई और रास्ता नहीं है। इसलिए हर कोई सरकार के साथ खड़ा है। खुद गांव के लोग खुद को सुरक्षित रखने के लिए उपाय कर रहे है। हिंदू समाज जहां दिन ढलते ही घरों के सामने मां काली के नाम तीन दीपक जला रहा है तो मुस्लिम समाज नमाज के दौरान दुआख्वानी कर रहा है।

पांच बजते ही हर तरफ गूंजने लगी शंख, थाली और ताली :- जनता कर्फ्यू और शाम पांच बजे थाली और ताली बजाने की अपील का जिले में व्यापक असर दिखा। रविवार को जिले में शहर से गांव तक वीरान नजर आया। चारों तरफ सन्नाटा ही सन्नाटा। शाम पांच बजा तो हलचल सी मच गई, हर घर से थाली ताली और शंख की आवाजें आने लगी।

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