सपा-बसपा गठबंधन में आजमगढ़ मंडल की ये सीटें जाएंगी बसपा के खाते में

बुआ भतीजे के मिलन से मुश्किल हो जाएगी भाजपा की राह, पिछला प्रदर्शन दोहराना होगा

 

 

 

 

By: ज्योति मिनी

Published: 11 Apr 2018, 05:41 PM IST

रणविजय सिंह

आजमगढ़. वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव मोदी लहर के चलते पूर्वांचल में लगभग अस्तित्व खो चुकी सपा-बसपा को विधानसभा में करारी हार के बाद पुराने गिले शिकवे भूल एक मंच पर आने के लिए मजबूर कर दिया है। उपचुनाव में मिली सफलता के बाद वर्ष 2019 में सपा और बसपा का गठबंधन तय माना जा रहा है, लेकिन गठबंधन से सपा को मुलायम के गढ़ कहे जाने वाले आजमगढ़ में एक सीट बसपा को देनी होगी। बसपा ने यहां पहले प्रत्याशी उतारकर सपा पर दबाव भी बनाना शुरू कर दिया है। वहीं अंदरखाने से आ रही चर्चाओं पर यकीन करें तो सपा आजमगढ़ सीट से भाजपा के बाहुबली रमाकांत यादव को यहां से लड़ाना चाहती है। अगर ऐसा होता है तो सबसे अधिक नुकसान में भाजपा दिख रही है।

2014 का ऐसा था समीकरण

वर्ष 2014 के चुनाव की बात करें तो उस समय यूपी में सपा की सरकार थी और आजमगढ़ में दो कैबिनेट, एक राज्य और आधा दर्जन दर्जा प्राप्त मंत्री थे। मुलायम सिंह यादव यहां से चुनाव लड़े तो भाजपा ने उनके खिलाफ रमाकांत यादव और बसपा ने शाहआलम को मैदान में उतारा। उस चुनाव में मुलायम का पूरा कुनबा प्रचार के लिए आजमगढ़ में उतरा था तो मंत्रियों की फौज भी उतार दी गई थी। इसके बाद भी 58.4 प्रतिशत पोल मतों में मुलायम सिंह मात्र 340306 मत ही हासिल कर सके थे। यानि उन्हें मात्र 35.44 प्रतिशत मत मिला था। जबकि बीजेपी के रमाकांत यादव ने 277102 यानि 28.86 प्रतिशत मत हासिल किया था। बसपा को 27.76 प्रतिशत यानी 266528 मत मिले थे। मुलायम सिंह ने बीजेपी के रमाकांत यादव को मत्र 63204 मतों से पराजित किया था। बसपा को मिले मतों से साफ है कि, उस समय जब सपा सत्ता में थी तब भी उसे मस्लिम मतदाताओं को खुलकर समर्थन नहीं मिला था।

लालगंज में सीधे तौर पर मोदी लहर दिखी थी। आजादी के बाद पहली बार भाजपा की नीलम सोनकर 324016 मत हासिल कर विजयी रहीं थीं। दूसरे स्थान पर रहे सपा के बेचई सरोज को 260930 मत मिले थे। 233971 मत हासिल कर बसपा के बलिराम यादव तीसरे स्थान पर थे। वहीं कांग्रेस के बलिहारी बाबू को 21832 और प्रदीप को 14368 मत मिले थे। यदि देखा जाय तो मुलायम और नीलम ने करीब बराबर मतों से जीत हासिल की थी। उस समय मुलायम ने कहा था कि, यदि उनका परिवार न होता तो चुनाव हार जाता। तभी से माना जा रहा था कि, दोबारा मुलायम यहां से चुनाव नहीं लड़ेंगे। हुआ भी ऐसा विधानसभा चुनाव 2017 में सपा को मिली करारी हार के बाद मुलायम ने साफ कर दिया कि, वे यहां से चुनाव नहीं लड़ेंगे। हाल में अखिलेश ने भी यह साफ कर दिया कि, वे यहां से चुनाव नहीं लड़ेंगे। सपा को यह बात अच्छी तरह से पता है कि, वह अकेले दम पर मोदी का मुकाबला करने में अक्षम है और आजमगढ़ में उसके पास ऐसा कोई नेता नहीं है जो रमाकांत यादव को हरा सके। दूसरी तरफ बसपा का यहां अस्तित्व ही खतरे में पड़ गया है। ऐसे में सपा और बसपा के सामने गठबंधन के अलावा कोई चारा नहीं है और उनके स्थानीय नेता भी इसके लिए तैयार हैं।

अब तक जो बाते सामने आ रही है, सपा आजमगढ़ में बसपा को एक भी सीट नहीं देना चाहती थी। कारण कि, पिछले चुनाव में आजमगढ़ सीट पर उसकी जीत हुई थी और लालगंज सीट पर वह रनर थी लेकिन गठबंधन की चर्चा के बीच मायावती ने लालगंज सीट से पूर्व मंत्री घूरा राम को मैदान में उतार दिया है। बसपा की तरफ से यह सपा को सीधा संदेश दे दिया है कि, वह दोनों सीट छोड़ने के लिए तैयार नहीं है। अब सपा भी मामने लगी है कि, दोनों दलों के खाते में एक एक सीट जाएगी। लालगंज सीट पर बसपा और आजमगढ़ सीट से सपा चुनाव लड़ेगी। यही वजह है कि, सपा का अभी से पूरा फोकस आजमगढ़ सीट पर है।

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