गुुरु वशिष्ठ की गाय नंदिनी को बचाने भगवान राम के वंशज ने किया था शेर को शरीर दान, राष्ट्रीय शोध संगोष्ठी में नंदिनी-खुंदनी पर शोध प्रस्तुत

छत्तीसगढ़ के शिवनाथ नदी के चट्टानों में प्राचीन काल से शेर के पंजे और गाय के खुर के निशान मिलते हैं। यह धमधा के पास शिवनाथ तट पर बसे नंदिनी-खुंदनी और सहगांव में देखने को मिलता है।

By: Dakshi Sahu

Published: 18 Mar 2021, 04:16 PM IST

दुर्ग/धमधा. छत्तीसगढ़ के शिवनाथ नदी के चट्टानों में प्राचीन काल से शेर के पंजे और गाय के खुर के निशान मिलते हैं। यह धमधा के पास शिवनाथ तट पर बसे नंदिनी-खुंदनी और सहगांव में देखने को मिलता है। इसे नंदिनी गाय का खुर माना जाता है, जिससे इस गांव का नाम नंदिनी-खुंदनी पड़ा। बाद में भिलाई स्टील प्लांट ने नई टाऊनशिप बसाई तो उसका नाम भी इसी को ध्यान में रखकर नंदिनीनगर रखा। इस विषय पर संस्कृति विभाग द्वारा आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में शोध-पत्र प्रस्तुत किया गया। यह राष्ट्रीय संगोष्ठी महंत घासीदास संग्रहालय रायपुर में हुई। इसका आयोजन संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग ने किया।

प्रस्तुत किए गए 35 शोध पत्र
दो दिन तक चली इस संगोष्ठी में प्रदेशभर से 35 से अधिक शोधपत्र प्रस्तुत किये गए। राष्ट्रीय संगोष्ठी का विषय छत्तीसगढ़ नामार्थ परिचय था। इसमें धर्मधाम गौरवगाथा समिति ने तीन शोधपत्र प्रस्तुत किए। नंदिनी खुंदनी के नामकरण पर गोविन्द पटेल, छै कोरी छै आगर तरिया पर सामर्थ ताम्रकार और धमधा के नामकरण पर रत्ना पटेल व वीरेंद्र देवांगन ने शोधपत्र प्रस्तुत किया। शोधपत्र के माध्यम से बताया गया कि दुर्ग-धमधा के शिवनाथ पुल के नीचे आज भी चट्टानों में भारी संख्या में शेर के पंजे और गाय के खुर के निशान बने हुए हैं। ग्रामीणों की मान्यता है कि भगवान राम के वंशज राजा दिलीप ने गुरु वशिष्ठ की गाय नंदिनी को इसी स्थान पर चराया था। नंदिनी गाय पर शेर ने हमला कर दिया था, जिस पर राजा दिलीप ने शेर को अपना शरीर का भोजन के रूप में देने की बात कही। चट्टानों पर बने पंजे इसी की निशानी है।

एनआईटी के प्रोफेसर भी पहुंचे संगोष्ठी में
शोधपत्र में भूगर्भ वैज्ञानिक एनआईटी के प्रोफेसर एमडी पटेल के हवाले से बताया गया कि मैकल पर्वत के क्षरण से छत्तीसगढ़ का मैदानी हिस्सा बना हुआ है। शिवनाथ के ये पत्थर डोलोमाइट, चूना पत्थर हैं। कच्ची अवस्था में इनमें गाय या शेर के पंजे के निशान बन गए होंगे, जिसमें धूल-मिट्टी जम गई। बाद में चूनापत्थर सख्त हो गए और पंजे के निशान से मिट्टी निकल गई होगी। जिसके कारण ये निशान दिखाई देता हैं। शोध में बताया गया कि इसके आसपास गौतीर्थ रहा होगा, क्योंकि नंदिनी के करीब बानबरद भी है, जहां एक कुंड है, जिसमें स्नान करने से गौ हत्या के पाप से मुक्ति मिलती है। यहीं पर अहिर बाड़ा था, जिसका नाम बाद में अहिवारा पड़ गया। नंदिनी गाय के नाम से नंदवाय, नंदौरी, नंदेली और नंदक_ी भी पड़ा है, जिसे इसके आसपास के गांव हैं।

छै कोरी छै आगर तरिया के नाम से पहचान है धमधा की
सामर्थ ताम्रकार ने अपने शोध पत्र में बताया कि धमधा को छै कोरी छै आगर तरिया के नाम से जाना जाता है यानी 126 तालाबों की नगरी। धमधा की इसी विशेषता से यह पहचाना जाता है। यहां के गोड़ राजाओं ने किले और नगर सुरक्षा के लिए ये तालाब खुदवाये थे। यहां बूढ़ादेव का प्राचीन मंदिर है। जिसके नाम पर बूढ़ा तालाब पड़ा। यहां के 12 तालाबों के बीच में स्तंभ भी बने हैं।

धर्मात्मा से धमधा और तितर पक्षी से पड़ा तितुरघाट नाम
राष्ट्रीय संगोष्ठी में रत्ना पटेल और वीरेंद्र देवांगन ने धमधा व उसके आसपास के गांवों के नामों को लेकर शोधपत्र प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि धर्मात्मा से धमधा और तितर पक्षी से तितुरघाट का नाम पड़ा। शिवनाथ नदी के तट पर तितुरघाट स्थित है, जहां चतुर्भुजी का प्राचीन मंदिर है। एक बार धमधा के राजा शिवनाथ नदी के किनारे शिकार पर आए थे। उन्होंने देखा कि नदी में एक मछुआरा ने जाल डाला है, लेकिन जब उसे निकाला तो उसमें मछलियों के स्थान पर तितर पक्षी फंसे हैं। ऐसा हर बार होते दिखा, जिसके कारण इस गांव का नाम तितुरघाट पड़ा।

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