सावधान! यहां ग्राहकों का चेहरा देखकर तय होती है दवाओं की कीमत

सावधान! यहां ग्राहकों का चेहरा देखकर तय होती है दवाओं की कीमत

KRISHNAKANT SHUKLA | Publish: Feb, 08 2019 02:03:58 PM (IST) Bhopal, Bhopal, Madhya Pradesh, India

दवाओं की कीमत का इलाज नहीं: ग्राहक का चेहरा देख तय होते हैं दाम, एमआरपी के नाम पर लुट रहे मरीज, साल्ट एक पर कीमत में भारी अंतर

भोपाल. medicine दवा के रैपर पर अंकित MRP (अधिकतम खुदरा मूल्य) से कम में दवा खरीदकर आप दवा विक्रेता को रहमदिल समझ रहे होंगे। लेकिन ऐसा है नहीं, यह एक बड़ा खेल है जो दवा निर्माताओं से लेकर खुदरा व्यापारी तक खेल रहे हैं। 10 हजार रुपए की MRP की दवा की जितनी दुकानें उतनी कीमत है। यह तीन हजार से लेकर नौ हजार रुपए तक में बिक रही है। प्रदेशभर में दवा के नाम पर मनमानी वसूली हो रही है और सरकारें हाथ पर हाथ धरे बैठी हैं। दवा कंपनियां कैंसर जैसे असाध्य रोगों के पीडि़तों को भी नहीं बख्श रही हैं। दवा की वास्तविक कीमत से 15 से 20 गुना अधिक एमआरपी अंकित रहती है।

केन्द्र सरकार ने शेडयूल एच-वन की दवाओं के दाम को तय करने की कोशिश तो की, लेकिन बाजार में अब भी दवाएं मनमाने दामों पर बिक रही हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि शेडयूल एच-वन के अंतर्गत महज 350 दवाओं के दामों को कंट्रोल किया गया हैं। अभी भी सैकड़ों दवाएं इस नीति के दायरे से बाहर हैं। यही वजह है कि दवाओं के दाम में भारी अंतर है। कहीं दवाओं के प्रिंट रेट और ग्राहकों से ली जा रही कीमत में अंतर है तो कहीं मुंह मांगे दाम।

यही नहीं एक ही साल्ट और एक ही डोज की दो अलग-अलग ब्रांड की दवाओं की कीमत में दोगुना-तिगुना अंतर है। पत्रिका ने दवा बाजार में पड़ताल की तो यह हकीकत सामने आई। कई दवाओं का अधिकतम खुदरा मूल्य तय नहीं होने का फायदा निर्माता से लेकर फुटकर विक्रेता भी उठा रहे हैं। स्थिति ये है कि 500 रुपए की दवा पर 2750 एमआरपी लिखी है। एम्स के डॉक्टर को यह दवा 500 रुपए में मिली, वहीं आम आदमी से दो हजार रुपए तक वसूले जा रहे हैं।

एक गोली की कीमत 25 रुपए वही 86 रुपए में भी बिक रही

बाजार में बिक रही अगर एक साल्ट की बात करें तो सेफ्टम और सेरोक्सिम 500 एमजी के कीमत में भारी अंतर है। सेफ्टम की एक गोली जहां 86 रुपए की है, वहीं सेरोक्सिम की एक गोली की कीमत केवल 25 रुपये है। स्टॉरवेस और अटोरवा दोनों बड़े ब्रैंड्स की दवाएं है। एक ब्रैंड की दवा के 40 एमजी की डोज की कीमत जहां 257 रुपए है तो दूसरे की 306 रुपए है। रिटलेर मरीज को प्रिंटरेट से 20 से 25 फीसदी कम दाम में दवाएं देकर मरीजों को फायदा देने का दम्भ भरते हैं। इसके बाद भी रिटेलर दवा खरीदी की कीमत से कई गुना मुनाफा कमाते हैं। यूरिन संबंधी बीमारी की 9 रुपए की दवा सिडनेफि ल पर 149 रुपए प्रिंट होता है। रिटेलर इसे 100 से 120 रुपए में मरीजों को देते हैं।

&दवाओं की गुणवत्ता, एक्सपायरी डेट सहित अन्य जांचें नियमित की जाती हैं। अमले द्वारा सैंपल भी लिए जाते हैं और लैब में उनकी जांच कराई जाती हैं। जहां तक सवाल दवाओं की कीमतों का है। कई दवाएं मूल्य निर्धारण के दायरे में नहीं होने से इनकी जांच नहीं की जाती है। कार्रवाई तो नियम के तहत ही कर सकते हैं।
शोभित कोष्टा, उप नियंत्रक खाद्य एवं औषधि प्रशासन

प्रधानमंत्री और उपराष्ट्रपति से शिकायत

दवा की कीमतों पर नियंत्रण नहीं होने और विक्रेताओं की मनमानी को लेकर निजामाबाद चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री ने शिकायती पत्र प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व उपराष्ट्रपति एम वेंकैया नायडू तक को भेजा है। उसका दावा है कि खुदरा विक्रेता 30 गुना तक मुनाफा वसूल रहे हैं। संगठन ने इस पर नीति बनाने की मांग की है। ताकि आम नागरिकों से होने वाली लूट को रोका जा सके। पत्र के साथ 1097 दवाओं की सूची पीएमओ को भेजी है।

जिन्हें 100 से लेकर 2100 प्रतिशत से अधिक दामों में बेचा जा रहा है। पत्र में कहा गया है कि देशभर में दवाओं की अधिकतम कीमत तय कर दी जाए तो चिकित्सा खर्च में 85 से 90 प्रतिशत तक की कमी आ सकती है।

कैसे होती है गड़बड़ी

नियम के मुताबिक प्रिंटरेट का सीधा अर्थ यह है कि रिटेलर उस दवा को प्रिंटरेट या इसके आसपास किसी भी दाम में बेच सकता है। ऐसे में कोई दवा 2500 रुपए में तैयार होती है तो वितरक चार फीसदी मुनाफा जोडकऱ खरीदेगा। वहीं खुदरा विक्रेता आठ फीसदी जोड़ेगा जिससे दवा की कीमत करीब 3500 हो जाती है, लेकिन कंपनी करीब 10हजार रुपए प्रिंट करती है। ऐसे में खुदरा विक्रेता इस दवा को दस हजार रुपए तक किसी भी कीमत में बेच सकता है।

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