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काश! कह पाते तो जी ली होती जिंदगी

- खामोशी ही बन गई उनके दर्द की दवा
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काश! कह पाते तो जी ली होती जिंदगी

काश! कह पाते तो जी ली होती जिंदगी

भरतपुर . लबों पर लंबे समय से खामोशी शायद उनकी तकदीर बन गई थी। खाना मिलता तो प्लेट लेकर खड़े हो जाते। दवा देते तो हाथ आगे बढ़ा देते। कोई झिड़क देता तो ठिठक जाते और दुलारता तो चेहरे की मुस्कान इसे बयां कर देती। दर्द होता तो वह सह लेते। वजह, दर्द की दवा मांगने को उनके पास जुबां तो थी, लेकिन समझाने को शब्द नहीं थे। यह दास्तां है तमिलनाडू से भरतपुर के अपना घर आश्रम में पहुंचे प्रभुजन की।
अपनों से बिछड़कर ऐसे प्रभुजन केन्द्र सरकार की ओर से संचालित इंडियन मेंटल हैल्थ इंस्टीट्यूट चेन्नई में भर्ती हुए। वर्ष 1984 में दाखिल होने वाले ऐसे प्रभुजन की उस समय की भाषा हिन्दी थी, लेकिन इंस्टीट्यूट में तमिल जुबान वाले ज्यादा थे। ऐसे हिन्दी भाषी प्रभुजनों ने शुरुआत में तो अपनी बात समझाने को खासे जतन किए, लेकिन अन्य कोई हिन्दी भाषी नहीं होने के कारण यह विफल रहे। अंतत: इन्होंने खामोशी को ही अपनी भाषा चुन लिया। लंबे समय तक कानों में गूंजी तमिल भाषा इनके पल्ले नहीं पड़ पाई, जबकि हिन्दी को धीरे-धीरे यह बिसराते चले गए। अब ज्यादातर ऐसे हैं जो न तो तमिल सीख पाए और न हिन्दी को जिंदा रख पाए। ऐसे में चुप्पी ही इनकी नई भाषा बन गई। हाल ही में अपना घर आश्रम को संस्था ने ऐसे प्रभुजी सौंपे हैं। तमिलनाडू से ऐसे 127 प्रभुजनों को यहां लाया गया है। अब प्रयास किए जा रहे हैं इनके सामने हिन्दी बोली जाए, जिससे यह अपनी बात कह सकें। इसके बाद इसके पुनर्वास की व्यवस्था की जाएगी।

करीब 37 साल से नहीं बोली हिन्दी

अपना घर आश्रम के मुताबिक चेन्नई के इंस्टीट्यूट में मिले कागजातों के अनुसार ऐसे प्रभुजन वहां वर्ष 1984 में भर्ती हुए। शुरुआती दौर में यह हिन्दी में ही अपनी बात कह पा रहे थे, लेकिन वहां अन्य कोई हिन्दी भाषी नहीं मिला। इसकी खास वजह यह थी कि अपना घर में चार संस्थाओं से प्रभुजन पहुंचे हैं, जो वहां अलग-अलग रह रहे थे। कई मेंटल हॉस्पिटल में भर्ती थे, जो वार्डों में अलग-अलग थे। ऐसे में यह आपस में भी हिन्दी में बात नहीं कर सके। इसका नतीजा यह हुआ कि ऐसे प्रभुजनों ने धीरे-धीरे हिन्दी बोलना भी बंद कर दिया। खास बात यह है कि इतने दिन वहां रहने के बाद भी यह तमिल भाषा को नहीं समझ पाए। ऐसे में केवल सांकेतिक भाषा से ही पेट पालने का काम किया। तमिलनाडू के मेंटल हॉस्पिटल से अपना घर पहुंचे करीब 65 वर्षीय वृद्ध पहले हिन्दी भाषी थे, जो अब सही तरह से हिन्दी नहीं बोल पा रहे। इन्होंने करीब 37 साल से हिन्दी नहीं बोली।

हो गए शुगर के मरीज

अपना घर आश्रम से जुड़े कार्मिकों ने बताया कि इनमें से ज्यादातर प्रभुजन शुगर के मरीज हो गए हैं। वजह लंबे समय तक यह लोग तनाव के दौर से गुजरे। ऐसे में दवाओं के सहारे ही जिंदगी चली। इससे इतर यह अपने मन की बात भी किसी से नहीं कह पाए और एकाकी जीवन इनकी जिंदगी का हिस्सा बनता चला गया। इसका नतीजा यह रहा कि तमाम बीमारियों ने इनके शरीर को खोखला कर दिया। इनमें से ज्यादातर लोग शुगर की दवाओं पर निर्भर हैं।