भिलाई मेयर बनने पार्षदी के लिए मैदान में उतरेंगे दिग्गज, कांग्रेस में दावेदारों की लंबी फेहरिस्त, भाजपा को काबिल उम्मीदवार की तलाश

महापौर बनने के लिए जोर-आजमाइश में जुटे कई पुरुष दिग्गजों के सपने टूट गए हैं। अब वे जोड़-तोड़ के गुणा-भाग में लग गए हैं।

By: Dakshi Sahu

Published: 04 Mar 2021, 02:17 PM IST

भिलाई. नगर निगम की गिनती प्रदेश के सबसे बड़े नगर निगमों में होती है। 70 वार्ड हैं। पांच अरब का बजट रहता है। तीन-तीन विधानसभाओं को अपने में समेटे हैं। 1998 में साडा से विघटित होकर बने नगर निगम में अब तक हुए चार चुनाव में जनता ने तीन बार कांग्रेस और एक बार भाजपा को मौका दिया। अब पांचवें कार्यकाल के लिए जून में चुनाव संभावित है। महापौर का पद अनारक्षित है यानि किसी भी जाति का महिला-पुरूष कोई भी दावेदारी पेश कर सकता है। मंगलवार को आरक्षण की प्रक्रिया पूरी होते ही अब शहर में सियासी हलचल तेज हो गई है। इस बार महापौर का चुनाव सीधे जनता नहीं करेगी, बल्कि ख्वाब संजो रहे नेताओं को पार्षद निर्वाचित होना पड़ेगा। ऐसे में इस बार दिग्गजों पार्षदी के लिए मैदान में उतरना पड़ेगा। कौन, कहां से चुनाव लड़ेगा, इसके कयास भी लगने शुरू हो गए हैं। आरक्षण में जिनका वार्ड सुरक्षित रहा है वे अभी से स्वयं को उम्मीदवार मानते हुए तैयारी में जुट गए हैं। वहीं महापौर बनने के लिए जोर-आजमाइश में जुटे कई पुरुष दिग्गजों के सपने टूट गए हैं। अब वे जोड़-तोड़ के गुणा-भाग में लग गए हैं। अभी से महापौर पद के लिए भाजपा और कांग्रेस के साथ-साथ निर्दलीय से भी दावेदारों के नाम सामने आने लगे हैं।

कांग्रेस
धर्मेद्र यादव
निवर्तमान महापौर व विधायक देवेंद्र यादव के बड़े भाई धर्मेंद्र यादव महापौर के प्रबल दावेदार माने जा रहे हैं। उनके निवास क्षेत्र के तीनों वार्डों का आरक्षण उनके अनुकूल भी है। वार्ड 23 घासीदास नगर, वार्ड 24 हाउसिंग बोर्ड और वार्ड 25 जवाहर नगर हाउसिंग बोर्ड तीनों ओबीसी सीट से किसी एक में उनके चुनाव लडऩे की चर्चा भी है। युकां के जिलाध्यक्ष व प्रदेश कांग्रेस में भी दायित्व संभाल रहे धर्मेंद्र की राजनीतिक सूझबूझ का ही नतीजा रहा है कि देवेंद्र महापौर और विधायक बने।

तुलसी साहू
कांग्रेस में इस समय महापौर के लिए सबसे बड़ा नाम भिलाई जिलाध्यक्ष तुलसी साहू का चल रहा है। सेक्टर-2 स्थित उनका वार्ड महिला आरक्षित भी है। ऐसे में वे चुनाव लड़ सकती हैं। तुलसी पिछले विधानसभा चुनाव में वैशाली नगर से प्रबल दावेदार थीं। उनकी टिकट पक्की होने की भी बातें काफी प्रचारित हो चुकी थी। पार्टी संगठन को मजबूत करने खूब मेहनत करती रही हैं। ऐसे में उनके धैर्य व त्याग का प्रतिफल मिल सकता है।

नीता लोधी
महापौर की रेस में पूर्व महापौर नीता लोधी भी तुलसी के बराबरी पर हैं। नीता भिलाई की पहली महापौर थीं। पद से हटने के बाद वे पार्टी संगठन में सतत सक्रिय रही हैं। निर्विवाद छवि है। खेमेबाजी जैसा कोई छाप भी नहीं है। पार्टी ने जब भी जिसको भी टिकट दिया, पूरी ईमानदारी व निष्ठा से काम की। अभी पार्टी ने इनको छग अंत्यावसायी सहकारिता वित्त व विकास निगम की उपाध्यक्ष की जिम्मेदारी दी है।

नीरज पाल
निगम में जब भी कांग्रेस का महापौर बना नीरज सेक्टर-5 से पार्षद चुने गए। महापौर परिषद में दो बार स्वास्थ्य विभाग के प्रभारी रहे और निवर्तमान कार्यकाल में लोक निर्माण और राजस्व दोनों बड़ा विभाग संभालते रहे। 50 फीसदी से अधिक एमआईसी बैठक की अध्यक्षता नीरज ने ही की। महापौर की अनुपस्थिति में प्रभारी का दायित्व भी संभालते रहे। निर्विवाद छवि, वरिष्ठता और तजुर्बे के आधार पर कांग्रेस का बड़ा चेहरा माने जा रहे हैं।

लक्ष्मीपति राजू
सेक्टर-7 से लगातर तीन बार पार्षद निर्वाचित हुए हैं। अपने पिछले दोनों कार्यकाल में महापौर परिषद में महत्वपूर्ण विभाग की जिम्मेदारी भी संभालते रहे। कोविड-19 कोरोना के दौर में निगम के स्वच्छता विभाग के प्रभारी के रूप में स्वयं मैदान में डटे रहे। निर्मला यादव के महापौर कार्यकाल में सदन में सत्ता पक्ष की ओर से विपक्ष के हमलों का ज्यादातर सामना राजू ही करते थे। इस बार कांग्रेस से महापौर के दौड़ में इनकी गिनती प्रमुखता से है।

भाजपा
रिकेश सेन
भाजपा से चार बार पार्षद रह चुके रिकेश सेन को महापौर के संभावित उम्मीदवार के रूप में देखा जा रहा है। रिकेश एकमात्र पार्षद हैं जो हर बार नए वार्ड से चुनाव लड़े और जीते भी। सबसे कम उम्र के पार्षद बनने का रिकॉर्ड उनके नाम है। पिछले कार्यकाल में नेता प्रतिपक्ष भी रहे। पार्टी के सभी स्थानीय व शीर्ष नेताओं से उनका बेहतर तालमेल है। संगठन में भी अच्छी पैठ है।

निर्दलीय
बशिष्ठ नारायण मिश्रा
निर्दलियों की संख्या पर्याप्त या राजनीतिक दलों से पद को लेकर तोलमोल की स्थिति बनी तो बशिष्ठ नारायण मिश्रा उम्मीदवारी कर सकते हैं। चार बार लगातार और निर्दलीय चुनाव जीते हैं। आरक्षण के चलते वार्ड भी बदलना पड़ा। जैसा कि भिलाई निगम मेंं अब तक ट्रेंड रहा है 15 से 19 तक पार्षद निर्दलीय चुनकर आते रहे हैं। महापौर पद के समय दलों में खेमेबाजी और नाराजगी बढ़ी तो इसका फायदा निर्दलीय उठा सकते हैं।

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Dakshi Sahu Desk/Reporting
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