नेताओं ने जितना बताया उससे दस गुना ज्यादा किया खर्च

नेताओं ने जितना बताया उससे दस गुना ज्यादा किया खर्च

Anil Chaudhary | Publish: Dec, 09 2018 05:14:17 AM (IST) Bhopal, Bhopal, Madhya Pradesh, India

चुनाव आयोग ने तय की थी 28 लाख की सीमा

 

भोपाल. विधानसभा चुनाव के दौरान प्रत्याशियों ने लंगर लगाए। समर्थकों ने खूब वाहन दौड़ाए। मैदान पर प्रचार से लेकर पैसे तक की गर्मी दिखी, लेकिन चुनाव खर्च से यह सब गायब है। चुनाव आयोग की ओर से तय खर्च की सीमा 28 लाख के आसपास भी किसी प्रत्याशी का खर्च नहीं है। 'पत्रिकाÓ ने प्रमुख दलों के क्षेत्रवार प्रत्याशियों के चुनाव के वास्तविक खर्चों का विश्लेषण किया तो सामने आया कि नकदी के भारी प्रवाह और कस्बों को केंद्र बनाकर फायनेंसरों को जिम्मेदारी सौंपने से खर्चे छिप गए। आयोग तक जो ब्योरा पहुंचा वह वास्तविक खर्चे से कोसों दूर है।
चुनाव आयोग ने धनबल का दुरुपयोग रोकने के लिए हर विधानसभा सीट पर केंद्रीय प्रेक्षक नियुक्त किए थे, जिन्होंने औचक निरीक्षण के साथ सभा और वाहनों के काफिलों की वीडियोग्राफी भी कराई है। इसके बाद भी खर्च में प्रत्याशी अपना ही हिसाब लगा रहे हैं। रिटर्निंग अधिकारियों को दिए गए हिसाब में 30 से लेकर 80 हजार रुपए का प्रतिदिन का व्यय बताया गया है, जबकि सच्चाई यह है कि इससे दस गुना अधिक तक की रकम खर्च की गई है। कई प्रत्याशियों ने तो पैसा पानी की तरह बहाया। सच्चाई यह है कि प्रत्याशियों ने अधिकतर खर्च प्रचार अभियान, सभा, वाहन और कार्यकर्ताओं और समर्थकों के खाने-पीने पर किया है, लेकिन ब्योरे में न्यूनतम खर्च बताया है। औसतन एक प्रत्याशी की बात करें तो तीन लाख रुपए रोज अनुमानित खर्च किया गया है। प्रत्याशी चुनाव प्रचार, कार्यालय, वाहनों सहित अन्य मदों पर खूब हाथ खोले, मगर इन खर्चों से बचने के लिए रास्ते भी निकाल लिए। अधिकतर ने एक पूरी टीम लगा रखी थी कि खर्चे को कम कैसे दिखाया जाए।
- 532 प्रत्याशियों पर लटकी तलवार
विधानसभा चुनाव के 2907 में से 532 प्रत्याशियों ने चुनाव आयोग को खर्च का हिसाब नहीं दिया है। अब इन प्रत्याशियों के खिलाफ कार्रवाई की तैयारी है। आयोग के नियमों के मुताबिक मतदान के बाद खर्च का ब्योरा नहीं देने पर तीन से पांच साल तक के लिए चुनाव लडऩे के अयोग्य घोषित किए जाने का प्रावधान है।
- लाखों का खर्च हजारों में बदला
प्रमुख राजनीतिक दलों के प्रत्याशियों ने औसतन हर दिन सौ से अधिक वाहन दौड़ाए। इनके अलावा उनके समर्थक अपने निजी वाहनों से प्रचार किया। इनके ईंधन का खर्च प्रत्याशियों ने ही उठाया, लेकिन खर्च के ब्योरे में इसे छिपा ले गए।
* यो दिखाया कम
- वाहन संख्या कम दिखाया
- कार्यालय में निजी वाहन बिना पोस्टर बैनर वाले
- वाहनों को पूरे चुनाव के दौरान क्षेत्र में ही छोड़ रखा था
- शक्ति प्रदर्शन के दौरान वाहनों में पोस्टर नहीं लगाए गए
- डीजल- पेट्रोल की पर्चियां प्रत्याशी के नाम से नहीं

