धर्मकांटे की जमीन पर कब्जे का प्रयास, मामला दर्ज

-गोवर्धन गेट स्थित भूखंड का मामला

भरतपुर. शहर के गोवर्धन गेट क्षेत्र में जमीन को लेकर एक बार फिर विवाद खड़ा हो गया है। पिछले तीन दिन से इस जमीन पर कब्जे की शिकायत हो रही थी, लेकिन संबंधित विभाग व पुलिस अधिकारी इस मामले को लेकर चुप्पी साधे हुए थे। जब मामला पुलिस के उच्च अधिकारियों के पास पहुंचा तो आनन-फानन में जाकर काम रुकवाया गया। मामला गोवर्धन गेट बाहर खाई पर कब्जे से जुड़ा हुआ है। जानकारी के अनुसार मोहन चतुर्वेदी ने दर्ज कराई रिपोर्ट में बताया है कि उसका धर्मकांटा पिछले 55-60 वर्षों से गोवर्धन गेट पर स्थित है। इसको 14 फरवरी व 15 फरवरी की रात्रि को कुलदीप पुत्र कुंवरजीत व कुंवरजीत पुत्र बलराम जाट निवासी जघीना, जीतू जघीना, विजयपाल, राना व पांच-छह अन्य लोगों ने रात को हथियारों से लैस होकर आए और चारों ओर से चारदीवारी, दो कमरे, शौचालय, धर्मकांटा व वहां लगी हुई मशीन कांटे की प्लेटफॉर्म की लोहे की प्लेटों को तोड़ कर वहां पर रखे हुए एक लाख 25 हजार रुपए ले गए। जेसीबी से उसके मलबे को रात में ही नष्ट कर दिया। इससे करीब 25-30 लाख रुपए का नुकसान हो गया। बिल्डिंग के मलबे को भी भर ले गए। उक्त व्यक्ति बहुत ही अपराधी किस्म के हैं और आदतन अपराधी हैं। इनके खिलाफ हत्या व लूटपाट के कई मामले दर्ज हैं। बीती रात्रि जब भतीजा वहां धर्मकांटा देखने गया था तभी पांच-छह लोग हथियारों से लैस होकर वहां पर खड़े थे और वहां जेसीबी मशीन से उसको तुड़वा रहे थे। वहां से भतीजा डरकर भाग आया था।

पहले भी उठ चुका है मामला

अब्दुल रहमान बनाम राज्य सरकार की याचिका में हाइकोर्ट के सख्त आदेश हैं कि पूरे प्रदेश में तमाम जलाशयों, प्राकृतिक संसाधनों, बहाव क्षेत्र, नदी-नालों, झील-तालाबों के पेटे से अतिक्रमण हटाकर उनकी वर्ष 1947 में रही स्थिति को बहाल किया जाए, लेकिन शहर में नगर निगम, नगर सुधार न्यास व पुलिस की मिलीभगत के कारण गोवर्धन गेट पर ऐतिहासिक नाले का गला ही घोंट दिया गया है। हालांकि हाइकोर्ट के आदेश की पालना प्रशासन राजस्व नक्शों के आधार पर कर सकता है, लेकिन ऐसा नहीं करते हुए अतिक्रमणकारियों को ही छूट दी जा रही है। गोवर्धन गेट क्षेत्र से गुजर रहे ऐतिहासिक नाले पर लोगों की लंबे समय से नजर पड़ी हुई है। वर्ष 2015 से ही इस मामले को लेकर विवाद चल रहा है। इसकी शिकायत भी बार-बार नगर निगम आयुक्त से की जाती रही है, लेकिन नगर निगम व यूआईटी हमेशा ही एक-दूसरे की जमीन बताकर पल्ला झाड़ते रहे हैं।

Meghshyam Parashar Bureau Incharge
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