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खुद के अब खाने के लाले….जो स्कूल-आंगनबाड़ी को पाले

- लाखों महिलाओं को मिल रहा कम मानदेय- चतुर्थ श्रेणी बनाकर नियमित करने की उठाई मांग- पचास साल में मानदेय 8000 तक भी नहीं पहुंचा
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बाड़मेर

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Ratan Dave

•

Updated: 24 Nov 2021, 12:28 PM IST

खुद के अब खाने के लाले....जो स्कूल-आंगनबाड़ी को पाले

खुद के अब खाने के लाले....जो स्कूल-आंगनबाड़ी को पाले

खुद के अब खाने के लाले....जो स्कूल-आंगनबाड़ी को पाले
- लाखों महिलाओं को मिल रहा कम मानदेय
- चतुर्थ श्रेणी बनाकर नियमित करने की उठाई मांग
- पचास साल में मानदेय 8000 तक भी नहीं पहुंचा
फोटो समेत
बाड़मेर पत्रिका.
कहते है रोटी बनाने वाला कभी भूखा नहीं रहता लेकिन राज्य में रोटियां बनाने वालों को इसके लाले पड़ रहे है। बढ़ी महंगाई ने तो इनकी थाली में अब तक आ रही मुश्किल से चार रोटी को भी दो पर ला दिया है। सालों से मानदेय बढ़ोतरी और उचित मानदेय के लिए संघर्ष कर रहे इन लाखों संविदाकर्मियों में अधिकांश महिलाएं है।
राज्य में आंगनबाड़ी कार्यकर्ता, आशा सहयोगिनी, सहायिका की नियुक्ति महिला एवं बाल विकास विभाग के माध्यम से है। गर्भवती और धात्री महिलाओं के साथ ही कुपोषित बच्चों का आंगनबाड़ी में जोड़कर इनको पोषाहार के रूप में पौष्टिक आहार देना इनका मुख्य जिम्मा है ताकि जच्चा और बच्चा सुरक्षित रहे। करीब पांच दशक से इस परियोजना से जुड़ी इन महिलाओं में कार्यकर्ता का मानदेय अब तक 7800रुपए ही पहुंचा है और सहायिका 4250 रुपए मासिक ही प्राप्त कर रही है। इतने कम मानदेय में इनके लिए महंगाई के इस दौर में गुजारा करना मुश्किल है।
सैकड़ों बच्चों का जीमण करने वाली खुद भूखी
प्रदेश में पोषाहार का इंतजाम स्कूलों में करते ही कुक कम हैल्पर की नियुक्ति हुई। करीब दो दशक से विद्यालय में पचास से अधिक बच्चों को प्रतिदिन खाना बनाकर खिलाने वाली इन जरूरतमंद महिलाओं को प्रतिदिन मुश्किल से 50 रुपए भी नहीं मिल पा रहे है। महंगाई के इस दौर में एक व्यक्ति भी पचास रुपए में गुजारा नहीं कर पाए, ये महिलाएं तो पूरे परिवार की जिम्मेदार है।
रसोइयों का घर का रसोड़ा राम चलाए
सामाजिक अधिकारिता एवं न्याय विभाग के तहत संचालित छात्रावास में रसोइयों को प्रतिदिन 249 रुपए दिए जा रहे है। इसमें भी अवकाश और अन्य दिन काट लिए जाते है। ऐसे में इनके लिए इतने कम दाम में भूखे रहने की नौबत है। अंशकालिक रसोइयों का मानदेय भी बढ़ाने को लेकर ध्यान नहीं दिया जा रहा है।
फेक्ट फाइल
नियुक्ति पद मासिक मानदेय
आंगनबाड़ी कार्यकर्ता 7800
सहायिका 4250
समाज कल्याण रसोइया 249 रुपए प्रतिदिन
कुक कम हैल्पर 50 रुपए औसत प्रतिदिन
चतुर्थ श्रेणी बना दे
कुशल और अकुशल कारीगर की मजदूरी तय है,इसकी भी पालना नहीं हो रही है। प्रतिदिन पचास से सौ बच्चों के लिए खाना या पोषाहार बनाने का कार्य कोई कम नहीं है। इसके अलावा यही महिलाएं स्कूल में साफ सफाई, बर्तन साफ करने से लेकर छोटे-बड़े कार्य में हाथ बंटाती है। इनको चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी बना लेना चाहिए और इसी पेग्रेड पर इनको यह काम करवाया जाए। जिससे स्कूल में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी भी मिल जाएंगे और सरकार महिलाओं को रोजगार भी दे देगी।- लक्ष्मण बडेरा, अध्यक्ष कमठा मजदूर युनियन
स्थाई किया जाए
पचास साल से जो महिलाएं आंगनबाड़ी से जुड़ी है,उसमें से कई सेवानिवृत्त हो गई और बीस-तीस साल से जुड़ी भी अब करीब है। पूरी उम्र काम करने वाली इन महिलाओं का मानदेय इतना कम है, जो ठीक नहीं है। इनको चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी मान लेना चाहिए और कार्यकर्ता को तृतीय श्रेणी बनाकर शिक्षिका के तौर पर प्रशिक्षित कर प्री स्कूल एज्युकेशन आंगनबाड़ी में प्रारंभ करें।- नूतनपुरी गोस्वामी, अध्यक्ष टीम नूतन शिक्षक संगठन
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