* अलग-अलग जगह लंगर
प्रत्याशियों ने खाने-पीने पर भारी रकम खर्च की। क्षेत्र के अलग-अलग जगह लंगर लगाए गए थे। यहां प्रचारकों और आम नागरिकों ने भोजन किया। चाय-नाश्ते के लिए नकद राशि दिए जाने से खर्चे में नहीं आया। बहुत कम कार्यकर्ताओं के खाने-पीने और नाश्ते दिए जाने की जानकारी दी गई है।
- मुख्य कार्यालय का चाय का खर्चा दिखाया
- दुकानदार बिल कम करवाकर लिया।
- नाश्ता दिखाया ही नहीं, जिन्होंने बताया वह भी बहुत कम
- हलवाई से ही सीमित खाने के पैकेट के बिल लिए
- कार्यकर्ताओं की संख्या कम बताई
- जनता खाना बताकर खर्चा छिपाया

* प्रचार-सामग्री का रोल
- हजारों कार्यकर्ता चुनाव क्षेत्र में प्रचार सामग्री बांटते रहे, लेकिन मुद्रित प्रचार सामग्री का हिसाब बेहद कम का हिसाब दिया।
- 3 दिन में 1 बार प्रचार सामग्री छपवाना बताया
- पंफलेट की संख्या ज्यादा, बैनर-पोस्टर कम

* मालाओं का गोलमाल
हर रोज हजारों रुपए के फूल माला खरीदे गए। स्टार प्रचारकों के दौरे में तो यह बजट और भी बढ़ गया। प्रत्याशियों ने अपने प्रचार क्षेत्र के कार्यकर्ताओं तक पहले ही इसका बजट उपलब्ध करा दिया था, लेकिन जब हिसाब की बारी आई तो इतना कम बताया कि जैसे पूजा पाठ के लिए भर ही फूल माला खरीदा।

- आयोग को नहीं बताया कितने कार्यालय खोले
विधानसभा क्षेत्र की भौगोलिक सीमा और कस्बों की संख्या के लिहाज से प्रत्याशियों ने चुनाव कार्यालय खोले गए। औसतन हर सीट पर 30 तक कार्यालय बनाए गए। इनमें कई किराए पर थे। वहां रखी कुर्सियां, दरी, ओढऩे, बिछाने के कपड़े किराए पर रखे गए थे। खर्च में प्रत्याशियों ने अपने मुख्य कार्यालय के अलावा इक्का-दुक्का कार्यालय ही घोषित किया। उसे भी पार्टी और कार्यकर्ताओं पर थोप दिया।
- पार्टी खर्चे की ली आड़
खर्चे में सबसे अधिक गोलमाल पार्टी की आड़ में किया गया। आयोग ने प्रत्याशी पर खर्च की सीमा तो लगा रखी है, पर पार्टियों पर कोई पाबंदी नहीं है और हिसाब देने की अनिवार्यता भी नहीं है। यही वजह है कि सभाओं की तैयारी, टेंट के सामान सहित अन्य खर्चों को पार्टी की ओट में छिपा लिया।
- पैड कार्यकर्ता का हिसाब नहीं
चुनाव के दौरान कई स्थानों से ऐसे वीडियो सामने आए थे जब जयकारे लगाने से लेकर कलश और पार्टी के झंडे उठाने के लिए लोग भाड़े पर लाए गए थे। इसके साथ ही प्रचारक भी पैसे देकर लगाए गए थे। यह पूरा भुगतान नकदी में होने से सामने नहीं आ पाया। कुछ ही प्रत्याशियों ने भाड़े पर रखे गए लोगों के बारे में जानकारी दी है।
- शराब का नहीं हिसाब
चुनाव में वाहनों के ईंधन के साथ शराब भी खूब बंटी। चूंकि चुनाव आचार संहिता में यह पूरी तरह से प्रतिबंधित है, इसलिए किसी प्रत्याशी ने इसे खर्च में शामिल नहीं किया। जबकि एक बड़ा हिस्सा इस पर व्यय हुआ। प्रत्याशियों और उनके थैलीदारों ने बकायदा पर्चियां बांटकर शराब उपलब्ध कराई। ऐसी पर्चियां सोशल मीडिया पर वायरल भी हुईं, लेकिन किसी प्रत्याशी विशेष के नाम का खुलासा नहीं हुआ।

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